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सपा को गढ़ में परास्त कर रचा इतिहास

सपा को गढ़ में परास्त कर रचा इतिहास

वह जादुई छड़ी घुमाने वाला नायक तो नहीं पर उससे भी ज्यादा करिश्माई है। वह किसी पौराणिक कथा की अलौकिक शक्तियों वाली देव तो नहीं, पर उससे ज्यादा चमत्कारिक है। वह भारतीय राजनीति में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक रंगमंच पर दो दशक पूर्व बिसरा दी गई भाजपा को इतिहास में पहली बार पुनर्वापसी रूप में पुनर्स्थापित कराकर सभी राजनीतिक दलों को अचंभित करा चुका है। सियासी दंगल के चुनावी अंकगणित का गुणनफल बदल कर उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा को गढ़ में परास्त करने का हौसला दिखा रहा है। यह सब करिश्मा कर देने वाले योगी आदित्यनाथ का यह कथन उप-चुनाव परिणाम पर सटीक लगता है कि सबसे शक्तिशाली और परिणाम मुख डबल इंजन की सरकार को डबल जीत जीत मिली है। चुनौतीपूर्ण लड़ाई को जीतकर बीजेपी ने 2024 के दूरगामी संदेश दे दिया है। राजनीति दो और दो चार का खेल नहीं है, शतरंज की गोटी वक्त पर सही चल देने पर हारी बाजी भी जीत सकते है और जीती बाजी भी हार का सबब बन जाती है। जी हां, कुछ-कुछ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत गढ़ आजमगढ़ और रामपुर में हाल हुए उप-चुनाव में देखने को मिला है।

लोकसभा की 02 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को मिली विजय ने समाजवादी पार्टी की साख ही नहीं सोच पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव अपने ही गढ़ में चुनाव प्रचार करने तक नहीं गये। मुंह के बल गिरी समाजवादी पार्टी के सहयोगी ओपी राजभर ने कहा, ”यह तो होना ही था। चुनाव का बिगुल बजेगा पर्चा भरा जाएगा, तब आप चुनाव मैदान में जाओगे तो कैसे चुनाव जीतोगे। एक आदमी दो महीने से मेहनत कर रहा है। एक आदमी एक दिन मेहनत कर रहा है, ऐसे तो चुनाव नहीं जीता जा सकता है। मैंने पहले भी कहा था कि अखिलेश यादव को निकलकर काम करना चाहिए था। संगठन को मजबूत करना चाहिए था। विधानसभा में बोलने से चुनाव नहीं जीतेंगे। अब कमरे से निकलकर संगठन को मजबूत बनाने का समय है।”

आजमगढ़ और रामपुर उप-चुनाव में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की ट्वीटर के जरिये मतदाताओं को साधने की रणनीति के स्थान पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भारतीय जनता पार्टी सीधे जन से संपर्क और हार के बाद भी जीत की चाह ने विजय की राह आसान कर दी है। प्रोफेसर लास्की की अनुसार ‘राजनीति शास्त्र के अध्ययन का संबंध संगठित राज्यों से सम्बंधित मनुष्यों के जीवन से है। ‘क्या आजमगढ़ और रामपुर में समाजवादी पार्टी के सभी मतदाता अखिलेश यादव के ट्वीटर से जुडे अति आधुनिक मतदाता थे जो उनके संदेश को पढने  से चूक गये।

वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव कहते है कि समाजवादी पार्टी में बेसिक लेआउट देखने का काम ही नहीं किया जाता है। जब दूसरे दल भविष्य की रणनीति बनाते है तब यहां राजनीति पर चर्चा ही नहीं होती है। सन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी के साथ गठबंधन करके चुनाव में उतरी सपा को आजमगढ़ और रामपुर की सीटों सहित 05 लोकसभा क्षेत्रों में अपना परचम फैराने में कामयाब हुई थी लेकिन मायावती 10 सांसद जीत जाने के बाद सपा अलग हो गई थीं। इस अलगाव के बाद सपा ने चुन-चुन कर बसपा से निकाले लोगों को अपने दल में शामिल किया था। बीते विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के कोर वोट बैंक की दम पर सत्ता में आने का दंभ का रंग उतर जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती की सपा को ध्वस्त करने के लिए आजमगढ में ऐसा पांसा फेका की सपा के दिग्गज धर्मेन्द्र यादव की संसद में जाने की रणनीति धूल में मिल गयी।

