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अग्निपथ पर अग्नि

अग्निपथ पर अग्नि

अग्निपथ योजना पर भड़की अग्नि का औचित्य समझ नहीं आ रहा। एक ओर तो हमारे बेरोजगार नवयुवक नौकरी के लिए बेताब है। उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। बहुतों के हाथ मायूसी ही लगती है। समय-समय पर प्रदर्शन कर वह सरकार को चेताते भी रहते हैं कि वह उनके लिए कुछ कर दिखाए। विरोधी दल भी इस विषय पर सरकार के कान खींचते रहते हैं, मानों कि जब केंद्र व राज्यों में उनकी सरकारें थीं तब देश और प्रदेशों में न बेरोजगारी थी और न निर्धनता उनके कार्यकाल में महंगाई नाम की कोई चीज थी ही नहीं।

1971 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश में “गरीबी हटाओ” का नारा दिया था। इस नारे पर उन्हें केंद्र और प्रदेशों के चुनाव में भारी जीत मिली। उसके बाद 13 वर्ष तक सत्ता में रहीं पर इस दौरान गरीब और गरीब होते गए और अमीर और अमीर होते गए।

कई बार ऐसे समाचार भी छपते रहते हैं कि एक चपड़ासी की नौकरी पाने के लिए एमए तक की डिग्री प्राप्त युवक भी इस पद को पाने के लिए मारे फिरते है। उन्हें अपनी डिग्री की परवाह नहीं। उन्हें तो बस कोई भी नौकरी मिलनी चाहिए ताकि उनको बेरोजगारी के अभिशाप से मुक्ति मिल सके। उन्हें तो सब कुछ कबूल है जिस से कि वह अपना जीवन यापन कर सकें और अपने माता-पिता पर से अपनी बेरोजगारी का बोझ उतार सकें चाहे कुछ समय के लिए ही हो।

दूसरी ओर, सबने पिछले कुछ दिनों में अजीब घटनाएं देखी होंगी। सरकार ने एक अग्निपथ योजना की घोषणा की जिसके अनुसार बेरोजगार युुवाओं को भारत की सेना के तीनों अंगों में चार वर्ष के लिए रोजगार का प्रावधान किया गया है। यही नहीं, चार वर्ष के बाद सेना के तीनों अंगों में उनके लिए रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए आरक्षण का प्रावधान भी रखा गया है। इतना सब कुछ होने के बावजूद ये कौन से बेरोजगार थे जिन्हें अपनी नौकरी नहीं, सड़कों पर वाहनों, रेल गाड़ियों तथा अन्य सरकारी और गैर-सरकारी संपत्ति को अग्नि को समर्पित करने का काम मिल गया जिसमें उन्हें कोई पगार नहीं मिली। ये कौन से बेरोजगार प्राणी थे जिन्हें रोजगार का अवसर नहीं, हुड़दंग मचाने का काम चाहिए था। इसका मतलब तो यह है कि हमारे इन युवकों को अपने हाथों के लिए काम नहीं आग फैलाने के लिए साधन चाहिए। रोजगार तो उनके लिए एक हॉबी होगी।

प्रश्न तो यह भी उठता है कि क्या सरकारी व निजी संपत्ति की होली जलाकर उपद्रवियों के लिए रोजगार उत्पन्न हो गए? ऐसे काम से उन्हें क्या मिला? मिला तो उन राजनीतिक दलों को भी कुछ नहीं जो इस विषय पर भड़की आग को हवा दे रहे हैं। तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने तो अब साफ कर दिया है कि जो भी लोग भर्ती के लिए अपने प्रार्थनापत्र भेजेंगे उन्हें साथ में एक शपथपत्र भी संलग्न करना होगा कि उन्होंने इन उपद्रवी घटनाओं में किसी प्रकार से भी भाग नहीं लिया था। उन युवाओं के लिए तो अब ‘घर फूँक तमाशा देखने” वाली स्तिथि बन गयी है। ऐसी अवस्था में नुकसान किसका हुआ — न उन्हें उकसाने वाले किसी व्यक्ति का, न किसी राजनीतिक दल का और न किसी समाज विरोधी संगठन का। यदि नुकसान में कोई रहा तो बेचारा वह युवक जिसकी भावनाओं को भड़काकर इन अनैतिक लोगों ने बेरोजगारों के कंधे पर निशाना रख कर आग के शोले भड़का कर अपने स्वार्थ का उल्लू सीधा करने का प्रयास किया। सब से बड़ा नुकसान तो देश का हुआ जब सरकारी और निजी संपत्ति को आग के हवाले कर दिया गया।

एक और बात समझ नहीं आ रही है। जहाँ तक आम व्यक्ति की सोच है, यथार्थ तो यह है कि बेरोजगार जिसको चार क्या, एक-दो मॉस के लिए भी काम मिल जाये तो वह ना नहीं करता। कई बार अल्पसमय का रोजगार भी जीवन में उनके भविष्य के लिए वरदान बन जाता है। यही नही, बेरोजगार रहने के स्थान पर कुछ समय केलिए रोजगार किसको कड़वा लगता है? कहते हैं कि जबरदस्ती किसी के मुंह में डाला मीठा पताशा किसीको कैसे कड़वा लग सकता है?  यदि यह अग्निपथ योजना किसी को नहीं भाति तो यह योजना किसी पर जबरदस्ती तो थोपी जा नहीं रही है। किसी को अच्छी नहीं लगती तो वह इसमें भर्ती न हो। हिंसक विरोध प्रदर्शन की क्या आवश्यकता है?

जो कुछ आगजनी के मामले सामने आये, उसके सूत्रधार बेरोजगार नहीं, उनको भड़काने वाले लोग हैं जो बेरोजगारों की हथेलियों पर अपनी राजनीतिक व चुनावी रोटियां सेक रहे हैं। अग्निपथ पर उठा विवाद सरकार और बेरोजगार युवाओं के बीच है। वह सुलझा लेंगे। इस में राजनीति कहाँ से आ टपकी?

यही नहीं, अब तो नरेश टिकैत के नेतृत्व वाले किसान संगठन भी अग्निपथ योजना के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। क्यूँ, कैसे ? यह स्पष्ट करना मुश्किल है। उन्हें तो सरकार का विरोध करना है।

और जो कुछ भी हो, एक ही बात सच्च है। विरोधी दलों का स्टैंड बड़ा स्वार्थी है। उन्हें तो सत्ताधारी सरकार के हर अच्छे और बुरे काम की भर्त्स्ना ही करनी है। सरकार के किसी कार्यक्रम और योजना पर सकारात्मक टिप्पणी करना उनके राजनितिक धर्म के अनुसार एक घोर पाप है। वह ऐसा कर किसी का भला नहीं कर रहे — न अपना, न बेरोजगारों का और न ही देश का। और जो कुछ भी हो, सच्ची बात तो एक ही है। विरोधी दलों का स्टैंड बड़ा स्वार्थी है। उन्हें तो सत्ताधारी सरकार के हर अच्छे और बुरे काम की भर्त्स्ना ही करनी है। सरकार के किसी कार्यक्रम और योजना पर सकारात्मक टिप्पणी करना उनके राजनितिक धर्म के अनुसार एक घोर पाप है। वह ऐसा कर किसी का भी भला नहीं कर रहे — न अपना, न बेरोजगारों का और न ही देश का। जो ठन्डे मस्तिष्क से विचार करेंगे उन्हें अग्निपथ योजना में थोड़ा-बहुत भला ही दिखेगा, किसी का बुरा बिल्कुल नहीं।

 

अम्बा चरण वशिष्ठ

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