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महाराष्ट्र का खेल

महाराष्ट्र का खेल

उद्धव ठाकरे को पद छोड़ने के लिए ‘विवश’ करने वाले एकनाथ शिंदे, इस इस्तीफे के 24 घंटे से कम समय बाद ही राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं। भाजपा के देवेंद्र फडणवीस की ओर से इस बारे में की गई घोषणा के साथ ही 9 दिन तक चले सियासी ड्रामा का अप्रत्याशित क्लाइमेक्स हुआ था। दिनभर यह खबरें मीडिया की सुर्खियों में थीं कि फडणवीस नए मुख्यमंत्री होगें और एकनाथ शिंदे उनके डिप्टी यानी उप मुख्यमंत्री। मुंबई के लिए उड़ान भरने से पहले शिंदे ने कहा था कि मंत्रालय के बारे में फडणवीस के साथ बातचीत जारी है। उनके इस बयान से किसी को भी अंदाज नहीं था कि फडणवीस नई सरकार में उप-मुख्यमंत्री का पद लेंगे। जबकि, दो बार राज्य का सीएम पद संभाल चुके फडणवीस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था , “मैं सरकार का हिस्सा नहीं रहूंगा। ” महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे का पर्दा इस तरह से गिरेगा इसका अंदजा शिवसेना को भले न हो, लेकिन इससे किसी को इंकार नहीं की ये तो होना ही था।

फडणवीस के साथ मिलकर विद्रोह का ब्लूप्रिंट तैयार करने वाले शिंदे ने बागी विधायकों के साथ पहले सूरत (एक दिन का पड़ाव) और फिर असम के गुवाहाटी का रुख किया जहां इन विधायकों ने उस फाइव स्टार होटल में आठ दिन गुजारे, जहां इनकी स्थानीय भाजपा सरकार के मंत्रियों के अलावा किसी और तक पहुंच नहीं थी। हर दिन के साथ इस बागी गुट में विधायकों की संख्या बढ़ती जा रही थी और ‘ठाकरे सेना’ संख्याबल के मामले में कमजोर पड़ती जा रही थी। आखिरकार शिंदे के साथ 55 में से 39 विधायक थे। ऐसे में तराजू का पलड़ा किस ओर झुक रहा है, इस बारे में किसी को संदेह नहीं रह गया था।

कहानी की शुरूआत

महाविकास अघाड़ी में फूट कहें या शिवसेना में बगावत, इसकी बू राज्यसभा चुनाव से ही आने लगी थी। 10 जून को राज्यसभा चुनाव हुए और इस बार आमने-सामने थीं दो पूर्व सहयोगी पार्टियां भाजपा और शिवसेना। 6 सीटों के लिए चुनाव हुआ। यहां भाजपा के पास इतने विधायक थे कि वह अपने दो उम्मीदवारों को आसानी से जीत दिला सकती थी। इसी तरह महाविकास अघाड़ी (शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी) भी अपने चार उम्मीदवारों को जीत दिलाने में कामयाब हो सकती थी। लेकिन यहीं से मौजूदा राजनीतिक संकट की शुरूआत मानी जा सकती है। 6 सीटों के लिए चुनाव होना था और भाजपा ने अपने 3 उम्मीदवार मैदान में उतार दिए, जबकि महाविकास अघाड़ी की तरफ से 4 प्रत्याशी राज्यसभा चुनाव लड़े। भाजपा के तीनों उम्मीदवार चुनाव जीतकर राज्यसभा पहुंचे, जबकि महाविकास अघाड़ी अपने तीन उम्मीदवारों को ही जीत दिला पाई। इस तरह से महाविकास अघाड़ी को एक राज्यसभा सीट का झटका लगा।

राज्यसभा चुनाव में एक सीट गंवाने के बाद अब राज्य में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार के पास 20 जून को हुए विधान परिषद चुनाव में लाज बचाने के मौका था। लेकिन एक बार फिर अघाड़ी को झटका लगा। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने विधानपरिषद चुनाव में पांच उम्मीदवार उतारे और अपने पांचों उम्मीदवार को जीत दिलाई। महाविकास अघाड़ी के सभी विधायक उम्मीद के मुताबिक वोट करते तो भाजपा को सिर्फ चार सीटों पर ही जीत मिलती और एमवीए के 6 प्रत्याशी चुने जाते। शिवसेना और एनसीपी के दो-दो उम्मीदवार तो चुनाव जीत गए, लेकिन कांग्रेस के दो में से एक प्रत्याशी चुनाव हार गया। स्पष्ट था कि विधानपरिषद चुनाव में क्रॉस वोटिंग हुई थी, क्योंकि भाजपा अपने विधायकों के वोटों से सिर्फ 4 उम्मीदवारों को जीत दिला सकती थी।

 

फडणवीस का त्याग या…

अब इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे की शिवसेना से बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे, भाजपा के सपोर्ट से ही मुख्यमंत्री बन गये हैं – और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम बन कर पीछे पीछे चलना पड़ रहा है।

