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अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं

अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं

योग दिवस को बीते अब काफी दिन हो गये हैं, इसलिये उस अवसर पर हुई चर्चा का अब शांत चित्त से विषलेशण किया जा सकता है। उत्तेजित वातावरण में की गई चर्चा कई बार वस्तुनिष्ठ नहीं रह पाती।

इक्कीस जून को दुनिया भर में योग दिवस के तौर पर मनाया गया। ऐसा निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ ने लिया था। किसी घटना विशेष या किसी मूल्य विशेष की महत्ता को अंकित करना हो तो संयुक्त राष्ट्र संघ उसके लिये अनेक प्रयत्न करता है। उनमें से एक तरीका यह भी होता है कि किसी दिन को उस घटना या मूल्य विशेष के नाम समर्पित कर दिया जाता है। योग भी भारतीय परम्परा की शताब्दियों पुरानी एक ऐसी बेजोड़ पद्धति है जो मन और तन दोनों को स्वस्थ रखती है। योग सभी विचार धाराओं, आस्थाओं, विश्वासों, पंथों को समान रुप से आकर्षित करता है। महर्षि च्यवन से लेकर आधुनिक महर्षि कार्ल माक्र्स तक की शिष्य मंडली, जो केवल मैटर या भौतिकता में ही विश्वास रखती है, उनके लिये भी योग एक पूर्ण विधा है, क्योंकि यह पद्धति तन को स्वास्थ रखती है। इसके विपरीत उनके लिये, जिन्हें यह सारा भौतिक जगत मिथ्या दिखाई देता है, केवल चेतन ही स्थाई है, योग एक सम्पूर्ण विधा है, क्योंकि यह मन को भी नियंत्रण में रखने का अभ्यास करवाता है। योग सूत्र तो योग की परिभाषा ही देता है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध या नियंत्रण ही योग है। जो नास्तिक हैं, उनके लिये योग केवल तन की साधना है और जो आस्तिक हैं, उनके लिये तन के बाद यह मन की भी साधना है और उसी के बाद उस सर्वशक्तिमान की साधना संभव है। इसीलिए माना गया है कि योग की व्याप्ति सर्वत्र है। इसमें कोई संशय भी नहीं है कि स्वस्थ तन में स्वस्थ मन की साधना की लाजवाब पद्धति योग है।

लेकिन, दुर्भाग्य से हजार साल की विदेशी गुलामी के कारण, भारत की ऐसी अनेक लाजवाब चीजें अंधेरे में गुम होने लगीं। इससे भी बढ़कर दुर्भाग्य यह था कि भारत सरकार ने भी देश की परम्परागत विरासत को पंथ निरपेक्षता के नाम पर सार्वजनिक तौर पर नकारना शुरु कर दिया। इसका श्रेय भारत के साधु सन्तों को जायेगा कि उन्होंने तमाम प्रकार की शासकीय अवहेलना के बावजूद योग पद्धति को यूरोप और अमेरीका के देशों में लोकप्रिय बनाया। विवेकानन्द ने तो एक बार कहा भी था कि जब यूरोप का ठप्पा मिट्टी पर भी लग जाता है तो उसे भारत में सोना मान लिया जाता है। योग पद्धति तो थी ही खालिस सोना। उस पर यूरोप और अमेरीका का ठप्पा लगा तो दिल्ली में सरकार का संकोच भी कुछ सीमा तक कम हुआ और योग को आंशिक सरकारी मान्यता मिली। वैसे एक श्रेष्ठ पद्धति के नाते योग को इस मान्यता की जरुरत नहीं थी। दिग्विजय सिंह और शकील अहमद जैसे लोग जब कहते हैं कि योग तो भारत में पहले से ही था, इसे नरेन्द्र मोदी लेकर तो नहीं आये, तो वे ठीक ही कहते हैं। लेकिन, वे आगे की बात नहीं बताते। आज तक भारत सरकार में इतना साहस नहीं था कि वह सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार करें कि योग भारत का खजाना है। सरकार इसका नाम लेने या इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने को ही दरअसल साम्प्रदायिकता समझती रहीं और पंथ निरपेक्षता के नाम पर इससे बचती रहीं। शकील अहमद किसी पुराने अखबार में शीर्षासन लगाये नेहरु का चित्र लेकर घूम रहे हैं। अंग्रेजी शासन पद्धति में पली बढ़ी कांग्रेस के लोग व्यक्तिगत जीवन में योग की प्रशंसा करते थे, लेकिन सार्वजनिक जीवन में इसे स्वीकारने का साहस नहीं कर पाते थे। यह पाखंड की पराकाष्ठा है। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पहली बार इस पाखंड को समाप्त किया है।

