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व्यापम घोटाला क्या सीबीआई जांच से सच सामने आ पाएगा?

व्यापम घोटाला क्या सीबीआई जांच से सच सामने आ पाएगा?

आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यप्रदेश के चर्चित और अब तक के सबसे बड़े घोटाले कहे जा रहे व्यापम घोटाले की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी है। अदालत के फैसले के बाद हर कोई यही सवाल पूछ रहा है कि अब सीमाओं और संदेहों में उलझी जांच किस अंजाम तक पहुंचेगी? क्या सच सामने आएगा? वैसे भी सत्ता के ध्रुवों के बीच ये फैसला किसी के मान की जीत थी तो किसी के अभिमान की।

आखिर क्या है व्यापम घोटाला?

7 जुलाई 2013 का वो दिन था जब अखबारों में छपी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की धांधली की खबर आम हो चुकी थी। खबर इसलिए अहम थी, क्योंकि मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की सारी परीक्षाएं व्यापम के मार्फत ही होती थीं। पर उस वक्त कहीं से भी ये नहीं लगा कि ये व्यापम के महाघोटाले के खुलने की शुरुआत है। इसका मतलब ये नहीं कि इसके पहले मेडिकल परीक्षाओं में हो रही धांधली की जानकारी सरकार को नहीं मिली थी। जानकारी तो साल 2009 में ही विधानसभा में एक निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा ने दी थी। 2013 में भी इसी मामले को बहुत छोटे दायरे से ही देखा गया था। लेकिन सरकार को नहीं मालूम था ये एक गंभीर बीमारी की शुरुआत थी, जो आगे चलकर उसका पूरा वजूद ही निगल सकती है।

मेडिकल प्रवेश परीक्षा में घोटाले की खबर मीडिया में सुर्खियां बनी। प्रदर्शन शुरु हुए। विधानसभा स्थगित होने का सिलसिला चला तो सरकार ने एसटीएफ को व्यापम के भीतर चले बड़े गड़बड़ झाले की जांच के आदेश दिए। सियासत, साजिश और सनसनी सब एक साथ चल रही थी। साफ था प्रदेश की प्रतिष्ठित संस्था व्यापम बीमार है, ये तय हो चुका था। लेकिन अभी ये तय होना बाकी था कि व्यापम कितनी बीमार थी और उसको बीमार करने वाले लोग कौन थे, ये जानना, उन तक पहुंचना और उन्हे खींचकर निकालना एक बड़ी चुनौती थी।

01-08-2015एसआईटी ने जांच शुरू कर दी थी। डरावने आंकड़े सामने आने शुरू हो चुके थे। तब पहली बार पता चला कि मामला सिर्फ   मेडिकल एडमिशन में धांधली का नहीं था बल्कि करीब 1 हजार फर्जी भर्तियां तक हुर्इं। मतलब ये कि जो नाकाबिल थे उन्हें बाकायदे पैसे लेकर नियुक्तियां दे दी गईं थी। सब चौंक गए जब ये जानकारी सामने आई कि मेडिकल कॉलेजों में करीब इतने ही फर्जी एडमिशन कराए गए थे। अधिकारियों के रूप धरे ठगों का एक जाल व्यापम के भीतर बैठा था और किसी को पता भी नहीं चला।

इस मामले में पहली बड़ी गिरफ्तारी हुई डॉ.जगदीश सागर के तौर पर। ये वो शख्स था जिसने फर्जीवाड़े की फ्रेंचाइजी खोल रखी थी। तब ये भी पता चला कि व्यापम के भीतर अधिकारियों के नहीं, बल्कि शातिर ठेकेदारों के ऑफिस चल रहे थे। बाकायदा लाखों रुपए लेकर खुद कंट्रोलर एक्जाम पंकज त्रिवेदी और सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा अपात्र छात्रों की आंसरशीट भरते गए और उन्हें डॉक्टर बनाते गए। इतना बड़ा धोखा, इतने बड़े पैमाने पर ये सफेदपोश फरेब करते रहें। अब इसकी परतें खुलनी शुरू हो चुकी थीं।

करीब एक साल बाद विधानसभा में सरकार ने माना कि करीब 1 हजार फर्जी नियुक्तियां हुई थीं। करप्शन के जहर को धीरे-धीरे घोलते ये जालसाज एक नहीं कई पीढिय़ों का भविष्य दीमक की तरह चट कर चुके थे। व्यापम परजीवियों के लिए और उनके गंदे धंधे के लिए एक सुरक्षित अड्डा बना हुआ था। लेकिन, ये इस पूरे खेल का एक चैप्टर यानी अध्याय भर था। जांच शुरू जरूर हुई, लेकिन उसकी गति धीमी थी। गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो चुका था। लेकिन, जांच की गति को लेकर सवाल अभी भी थे। जितने बड़े पैमाने का ये सारा खेल था, जितनी गहरी साजिश थी, जितनी गहरी इसकी जड़े थीं, उसको खोलने-उधेडऩे के लिए गति वैसी तो कतई नहीं थी। शुरूआती जांच की इस गति से किसी नतीजे तक पहुंच पाना संभव तो नहीं लगता था।

