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श्री जगन्नाथ का नवकलेवर

श्री जगन्नाथ का नवकलेवर

हिन्दू धर्मावलंबी गण द्वापर में श्रीकृष्ण की लीला के बाद कलियुग में मुख्य देवता के रूप में श्रीजगन्नाथ (विष्णु) को ग्रहण करते हैं। महाप्रभु श्रीजगन्नाथ का एक नाम है दारुब्रह्म। इसका अर्थ है दारु और वे स्वयं हैं ब्रह्म। दारु के रूप में उनका क्षय होता है, ब्रह्म के रूप में वे अक्षय हैं। चतुर्थमूर्ति का शरीर काष्ठ निर्मित है। अत: उसका क्षय होता है। नवकलेवर के समय इस काष्ठ निर्मित शरीर को श्रीमंदिर परिसर में समाधि दी जाती है। पर बह्म को एक विशेष पूजा पद्धति में पुरातन विग्रह से निकाल कर नूतन विग्रह में विस्थापित कर दिया जाता है। इस प्राक्रिया को नवकलेवर कहते हैं।
मादलापांजी (श्रीमंदिर की दैनंदिनी लिपिबद्ध की जाने वाली पोथी) के अनुसार 1577 ई. में पहला नवकलेवर हुआ। तब भोई वंश स्थापनकर्ता रामचंद्र देव द्वारा यह प्रक्रिया की गई। दूसरी बार 1593 ई. और तीसरा 1608 ई. मंा हुआ। 1698 ई. में नवकलेवर न होकर केवल श्रीअंग को खोला गया। इसके बाद 1714, 30, 49, 68, 90, 1809, 28, 55, 74, 93, फिर बीसवीं सदी में 1912, 31, 50, 69, 77, 96 में हुआ श्रीजी का 25वां नवकलेवर इक्कीसवीं सदी में पहली बार 2015 जुलाई में हुआ है। यह गजपति दिव्य सिंह देव के समय में हो रहा है।

श्रीजगन्नाथ की दिव्य लीलाओं में नवकलेवर मानवधर्मी लीला है। महाभारत युद्ध में अपने परिजन और कुटुम्बजनों की हत्या को अनिच्छुक और विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने समझाया। ‘वासंसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।’ अर्थात आत्मा नित्य है। शरीर अनित्य है, जैसे वस्त्र पुराने होने पर लोग उसे त्याग कर नूतन वस्त्र पहनते हैं। वैसे ही जीवात्मा जीर्ण शरीर त्याग कर नूतन शरीर में प्रवेश करती है। यह है विधि का विधान। जन्म-मृत्यु के चक्र को तोड़ मुदगर से कूटा जाता है-
”पुनरपि जनमं पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनं’’
शास्त्रों में वर्णन आता है दो आषाढ़ माह में जारा के शराघात से श्रीकृष्ण ने देह त्यागी थी। श्रीकृष्ण के इस लीला संवरण के बाद सखा अर्जुन ने उनकी अंत्येष्टि क्रिया के लिए शरीर में अग्नि संयोग किया। पर श्रीकृष्ण पूरी तरह भस्मीभूत नहीं हुए। आकाशवाणी के निर्देशानुसार अदग्ध नाभिमंडल को अर्जुन ने सागर में प्रवाहित कर दिया। यह अदग्ध नाभिमंडल पश्चिमी सागर से तैरते-तैरते पूर्वी उपकूल में लगा। राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्नादेश हुआ-इस पवित्र दारु को सम्मान सहित स्वीकार कर विष्णु की मूर्ति निर्माण कर पूजार्चना करो। किंवदंती है महाराज इंद्रद्युम्न ने पहले दो आषाढ़ में तैरकर आये दारु से विग्रहों का निर्माण किया।
श्री जगन्नाथ का नवकलेवर अनूठा महोत्सव है। देह धारी मानव जैसे पुरातन शरीर त्याग करते हैं। अविनाशी आत्मा नूतन शरीर धारण करती है। वैसे ही श्रीजगन्नाथ महाप्रभु अपना पुराना शरीर त्याग,नूतन शरीर धारण करते हैं।
नीम वृक्ष विग्रह के लिए सर्वजन ग्राह्म और पूजा के लिए ग्रहणीय है। श्रुत संहिता के वर्णनानुसार वृक्ष चयन करने के कुछ नियम हैं, जैसे वृक्ष पुरातन हो। मोटे तने वाला हो। वृक्ष किसी नदी, श्मशान, आश्रम के निकट हो, वृक्ष में शांख-चक्र-गद-पद्म विष्णु के चतुर्थ धारण के संकेत हों। वृक्ष के पाद देश में बांबी हो। कोई पक्षी का घोसला न हो, वृक्ष के नीचे सर्प निवास हो, वृक्ष के तने में 10-12 फुट तक कोई शाखा प्रशाखा न हो। इन नियमों में आधे तो पूरे हो रहे हो। श्रुत संहिता में उल्लेख है- श्रीजगन्नाथ का दारु कृष्ण वर्ण, श्रीबलभद्र का श्वेतवर्ण, श्रीसुभद्रा का पीतवर्ण, सुदर्शन का रक्तवर्ण होना विधेय है। नवकलेवर की सारी प्रक्रिया पांच भाग में विभक्त है -वनयोग और दारु अन्वेषण दारु छेदन, दारु ससम्मान आनयन और विग्रह निर्माण, ब्रह्म परिवर्तन और महाअणस गुप्त कार्य, पुरातन विग्रहों को कोइलि बैकुंठ समाधि (पाताली) करना, नूतन विग्रहों का नव यौवन दर्शन।