01-08-2015

नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद पहली बार प्रयास हुआ कि विश्व संस्कृति या ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय योगदान को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया जाये। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अब तक हुई अपनी भूल को स्वीकारते हुये 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। इस दिन को दुनिया भर में योग दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है। लेकिन, इस बात का आश्चर्य है कि कुछ लोगों ने योग को इस्लाम विरोधी घोषित करना शुरु कर दिया है। कुछ स्थानों पर इन लोगों ने मुसलमानों से योग कार्यक्रमों में भाग न लेने की अपील की है। योग पद्धति इस्लाम के पैदा होने के पहले से ही प्रचलित है और यदि गहराई से देखा जाये तो नमाज भी योग का ही प्रकारान्तर है। इस्लाम का भारत में आगमन तो अभी कल की घटना है और योग का विकास व परिष्कार सहस्रों-सहस्रों साल पुराना है। इस्लामी देशों में भी योग का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। वहां योग का कोई विरोध नहीं करता। लेकिन भारत में इस्लाम के नाम पर योग का विरोध किया जा रहा है, इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है?

कुछ लोग यह तो स्वीकार करते हैं कि योग एक सम्पूर्ण विज्ञान है, लेकिन इसे अध्यात्म से जोड़ा जा रहा है, इसलिये मुसलमान योग का विरोध करते हैं। यह और भी विचित्र और खोखला तर्क है। फिजिक्स तो शुद्ध विज्ञान ही माना जाता है। लेकिन, फिजिक्स और मैटाफिजिक्स का गहरा रिश्ता है। मैटाफिजिक्स का भारतीय भाषाओं में अनुवाद अध्यात्म ही होता है। विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिये योग को केवल अध्यात्म के कारण ही इस्लाम विरोधी कैसे ठहराया जा सकता है? वैसे भी कोई हठयोग तक ही सीमित रहना चाहे, तो क्या आपत्ति हो सकती है? जिन क्षेत्रों में भारतीय विज्ञान ने आशातीत उन्नति की थी, उनमें से योग भी एक है। योग, विशेषकर हठयोग शरीर की वैज्ञानिक संरचना पर आधारित एक ऐसा विज्ञान है, जिसने अपनी उपादेयता आज तक बनाए ही नहीं रखी, बल्कि उसमें इजाफा भी किया है। यह विज्ञान व्यक्ति की जीवन शैली को प्रभावित करता है और उसे भविष्य में होने वाली बीमारियों से बचाता है। इस विज्ञान का विरोध औषधि निर्माण के धन्धे में लगी कम्पनियां करें तो बात समझ में आ सकती है। योग के अभ्यास से बीमारियां कम होंगी तो औषधि विक्रेता घाटे में रहेगा। लेकिन, इस्लाम ने आखिर यह विज्ञान विरोधी रुख क्यों अपनाया है? क्या कारण है कि योजनाबद्ध तरीके से इस्लाम को योग के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है? यह वही मानसिकता है जो भारतीयता को इस्लाम विरोधी स्थापित करने पर आमादा है। यह निश्चय ही दुखदायी है। लेकिन इसमें विरोध में भी आशा की एक किरण दिखाई दे रही है। मुसलमानों के भीतर से ही युवा पीढ़ी ने इस्लाम के भीतर व्याप्त इस कठमुल्लापन का विरोध करना शुरु कर दिया है। चाहे उनकी संख्या फिलहाल कम है, लेकिन उनकी भी आवाज सुनाई देने लगी है।

