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काबिल मंत्री का नाकाबिल बजट ?

काबिल मंत्री का नाकाबिल बजट ?

By अरविन्द मोहन

अगर कुछ भी संकेत दिखते हैं तो यही कि बजट बड़ी बेशर्मी से कॉरपोरेट सेक्टर के पक्ष में झुका हुआ है और कोई चुनी हुई सरकार यह कर सकती है यह समझना आसान नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण कॉरपोरेट कर में पांच फीसदी की कटौती और सम्पत्ति कर की समाप्ति तो है ही, इस बार कम्पनी खोलने और बन्द करने का काम एकदम बिना किसी रोक-टोक वाला बना देना है।

भारी तैयारी और उससे भी ज्यादा शोर के बाद अरुण जेटली और भाजपा सरकार का जो कथित पहला पूर्ण बजट आया है उसे देख-समझ कर यह अनुमान लगाना कठिन है कि इसमें ऐसा क्या खास है जिसकी इतनी तैयारी की गई थी या जो पिछली सरकारों के बजट से अलग है। अगर नाम और तारीख छुपा दिया जाए तो यह यूपीए सरकार का ही बजट लगेगा और इससे कोई मेक इन इंडिया मुहिम का रूप ले पाएगा यह समझना मुश्किल है। इस साल से भी अधिक जेटली का पिछली बार का ही बजट ज्यादा साफ दिशा वाला लगता है। आप उस दिशा से सहमत हों, असहमत हों पर यह लगता था कि उसमें उदारीकरण के दूसरे दौर के बचे काम पूरे करने की बेचैनी है। इस बार तो वैसा भी कुछ नहीं दिखता। अगर कुछ भी संकेत दिखते हैं तो यही कि बजट बड़ी बेशर्मी से कॉरपोरेट सेक्टर के पक्ष में झुका हुआ है और कोई चुनी हुई सरकार यह कर सकती है यह समझना आसान नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण कॉरपोरेट कर में पांच फीसदी की कटौती और सम्पत्ति कर की समाप्ति तो है ही, इस बार कम्पनी खोलने और बन्द करने का काम एकदम बिना किसी रोक-टोक वाला बना देना है। इसके साथ अगर श्रम कानूनों में पिछले सत्र में हुये बदलावों को याद करें तो साफ हो जाएगा कि सरकार पूंजी के आगे किसी बात का लिहाज रखने को तैयार नहीं है। आपकी जेब में रखे पैसे को सरकार किसी भी नाम से अपने खाते में कर लेना चाहती है, कुछ नहीं तो पेंशन फंड में जमा या बेटी की शादी के नाम से जमा राशि के कर में छूट देकर। पांच लाख तक आयकर की सीमा को हर बजट के समय रटने वाले अरुण जेटली को अपना पूर्ण बजट रखते हुए यह चीज क्यों याद नहीं रही इसका जबाब वही दे सकते हैं।

दूसरी ओर सरकार पैसे वालों से किसी भी किस्म की सख्ती के पक्ष में नहीं है। वह काला धन वापस लाने के नाम पर काफी वोट पा चुकी है और उसने दिखावे के लिए दो कानून बनाने की घोषणा भी की, लेकिन जब जेनरल ऐंटी अवाडेंस रूल्स ऑफ टैक्सेशन (गार) और रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स छोड ही देना है तो इस दिखावे की क्या जरूरत है। देश में लगने वाली पूंजी के मालिक का अता-पता भर मांगने वाले गार कानून को लेकर कई साल से बवाल चल रहा और पार्थसारथी सोम कमेटी जैसे न जाने कितने अध्ययन भी हो चुके हैं, पर उसे फिर टाल कर काला धन वालों को अवसर दिया गया है। रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स के सबसे चर्चित मामले में अरुण जेटली स्वयं वोडाफोन के वकील रहे हैं। मामला हजारों करोड़ का है और कई अन्य कम्पनियों का भी है, पर उन सबको भी माफी मिल गई। अब अगर कोई कहे कि जेटलीजी कालाधन भी रोकेंगे और गार तथा  काला धन भी छोड़ देंगे तो यह जादू है कि भुलावा, कोई भी समझ सकता है।

लेकिन जेटली ने एक जादू जरूर कर दिया। उन्होंने  सम्पत्ति और आमदनी का भेद खत्म कर दिया। अब आपके पास अरबों की दौलत रह सकती है और आमदनी न हो तो कोई कर नहीं या ज्यादा से ज्यादा आपके कर में दो फीसदी की वृद्धि होगी। सम्पत्ति कर खत्म होकर आमदनी पर सरचार्ज वसूलना कहाँ तक उचित है? तय मानिए कि यह सवाल कोई नहीं उठाएगा। एक और दिलचस्प मामला यह है कि  एक साल का बजट तथा चार साल और सात साल की योजना भी जेटलीजी ने चला दी है। कॉरपोरेट टैक्स में पांच फीसदी की कमी और कम्पनियों को हर साल मिलने वाली लाखों करोड़ के छूट में यही किया गया है। बजट में 2022 तक सबको आवास की चर्चा भी है। अब इस साल तो घरेलू भवन निर्माण उद्योग मुंह ताकता रह गया पर 2022 तक सबको आवास का फैसला कैसे हो गया?