गौरतलब है कि 03 महीने पहले आजमगढ़ की सभी 10 और रामपुर में विधानसभा सीटों पर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली सपा उप-चुनाव में हार के बाद लोकसभा में 5 से अब 03 सीटों पर पहुंच गई है। सपा सन 2024 में होने वाले लोकसभा के आम चुनाव के लिए खुद को बीजेपी के सामने सबसे मजबूत पार्टी होने का दावा किस आधार पर करेगी यह यक्ष प्रश्न समाजवादी पार्टी के सामने खड़ा हो गया है। लोकसभा की दोनो सीटो के उप चुनाव नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि समाजवादी पार्टी के लिए यूपी में राह आसान नहीं रही है। पूर्व सांसद और समाजवादी पार्टी के फूलपुर पवई से विधायक रमाकांत यादव का कहना है कि आजमगढ़ लोकसभा सीट पर हुए उप-चुनाव में हार के कई कारण हैं। कम समय होने की वजह से हम अनुसूचित वर्ग तक अपनी बात नहीं पहुंचा सके। बीएसपी प्रत्याशी गुड्डू जमाली की वजह से मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ।

जाति एमवाई समीकरण जीत का आधार के ध्वस्त होने से समाजवादी पार्टी के बेस वोट बैंक मुस्लिम के काग्रेस में और यादव मतदाताओं रुझान भाजपा में जाने का दिख रहा है। राजनीति परिणामों को आधार पर ही चलती है। आजमगढ़ और रामपुर में मुस्लिम और यादव वोटर पूरी तरह से सपा के साथ नहीं रहे। आरोप सपा चाहे जो भी लगाए किंतु सच यही है कि दोनों ही सीटों पर उसका अपना समर्थक वोट बैंक पार्टी प्रत्याशियों को जिताने के लिए जोश के साथ नहीं उतरा। दोनों सीटों पर वोटिंग प्रतिशत बेहद कम रहा और वह भी तब जब कांग्रेस इन दोनों सीटों के उप-चुनाव में उतरी नहीं, और मायावती ने रामपुर को छोड़कर पूरा ध्यान आजमगढ़ पर ही लगा रखा था।

सपा का सीधा मुकाबला अपने गढ़ में बीजेपी के साथ था, पर वह अपने कोर वोट बैंक को साधकर यह संदेश देने उनका मुखिया तक सामने नहीं आया तो क्या वोटर भगवा रथ को रोकने की रणनीति बनाती और वह रोकती उसकी जिम्मेदारी थी, वह चूक गयी जैसे बाक्य कह कर सपा जन के मन पर संदेह कर रही है। उत्तर प्रदेश के दोनों उप-चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि आजमगढ़ में बीएसपी प्रत्याशी शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली ‘हाथी’ लेकर निकले और अखिलेश की साइकिल को रौंद दिये जिसके कारण बीजेपी के कमल को खिलने की राह संगम रही है।