जिस वर्ष नवकलेवर होना तय होता है। उस वर्ष चैत्रमाह में शुक्ल रामनवमी के अगले दिन(दशमी) से श्रीजगन्नाथ के वंशधर रूप में परिचित दइतापति, पतिमहापात्र, ब्राह्मण (पुरोहित), स्वाइं महापात्र, चार बाड़ के चार जन, एक लेंका, एक तढउकरण, मंदिर सिपाही, आदि वनयोग विधि में पति महापात्र, श्रीजी से आज्ञामाल ग्रहण करते हैं। फिर गजपति महाराज के श्रीहस्त स्पर्श किया सुपारी-नारियल विश्वावसु राजगुरू से ग्रहण करते हैं। फिर दारु अन्वेषण निमित चल पड़ते हैं। यह पैदल चल कर काकटपुर पहुंच कर पहले देवली मठ में टिकते हैं। कहते हैं कि मां मंगला पहले इसी मठ में पूजापाती रहीं। बाद में दो कि.मी. दूरी पर नवनिर्मित मंदिर में स्थानांतरित हो कर पूजा पाती रहीं। अगली सुबह प्राची नदी में स्नान कर देवली मठ से सब आज्ञामाल और पुरी से लाई सारी भोग सामग्री मंगला मंदिर के पूजकों को प्रदान करते हैं। यहां पूजार्चन कर, दइतापति गण गुहारिया (निवेदक) बनते हैं। गुहार के दूसरे दिन साधारणत: स्वप्नादेश पाकर दइतापति गण पहले सुदर्शन का दारु और फिर बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ के दारु ढूंढने के लिए निकलते हैं।
दारु चयन के बाद छेदन कार्य पहले महापात्र स्वर्ण कुल्हाड़ी से शुरू करते हैं। बाद में चांदी की कुल्हाड़ी से दइतापति स्पर्श कराते हैं। अब विश्वकर्मागण लोहे की कुल्हाड़ी से स्पर्श करते हैं। तब फिर महारणा गण छेदन कार्य संपन्न करते हैं। भूतलाशायी वृक्ष की नाप के अनुसार टुकड़ा काट कर वृक्ष का तना रखते हैं। इसे चउपट कहा जाता है।

दारु संग्रह के बाद विशेष आठ हाथ की शगड़ी बनाते हैं उसमें दारु को मंदिर तक लाते हैं। विधान के अनुसार पहले सुदर्शन फिर बलभद्र, सुभद्रा और अंत में जगन्नाथ के दारु को देवस्नान पूर्णिमा से पहले ला कर उत्तरद्वार के पास कोइली बैकुंठ में रखते हैं। उन्हें श्रीमंदिर की उत्तर दिशा में निर्मित कर्म कुटीर में रखा जाता है। फिर विग्रह निर्माण का शुभारंभ होता है। यहां कोइली बैकुंठ में नवकलेवर के लिए स्वतंत्र रूप से अस्थायी अंकुरारोपण गृह, निर्माण मंडप, यज्ञ मंडप, दो अधिवास गृह और एक न्यास दारु गृह बनता है। यहां ग्यारह दिन तक यज्ञोत्सव होता है। गजपति महाराज द्वारा कृष्ण चतुर्दशी को पूर्णाहुति प्रदान कर निर्माण कार्य समापन होता है। चतुर्दशी की शेषरात्रिनि तथा अमावास को नवकलेवर का द्वितीय पर्याय की नीति यानी घट परिवर्तन होता है। चार बाड़ ग्राही पुरातन विग्रह से गुप्त ब्रह्म लेकर निर्दिष्ट ब्रह्म रंध्र में स्थापन करते हुए न्यास दारु से द्वार बंद करते हैं। इस ब्रह्म वस्तु को अलोचकों ने हाथी दांत, शालेग्राम, बुद्ध का बांई जड़ का दांत आदि कहा है। पर इसका सत्य-असत्य आज तक निरूपण नहीं हो सका। बाद में पुरातन विग्रह ले कर कोइली बैकुंठ स्थित सेवली लता तले समाधि (पाताली) देते हैं। लोकाचार में यह पुरातन विग्रहों का गोलोक विश्राम है।
कृष्ण चतुर्दशी से शुक्ल नवमी तक महाप्रभु के श्रीअंग में श्वेत अंगराग लेपन होता है बाद मे पूर्णरूप से अंगराग संपन्न होने पर अमावस के दिन नेत्रोत्सव और फिर नवयौवन दर्शन आदि अणसर पिंडी पर होते हैं। श्री जगन्नाथ आदि चारों विग्रहों का नवकलेवर विधान इस प्रकार संपन्न होता है।

डॉ. अच्युत सामंत

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