एक और बड़ी बात सब्सिडी घटाने की है।  विश्व बैंक की लॉबी समेत बहुत से लोग इसके लिए वाह-वाह कर रहे हैं। सब्सिडी कम करना और राजकोषीय घाटे को कम करना कोई बहुत बड़ा लक्ष्य नहीं है। बीते दो दशकों में जब दस फीसदी से ज्यादा तक का विकास दर हासिल किया था, तब भी राजकोषीय घाटा विश्व बैंक द्वारा सुझाए तीन-साढ़े तीन फीसदी से काफी ऊपर रहता था। फिर यह भ्रम भी है कि डाईरेक्ट कैश ट्रांसफर से लीकेज रुकेगा। असल यह मामला ही नहीं है। असलियत यह है कि काफी सारे गरीब अभी तक इस दायरे से बाहर थे। सरकारी आंकड़े के हिसाब से भी अगर 12-15 करोड़ गरीबों अर्थात जनधन खाताधारक परिवारों को डाईरेक्ट सब्सिडी देने से सब्सिडी का बोझ घटेगा या बढ़ेगा? फिर सब्सिडी घटाने का दावा क्यों?

काम शुरु कीजिये मंजूरी बाद में लीजिये, यह इस बजट का सबसे कल्पनाशील और प्रभावी फैसला बताया जा रहा है। ऐसा लगता है कि सरकार पूंजी लगाना और औद्योगिक उत्पादन करना बच्चों का खेल मान रही है। मंजूरी बाद में लेने के नाम पर कितनी पूंजी आएगी यह कहना मुश्किल है क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूंजी लगाने से पहले हर तरफ से निश्चिंत और सुरक्षित हो लेना चाहता है। असलियत तो यह है कि एमओयू अर्थात पूंजी लगाने के करार के बाद भी दस फीसदी वायदे पूरे नहीं होते। भूमि अधिग्रहण और मुआवजा कानून के चक्कर में ही लाखों करोड़ की पूंजी फंसी है। कायदे से सारी बाधाएं दूर करने का एक मतलब होता, पर वह करने और अन्य परेशानियों को दूर करने, पिछड़े और ऊसर इलाकों में उद्योग लगाने, इको बढ़ावा देने की नीति लाने की जगह हवाई उड़ान वाली ये नीतियां कहां तक फायदा देंगे, यह कहना मुश्किल है। उद्योग जगत की राय है कि फैक्टरी बन्दी को आसान बनाने वाली घोषणा का लाभ होगा। तो तय कीजिये कि आप काम बढ़ाने वाले मंत्री हैं या काम खत्म कराने वाले।  फिर सरकार द्वारा छंटनी और मजदूर की देनदारी की रखवाली कहां गई?

ऐसी कई चीजें हैं जिन पर चुनाव के समय या पिछले बजट में भी काफी चर्चा थी। इस बार फौजी ढूंढते रह गए कि एक रैंक, एक पेंशन की घोषणा कहां गई। फिर भवन निर्माण उद्योग के लोग अपनी परेशानियों के निवारण के साथ आम लोगों के लिए मकान खरीदने को प्रोत्साहन देने सम्बन्धी घोषणा का इंतजार करते रहे। उन्हें सौ स्मार्ट शहर बनाने की योजना के बारे में भी कुछ न सुनकर निराशा हुई, जबकि पिछले साल आवंटित रकम में एक भी पैसा खर्च नहीं हुआ। निर्भया फंड का भी एक पैसा खर्च नहीं हुआ, पर इन दोनों मदों में नई राशि दी गई। बुलेट ट्रेन का शोर न रेल बजट में था, न इंफ्रास्टक्चर संबंधी बजट घोषणाओं में। हां,  स्वच्छ भारत सरचार्ज हर कहीं पांव पसारता लगा और अभी भी उसकी सीमा समझ नहीं आ रही है। सबसे निराश किसान हैं जिनके सिर पर भूमि अधिग्रहण कानून की तलवार तो लटकी ही है वे पूछ रहे हैं कि उसके पैदावार के लागत पर पचास फीसदी ज्यादा कीमत देने के लिये कौन-सी सरकार आएगी?

21-03-2015

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