गुड्डू जमाली के साथ मुसलमानों की भागीदारी से समझा जा सकता है सपा उनकी पहली पसंद नहीं रही। नतीजा यह रहा कि बीजेपी प्रत्याशी दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ 8,679 वोटों के अंतर से चुनाव जीत गए। निरहुआ को कुल 3,12,768 यानी 34.39 प्रतिशत वोट मिले। सपा के धर्मेंद्र यादव 3,04,089 यानी 33.44 प्रतिशत वोट ले पाए, जबकि गुड्डू जमाली ने 2,66,210 यानी 29.27 प्रतिशत वोट हासिल कर तीसरा स्थान पाया। कुल 14 प्रत्याशियों की मौजूदगी वाले इस उपचुनाव में 7,08,707 वोट डाले गए थे। रामपुर सपा के वरिष्ठ नेता आजम खां का गढ़ है, यह पिछले कई चुनावों में साबित हो चुका है लेकिन इस उपचुनाव में आजम खां की पसंद पर उनके करीबी आसिम राजा को टिकट मिलने के बावजूद मुस्लिम बहुल इस लोकसभा क्षेत्र में सपा को कामयाबी नहीं मिल सकी। यहां उप-चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी घनश्याम सिंह लोधी 3,67,397 यानी 51.96 प्रतिशत वोट लेकर चुनाव जीत गए। सपा के आसिम राजा को उन्होंने 42,192 वोटों के अंतर से चुनाव हराया। कुल 07 प्रत्याशियों के चुनाव मैदान में होने के बावजूद आसिम राजा को 3,25,205 यानी 46 प्रतिशत वोट ही मिल सके। इस सीट पर कुल 7,06,568 वोट डाले गए थे। अब और कठिन होगी अखिलेश के लिए यूपी की सियासत देश में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में सपा की उपचुनाव में इस स्थिति पर एआईएमआईएम के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने अखिलेश की पार्टी पर सीधा हमला किया और ट्वीट कर कहा, ‘रामपुर और आजमगढ़ चुनाव के नतीजे से साफ कर दिया है कि सपा में भाजपा को हराने की न तो काबिलियत है और ना हौसला।

मुसलमानों का कहना है कि इडी के डर से दुबके लोगों को अब अपना कीमती वोट जाया करने के बजाय जो मोदी योगी से लडेगा उसके साथ लोकसभा चुनाव में फैसला करेगे।’ बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी हमला बोला, ‘उपचुनावों को रूलिंग पार्टी ही अधिकतर जीतती है, फिर भी आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में बीएसपी ने सत्ताधारी भाजपा व सपा के हथकण्डों के बावजूद जो कांटे की टक्कर दी है वह सराहनीय है। पार्टी के छोटे-बड़े सभी जिम्मेदार लोगों व कार्यकर्ताओं को और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ना है।’ उन्होंने एक और ट्वीट कर कहा, ‘यूपी के इस उपचुनाव परिणाम ने एक बार फिर से यह साबित किया है कि केवल बीएसपी में ही यहां भाजपा को हराने की सैद्धान्तिक व जमीनी शक्ति है। यह बात पूरी तरह से खासकर समुदाय विशेष को समझाने का पार्टी का प्रयास लगातार जारी रहेगा ताकि प्रदेश में बहुप्रतीक्षित राजनीतिक परिवर्तन हो सके।’ जाहिर-सी बात है कि आजमगढ़ और रामपुर में चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखने वाले अखिलेश यादव किस रणनीति के तहत मैदान में नहीं उतरे, ये तो वही जानें किंतु सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव सहित सैफई परिवार के तकरीबन सभी प्रमुख सदस्य और अन्य पार्टी नेता कोर वोट बैंक में भी जीत का भरोसा नहीं जगा पाए। रामपुर में भी आजम खां का करिश्मा नहीं दिखा। ऐसे में यूपी के सियासी रण में सन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार अजेय बनी बीजेपी को ट्विटर और ट्वीट के जरिये नहीं बल्कि मैदान में उतर कर मुकाबला करके ही चुनौती देने का कौशल जिसमें होगा, सन 2024 के लोकसभा चुनाव पर सीएम योगी ने कहा, ‘जनता ने परिवारवाद की राजनीति करने वालों को जवाब दिया है। यूपी की जनता जाति पेशेवर माफियाओं को शरण देने वाले दलों को स्वीकार नहीं कर रही है। ये जीत पीएम मोदी के विजन को आगे बढ़ाने का प्रयास है। 2024 में बीजेपी यूपी में प्रचंड बहुमत के साथ 80 लोकसभा सीटों में 80 सीटों पर जीत की तरफ बढ़ रही है। पूरे सूबे में सपा का बेसिक स्टेक्चर चरमरा सकता है। जो लोग चेहरे बदल के, झंडे बदल के, रंग बदल के अपने स्वार्थ सिद्ध करते रहे उस राजनीति को भाजपा ने समाप्त कराने की दिशा में जो ठोस पहल की है। अपने कार्यकतार्ओं को मान सम्मान दिया है जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी कठिन से कठिन राह को अपने लिए अनुकूल करने में सफल हो रही है।

 

लखनऊ से सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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