प्रयास किया जाना चाहिये की योग युवा पीढ़ी, खासकर छात्रों की जीवन शैली का अंग बने। यदि स्कूल में छोटी उम्र में ही बच्चों को योग की आदत पड़ जाती है तो यह आदत सारी उम्र उन्हें लाभ दे सकती है। बहुत सी बीमारियां जो केवल बदली जीवन शैली के कारण हमारे जीवन में प्रवेश कर गई हैं, उन से भी छुटकारा मिलने की संभावना बढ़ जाती है। योग को लेकर यह सारी सक्रियता इसी आन्दोलन का हिस्सा है। लेकिन, ताज्जुब है आज भी कुछ कठमुल्ला बिना योग को जाने ही इसका विरोध कर रहे हैं। न्यू टैस्टामैंट में कहा गया है, ‘परमात्मा इन्हें मुआफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।’ अज्ञानता या अनजाने में किसी चीज का विरोध करना भूल मानी जाती है इसलिये उसमें सुधार की गुंजाइश होती है। लेकिन, जान-बूझकर कर किसी चीज का विरोध करना, या तो निहित स्वार्थों के कारण हो सकता है या फिर किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी योग का विरोध किया है। लेकिन उसके बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है। इसलिये उसके विरोध में लगता है एक लम्बी रणनीति और गहरा षड्यन्त्र छिपा है। अनेक मुस्लिम संस्थाओं का विरोध, मोटे तौर पर यहां तक सीमित था कि शिक्षा संस्थानों में बच्चों को योग करने के लिये मजबूर न किया जाये। लेकिन, मुस्लिम बोर्ड ने इसके विरोध में जो तर्क दिये हैं, उनमें स्पष्ट तौर पर षड्यंत्र के संकेत सुनाई देते हैं। इन तर्कों की दिशा अंग्रेजी शासन के दिनों में गोरे महाप्रभुओं द्वारा अपनाई गई दिशा से मिलती-जुलती है। अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (अभामुपलाबो) के कार्यकारी महासचिव मौलाना वली रेहमानी ने योग दिवस से पहले देश भर में फैली मुस्लिम संस्थाओं को एक पत्र लिखकर आगाह किया था जिसमें उनको सतर्क किया गया कि-

  1. इस्लाम की शिक्षाओं पर हमला हो रहा है, इसका मुकाबला करने के लिये चौकन्ने रहने की जरुरत है।
  2. हिन्दुत्व की ताकत से लडऩे के लिये हम अपने सभी मतभेद भुला दें।
  3. केन्द्रीय सरकार सूर्य नमस्कार, योग और वन्दे मातरम इत्यादि को प्रचारित कर रही है जो इस्लाम के खिलाफ है। पत्र लिखने से पहले बोर्ड ने बाकायदा सात जून को लखनऊ में अपनी कार्यकारिणी की बैठक बुला कर उसमें योग को गैर इस्लामी घोषित करते हुये प्रस्ताव पारित किया।

