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विध्वंसक राजनीति का दौर

विध्वंसक राजनीति का दौर

हाल के दिनों में देश में एक तर्क को लोकप्रिय बनाने की तेजी से कोशिश हुई है। कहा जा रहा है कि विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना है। उसी तर्ज पर मीडिया और बौद्धिक जगत की भूमिका भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता तंत्र का विरोध करना है। इस तर्क की व्याप्ति इतनी बढ़ गई है कि जब भी केंद्र सरकार कोई बड़ा कदम उठाती है तो उसके विरोध में विपक्ष और सेक्युलर होने का दावा करने वाला समूचा बौद्धिक जगत उठ खड़ा होता है। चूंकि विरोध के लिए विरोध का यह चलन बढ़ गया है, इसलिए सरकार की ओर से संवाद की गुंजाइश भी कम होती चली गई है। मंगलवार 14 जून को घोषित अग्निपथ योजना भी विरोध की इसी राजनीति की भेंट चढ़ाने की कोशिश हुई। यह बात और है कि सरकार ने रणनीति बदली और अग्निवीरों की उम्र सीमा में बढ़ोत्तरी का ऐलान किया। भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों की सरकारें अग्निवीरों को नौकरियां देने का वादा करने लगीं। फिर मामला थोड़ा शांत हो गया।

अतीत में जब भी सरकार किसी योजना का ऐलान करती थी तो ऐसा नहीं कि विपक्ष विरोध नहीं करता था। लेकिन तब विरोध गुण-दोष के आधार पर किया जाता था। लेकिन अब यह गुण-दोष वाला तक्र सिरे से किनारे रख दिया गया है। यही वजह है कि जैसे ही अग्निवीर योजना की घोषणा हुई, समूचा गैर भाजपाई राजनीतिक तंत्र इसके विरोध में उतर आया। दबे सुर में भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी बिहार के जनता दल यू ने भी इसका विरोध किया। विपक्षी विरोध की आंच ही थी कि बिहार दो दिनों तक धधकता रहा। जगह-जगह रेलगाड़ियां जलाई गईं, रेलवे प्लेटफॉर्म तोड़ दिए गए, खोमचे लूट लिए गए। बिहार में तो प्रशासन तकरीबन मूकदर्शक बना रहा। विरोध की आंच पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही सुलगाने की कोशिश हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रशासन ने बात को ज्यादा बढ़ने नहीं दिया। तेलंगाना के सिकंदराबाद में भी छात्रों को बरगलाने की कोशिश कामयाब रही और यहां भी स्टेशन पर तोड़फोड़ एवं आगजनी हुई। कुछ रेलगाड़ियों को भी जलाया गया।

यह ठीक है कि सरकार की ओर से शुरूआती संवाद में कमी रही। लेकिन संवाद की गुंजाइश आज की राजनीति ने कहां छोड़ी है। याद कीजिए कृषि कानूनों को। उनके पास होने के बाद जब किसान आंदोलन शुरू हुआ तो बातचीत के लिए खुद सरकार आगे आई। विज्ञान भवन में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अधिकारियों के साथ आगे आए। लेकिन राजनीति ने इन कानूनों को रद्द कराने के लिए आग में इतना घी डाला कि किसान सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए भोजन तक को करने से इनकार करते रहे। ऐसे में सवाल यह है कि बातचीत आखिर किससे की जाए। और एक सवाल यह भी उठता है कि अगर योजना पर बातचीत के लिए सरकार खुद आगे आती तो क्या विरोध में अपनी राजनीति देखने वाला विपक्ष चुप रह सकता था? सवाल यह भी है कि क्या राजनीति नहीं होती। अगर हालिया स्थितियों को देखें तो इन आशंकाओं को ही बल मिलता है। ऐसे में भला संवाद किससे और कैसे हो सकता है? सिर्फ कृषि कानूनों ही क्यों, नागरिकता संशोधन कानून पर जिस तरह पूरे देश के मुसलमानों को बरगलाया गया, उन्हें विपक्ष की ओर से बताया गया कि इस कानून के बाद उन्हें देश से बाहर निकाल दिया जाएगा, उसका क्या हश्र हुआ? दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में लगातार प्रदर्शन हुए। धरना जारी रहा। गैर भाजपा शासित राज्यों में इस पर कानून के खिलाफ प्रदर्शन जारी रहा। कई बार स्थानीय सरकारें परोक्ष समर्थन तक देती दिखीं। विपक्ष ने भ्रम का कुहासा तो कोरोना वैक्सीन पर भी पैदा करने की कोशिश की गई। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने यहां तक ऐलान कर दिया था कि यह भाजपा वैक्सीन है और वे इसे नहीं लगवाएंगे। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अग्निपथ योजना पर राजनीति क्यों नहीं होती।