जिस कैबिनेट मीटिंग की देवेंद्र फडणवीस अध्यक्षता किया करते थे, एकनाथ शिंदे की तरफ से बैठक बुलाये जाने पर वो चुपचाप देखते रह गये। एकनाथ शिंदे के साथ तब कैबिनेट सहयोगी के तौर पर अकेले देवेंद्र फडणवीस ही रहे। ऐसा तो तब भी नहीं हुआ था जब पांच साल सरकार चलाने के बाद 72 घंटे के लिए वो कुर्सी पर बैठे थे।

किसी मुख्यमंत्री की डिप्टी सीएम बनना कोई नयी बात नहीं है। महाराष्ट्र के लिए भी ये कोई अचरज वाली बात नहीं है – लेकिन देवेंद्र फडणवीस का महाराष्ट्र का डिप्टी सीएम बनना आसानी से किसी को भी शायद ही हजम हो रहा हो। अभी उद्धव ठाकरे सरकार में ही अशोक चव्हाण महज एक मंत्री के तौर पर शामिल थे, जबकि वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ऐसे कई उदाहरण महाराष्ट्र में भी हैं, और देश के दूसरे राज्यों में भी मिल जाएंगे।

मृगांक शेखर लिखते हैं- देवेंद्र फडणवीस के मन की घोषित बात तो यही थी कि सरकार में शामिल नहीं हो रहे हैं, शायद इसलिए भी क्योंकि वो मुख्यमंत्री नहीं बन रहे थे. ये फैसला भी दिल्ली में बीजेपी नेतृत्व का ही रहा क्योंकि जो अजीत पवार को लेकर रातोंरात मुख्यमंत्री बन सकता हो, वो इतने दिनों के इंतजार के बाद इतना बड़ा त्याग करेगा, किसी को भी नहीं लग सकता।

एकनाथ शिंदे को भी बीजेपी उद्धव ठाकरे के खिलाफ वैसे ही इस्तेमाल करने जा रही है जैसे कभी जीतनराम मांझी और बाद में चिराग पासवान का नीतीश कुमार के खिलाफ किया था – बड़ा फर्क ये है कि ये बीते प्रयोगों से बिल्कुल अलग है। चिराग पासवान तो कभी नीतीश कुमार के नहीं रहे, जीतनराम मांझी जरूर उनके सबसे भरोसेमंद रहे।

एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे का पुराना रिश्ता ऐसा ही रहा है। महाविकास आघाड़ी सरकार गिरने के बाद भी शरद पवार ने ये बात दोहरायी है। अब अगर एकनाथ शिंदे इतने भरोसेमंद रहे हैं तो उद्धव ठाकरे के राजदार भी तो होंगे – और बीजेपी को उद्धव ठाकरे के खिलाफ इससे बढ़िया हथियार कहां मिल सकता है?

लेकिन ऐसे हथियार के अनगाइडेड मिसाइल बन जाने का भी तो खतरा हो सकता है – तो क्या यही सोच कर बीजेपी नेतृत्व ने देवेंद्र फडणवीस को एकनाथ शिंदे के पीछे-पीछे लगा दिया है? लेकिन बीजेपी नेतृत्व को ये नहीं भूलना चाहिये था कि खुशी-खुशी काम करने और मन मसोस कर तनावभरे माहौल में कोई काम करना कितना मुश्किल होता है?

सरकार में सारे फैसले पॉलिसी मैटर को लेकर ही तो होते नहीं, ट्रांसफर पोस्टिंग से लेकर बहुत सारे छोटे-छोटे काम भी होते हैं – और ये जरूरी भी नहीं कि एकनाथ शिंदे वो भी देवेंद्र फडणवीस का मन भांप कर ही करेंगे। फिर तो ये भी जरूरी नहीं कि देवेंद्र फडणवीस की बातों को हर बार उतनी तवज्जो मिलेगी ही?

भाजपा नेताओं का कहना है कि भाजपा ने तीन फीसदी ब्राह्मण वोट पर 30 फीसदी मराठा वोट को तरजीह दी है – देवेंद्र फडणवीस की जगह एकनाथ शिंदे को फिलहाल आगे करने की एक बड़ी वजह यही मानी जा रही है।

वैसे भी अब एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे की लड़ाई को बिल्कुल अलग तरीके से लिया जाएगा, बनिस्बत देवेंद्र फडणवीस बनाम उद्धव ठाकरे के। निश्चित तौर पर एकनाथ शिंदे काउंटर करने में हर तरीके से भारी पड़ेंगे – अगर चुनाव आयोग का फैसला एकनाथ शिंदे के पक्ष में आ गया तो उद्धव ठाकरे को मातोश्री में बैठ कर हनुमान चालीसा सुनना ही पड़ेगा।

अब तो महाराष्ट्र में जो होना था वो तो हो गया। अब तो आगे-आगे देखिये होता है क्या।

 

 नीलाभ कृष्ण

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