ये तीन चेतावनियां देने के बाद मौलाना ने कहा, ‘यह ब्राह्मण धर्म और वैदिक संस्कृति हर प्रकार से इस्लामी आस्थाओं को क्षतिग्रस्त करेगी।’ अभी तक जो मुसलमान या मुस्लिम संगठन योग का विरोध कर रहे थे उनका तर्क था कि योग का प्रचार एक प्रकार से हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार ही है, इसलिये मुसलमानों को इससे बचना चाहिये। लेकिन, अभामुपलाबो ने बहुत सोच समझ कर ब्राह्मण धर्म शब्द का प्रयोग किया है। दरअसल यह शब्द अंग्रेजी शासकों ने भारतीय संस्कृति और आस्थाओं के लिये प्रयोग करना शुरु किया था। अंग्रेजों की मंशा थी यदि भारतीय संस्कृति, परम्पराओं और विधि-विधानों को केवल ब्राह्मणी संस्कृति प्रचारित कर दिया जाये तो धीरे-धीरे शेष भारतीय इसे अपना न समझ कर इससे टूटने लगेंगे और एक शून्य व्याप्त हो जायेगा, जिसे बाद में चर्च के लिये काम करने वाली मिशनरियां आसानी से भर सकती हैं। दुर्भाग्य से अब उसी रास्ते पर चल कर, पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना वली रेहमानी भारत में वही प्रयोग दोहराना चाहते हैं। मौलाना का यह षड्यंत्रकारी प्रयोग चिन्ता पैदा करने वाला तो है ही, साथ ही मौलाना की बिरादरी के लोगों की भीतरी मानसिकता को भी उजागर करता है। अंग्रेज शासकों के वक्त के षड्यंत्रों को पुन: सक्रिय करने के उत्साह में मौलाना एक महत्वपूर्ण नुकता भूल गये हैं। भारत के जिन मुसलमानों को चिट्टियां लिख-लिख कर उन्हें तथाकथित ब्राह्मणी धर्म से बचने का उपदेश दे रहे हैं और बता रहे हैं कि इस ब्राह्मणी धर्म के स्पर्श मात्र से भारत में इस्लाम नष्ट हो जायेगा, वे लोग इसी भारतीय संस्कृति की उपज हैं, उनके पूर्वज हिन्दू ही थे, अन्तर केवल इतना ही है कि उन्होंने विकास के स्वाभाविक क्रम में कुछ बातें इस्लाम की भी ग्रहण कर ली हैं। लेकिन, ध्यान रखना चाहिये उन्होंने अपनी मूल जमीन छोड़ी नहीं है। अंग्रेजों ने जब इस देश में पहली बार जनगणना शुरु की तो उन्होंने ऐसे लोगों को मुसलमान लिखना शुरु कर दिया जिन को मौलाना और शायद उनकी बिरादरी भी मुसलमान कह कर सम्बोधित कर रही है, वे आज भी घरों में अपने पुरखों का गुणगान करते हैं, जो हिन्दू ही थे।

01-08-2015

दरअसल भारत में जिन लोगों को मुसलमान कह कर प्रचारित-प्रसारित किया जाता है, उनमें दो तरह के लोग हैं। नब्बे प्रतिशत लोग तो वे हैं, जिनके पूर्वज हिन्दू ही थे और जिन्होंने कालप्रवाह में, किन्हीं कारणों से, इस्लाम के भी कुछ कर्म-कांडों को अपना लिया था। नाम भी अरब के लोगों की तरह ही रखने शुरु कर दिये थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी मूल मिट्टी को नहीं छोड़ा था। दस प्रतिशत के लगभग (यह महज अन्दाजा है) लोग ऐसे हैं जो मुसलमान ही हैं, क्योंकि इनकी जड़ भारत में नहीं है। ये लोग वो हैं जो विदेशी शासकों के साथ भारत आये थे, या फिर स्वतंत्र रुप से अरब, इरान से भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने के लिये भारत आये थे। उनकी पहचान स्पष्ट है। भारत के वे लोग, जिन्होंने इस्लाम की भी कुछ बातें ग्रहण कर लीं और नाम भी उसी प्रकार के रख लिये, वे पूछने पर फट से आपको अपना गोत्र भी बता देंगे। ये सब गोत्र वही हैं जो यहां के दूसरे सभी लोगों के हैं। लेकिन जो मुसलमान विदेश से आये हुये हैं, वे गोत्र पूछने पर बगलें झांकने लगेंगे। जब वे अपने पूर्वकाल की तलाश करते हैं तो उनकी जड़ अरब और इरान में मिलती है। सैय्यद इसी प्रकार के मुसलमान हैं। ये लोग अभी भी बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी में उन भारतीयों का नेतृत्व संभालने के स्वप्न देख रहे हैं, जिन्होंने कुछ बातें इस्लाम की भी ग्रहण कर रखीं हैं। इन विदेशी मुसलमानों में से भी कुछ ने अपनी जड़ भारतीय मिट्टी में रोप ली होगी और वे यहां की मिट्टी से भावात्मक रुप से जुड़ गये होंगे और अरब-इरान के मोह से छूट गये होंगे, लेकिन कुछ अभी भी मध्यकालीन ओटोमन साम्राज्य को पुनर्जीवित करने के स्वप्न पाल रहे हैं। मौलाना की तथा-कथित भारतीय मुसलमानों को लिखी गई चिट्ठी को इसी पृष्ठभूमि में देखना चाहिये।