भारत में बढ़ती जनसंख्या बड़ा संकट है। यही वजह है कि यहां बेरोजगारी बहुत है। उदारीकरण के बावजूद अब भी देश में संगठित रोजगार बहुत कम है। करीब नौ करोड़ के आसपास सरकारी कर्मचारी हैं और करीब चार करोड़ लोग ही संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। चूंकि सरकारी नौकरी में सेवा की शर्तें बेहतर हैं, भविष्य की सुरक्षा बेहतर है। इस वजह से युवाओं की बड़ी चाहत सरकारी नौकरी ही है। उसमें भी सबसे बेहतर सुरक्षा सेना की नौकरी है। सेना की नौकरी के लिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के नौजवान जीतोड़ मेहनत करते रहते हैं। वन रैंक वन पेंशन योजना लागू होने के बाद सेवानिवृत्ति के बाद सैनिकों की आर्थिक और दूसरी सहूलियतें और भी बेहतर हो गई हैं। यही वजह है कि नए सिरे से सेना में जाने के लिए ग्रामीण और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों को युवाओं का क्रेज बढ़ गया है। यही वजह है कि जब अग्निपथ योजना लागू हुई तो इसके खिलाफ कतिपय स्वार्थी तत्वों ने युवाओं को भड़काने में अपनी भूमिका निभाई। इसमें सैनिकों की भर्तियों के लिए कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने वाले कतिपय संस्थानों का भी हाथ सामने आया। इसके बाद देश के वे इलाके धू-धू जलने लगे, जिन इलाकों से सैनिकों की भर्तियां ज्यादा होती हैं। या जिन इलाकों के बच्चे सेना में जाने के लिए प्रयासरत रहते हैं।

यह सच है कि रक्षा खर्च का जो बजट है, उसका दो तिहाई खर्च पेंशन और वेतन पर ही होता है। जबकि सेना के आधुनिकीकरण के लिए बजट का चौथाई हिस्सा ही बच पाता है। बदलती परिस्थितियों में सेना के आधुनिकीकरण की वैश्विक स्तर पर जरूरत महसूस की जा रही है। इसीलिए दुनियाभर की सेनाओं में बदलाव हो रहे हैं। भारत सरकार की भी कोशिश यही है। अग्निवीर योजना के जरिए वह जहां अगले पांच सालों में दस लाख युवाओं को शॉर्ट टर्म रोजगार देने की तैयारी में है। इसके लिए अग्निवीरों को चार साल की नौकरी दी जाएगी और उनमें से चौथाई को सेना में शामिल किया जाएगा। चार साल बाद उन्हें 11 लाख 70 हजार के करीब रकम मिलेगी। उम्मीद की जा रही है कि इस रकम से अगर युवा पढ़ाई करना चाहेगा या रोजगार की ओर उसका झुकाव होगा तो वह आसानी से कर सकेगा। अगर उसे सेना में नौकरी नहीं मिली तो राज्यों की पुलिस और दूसरी नौकरियों में भी उसकी गुंजाइश होगी। शार्ट टर्म में इससे बेरोजगारी पर भी लगाम लगाने की तैयारी है।

हमें इस तरफ भी ध्यान देना होगा कि सेना या पुलिस की राजनीति करने वाले लोग खाए-अघाये परिवारों के लोग होते हैं। लेकिन सेना में असल नौकरी चाहने वाले लोग निम्न मध्यवर्गीय या ग्रामीण इलाकों के लोग होते हैं। उस वर्ग के सामने आज भी रोजी-रोटी बड़ा मुद्दा है। बहुत परिवार अब भी ऐसे हैं, जिनके पास लाख रूपए की रकम शायद ही हो। ऐसे में अव्वल तो इस योजना का समर्थन करना चाहिए था और इसके जरिए छोटी अवधि के रोजगारों की ओर भी फोकस करना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ और इस योजना को राजनीति के दड़बे में धकेलने की कोशिश हुई। कोई भी योजना या फैसला मुकम्मल नहीं हो सकता। उसमें सुधार की गुंजाइश रहती है। इस गुंजाइश की परख की जानी चाहिए थी और इस लिहाज से सरकारी तंत्र से सुधार की मांग की जा सकती थी। फिर भी सरकार नहीं मानती तो आंदोलन का रास्ता था। लेकिन यहां शुरूआत में ही हिंसक आंदोलन की राह तलाश ली गई।

युवाओं को रोजगार मिलना ही चाहिए। युवाओं ही क्यों, हर समर्थ हाथ को काम मिलना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या रेल जलाकर रोजगार हासिल किया जा सकता है? क्या सड़कों पर तोड़फोड़ करके रोजगार मिल सकता है? अतीत में जितने भी तोड़फोड़ वाले आंदोलन हुए हैं, क्या उनका नतीजा बेहतर ही रहा है? इस तरफ भी देखने की जरूरत है।

 

उमेश चतुर्वेदी

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