मोहम्मद अली जिन्ना ने अंग्रेजी शासन की सहायता से यही प्रयोग, अपने तात्कालिक राजनैतिक हितों और ब्रिटिश-अमेरिकी साम्राज्य के व्यापक हितों की रक्षा के लिये पाकिस्तान बना कर किया था। लेकिन, मौलाना ऐसी चिट्टियां क्यों और किसके हितों के लिये लिख रहे हैं? मौलाना ने देश की छोटी-बड़ी मस्जिदों के इमामों को चिट्ठी लिख कर आगाह किया कि भारत सरकार योग और सूर्य नमस्कार का प्रचार करके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा लागू कर रही है। वैसे मुस्लिम लॉ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में इमामों से इस प्रकार की खतोखिताबत नहीं आती। उस का काम केवल मुस्लिम विधि पर विचार व व्याख्या करना है। लेकिन, मौलाना साहब को चिट्टियां लिखने की आदत लगती है या फिर वे भारत में निजाम बदलने से बौखला गये हैं। उन्हें शायद नहीं पता कि योग और सूर्य नमस्कार 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना के पहले से ही प्रचलित है। योग केवल संघ की स्थापना से पहले से नहीं, बल्कि इस्लाम के पैदा होने से भी पहले से प्रचलित है। इसलिये योग का प्रचलन संघ का एजेंडा नहीं बल्कि भारत का एजेंडा है। दो पन्नों की अपनी लम्बी चिट्ठी में मौलाना ने सभी इमामों को निर्देश दिया कि वे अपनी-अपनी मस्जिद में जुम्मे की नमाज के दिन इस विषय पर केवल चर्चा ही न करें बल्कि, मुसलमानों को इसके खिलाफ आन्दोलन के लिये तैयार करें।

भारतीय मुसलमानों को योग पर कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि योग विद्या उनके अपने ही पूर्वजों की विरासत है। लेकिन कुछ गिनती के मुसलमान जो सैकड़ों साल पर अरब, ईरान और तुर्की हमलों के समय यहां आये थे और बाद में यहीं बस गये, इतने सालों बाद भी अपने आप को इस देश की विरासत और परम्पराओं से जोड़ नहीं पाये हैं। जब भी वे अपनी जड़ों को तलाशने की कोशिश करते हैं तो बार-बार अरब के रेगिस्तानों में स्वयं को पाते हैं। यही कारण है कि उन्हें सभी भारतीय परम्पराएं इस्लाम विरोधी लगती हैं। मौलाना अब भारतीय मुसलमानों को विद्रोह और आन्दोलन के लिये उकसा रहे हैं। ताज्जुब है वे इसके लिये उन मस्जिदों का प्रयोग करना चाहते हैं जो इबादतखाने के लिये प्रयोग होनी चाहिये। क्या मौलाना खुलासा करेंगे कि वे किसके एजेंडे पर काम कर रहे हैं?

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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