प्रतिभागियों का दर्द

ऐसे ही तो उम्मीद टूटती गई थी हमारे नौजवानों की। मेधावी युवाओं के टूटते हौसले मुझे यानी व्यापम को छलनी कर रहे थे। तब इस मामले को ‘पीएमटी घोटाला’ नाम दिया गया था और 2013 में अक्टूबर महीने में ही पहली चार्जशीट इंदौर की एक अदालत में दायर कर दी गयी। एसटीएफ की चार्जशीट से एक बड़े घिनौने खेल का खुलासा हो रहा था। एसटीएफ ने बताया कि 438 परीक्षार्थियों ने अवैध रूप से मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने की कोशिश की थी और व्यापम के अधिकारियों ने परीक्षाओं में बैठने की व्यवस्था तक में बदलाव किया था। एसटीएफ ने संकेत दिया कि संदेहस्पद परीक्षार्थियों की संख्या 876 हो सकती है। अभियोग पत्र जमा करने से एक हफ्ते पहले ही परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी को गिरफ्तार कर लिया गया था। नवंबर, 2013 में एसटीएफ ने पाया कि व्यापम के अधिकारियों ने राज्य की नौकरियों की पांच परीक्षाओं में भी धांधली की थी।

जैसे सच सामने आ रहे थे व्यापम और सरकार के माथे पर कलंक बढ़ता जा रहा था। तमाम घटनाक्रमों के बीच इस पूरे घोटाले में तत्कालीन शिक्षामंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को सलाखों के पीछे भेजा गया। इसके कुछ महीने बाद जालसाजी के इस पूरे नेटवर्क की एक और अहम कड़ी सुधीर शर्मा की गिरफ्तारी भी हुई। एक बात साफ थी कि इस पूरे घपले में राजनेताओं की मिली भगत के खुलासे की ये बड़ी शुरूआत थी। इस सबके बीच सियासी पार्टियां मामले की सीबीआई जांच के लिए अड़ चुकीं थीं। व्यापम मुकम्मिल तौर पर एक भ्रष्ट संस्था के नाम से जानी जाने लगी। नवंबर 2014 में हाईकोर्ट ने एसआईटी का गठन किया। गिरफ्तारियों का दौर तेज होता गया। लगातार आरोपी या भ्रष्टाचार के जरिए एडमिशन या नौकरी पाने वाले लोग धड़ाधड़ सलाखों के पीछे धकेले जाने लगे और देखते ही देखते गिरफ्तारियों का ये आंकड़ा भी 2 हजार तक पहुंच गया। अब तक जो जांच बहुत धीमी गति से संकोच के साथ चलती दिखाई दे रही थी एसआईटी के गठन और हाईकोर्ट के सख्त होने के साथ उसमें तेजी आ गई। एसआईटी, एसटीएफ की जांच पर निगरानी रख रही थी, दिन गुजर रहे थे। हर उगता सूरज न जाने कितनी कुशंकाओं के साथ सामने आ खड़ा हो जाता। श्यामला हिल्स की हवाएं अब उतनी ठंडी नहीं रह गई थीं और अरेरा हिल्स की खूबसूरत तस्वीरों में भी व्यापम के भीतर तमाम काली कारगुजारियों की कहानियों की परत सी जम गईं थी। यहां की सड़कें विपक्ष के हंगामें से पटी पड़ी थीं। लेकिन, अभी कुछ और भी होना था।

मौत का सिलसिला

और यहां से लगा व्यापम और सरकार पर एक और बड़ा कलंक। कलंक कातिल होने का। ये कलंक सपनों का दम घोटने के बाद अब परिवारों को उजाड़ देने का था। घोटाले के आरोप में जेल में बंद या फिर बेल पर छूटे कुछ लोगों की मौत संदिग्ध थी। जाहिर है शक किसी पर भी हो खूनी सरकार को करार दिया गया। मौतें धीरे-धीरे हो रही थीं और जब इन मौतों का गणित एक साथ खड़ा हुआ तो सब कांप गए। करीब 40 से ज्यादा मौतें हुईं थीं। टुकड़ों में दर्ज ये आंकड़ा जब एक साथ खड़ा हुआ तो सरकार कांप गई। इनमें कई ऐसी मौतें थीं जो संदेह के दायरे में थीं। इनमें कई ऐसी मौतें थीं जिनकी कहानी काफी उलझी हुई थी। ये कोई गहरी साजिश हो-न-हो लेकिन कुछ प्रशासनिक अनदेखियां सबको खटकी जरूर थीं।

मौतों का जिम्मेदार कौन?

इन मौतों के पीछे का रहस्य दबा रह जाता अगर टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की भी संदिग्ध मौत न हुई होती। उज्जैन में रेल की पटरियों पर मिली मेडिकल छात्रा नम्रता डामोर की मौत की पड़ताल करने अक्षय उनके घर गए थे। नम्रता की संदिग्ध मौत के तार भी कहीं व्यापम घोटाले से जुड़ते दिख रहे थे। पर अफसोस अब अक्षय इस पर अपनी पड़ताल कभी पूरी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि व्यापम का दंश उन्हें भी डस ही गया। पर इस बार सब थमने वाला कतई नहीं था। अक्षय की मौत के साथ ही ऐसी तमाम रहस्यमय मौतें एक-एक कर जिंदा होती गई जिनका सूत्र व्यापम के भीतर चले करप्शन के खेल से कहीं जुड़ता नजर आता था। भ्रष्ट संस्था के बाद अब व्यापम को मुकम्मिल तौर पर एक खूनी संस्था करार दिया जा चुका था।

न जाने क्यों पर सबको सरकार के हाथ अब खून से रंगे दिख रहे थे। लोगों में गजब का आक्रोश था व्यापम के खिलाफ। जो संस्था कभी उम्मीदों और नई संभावनाओं को तलाशने की कड़ी थी, आज वहीं खूनी, भ्रष्ट और न जाने क्या-क्या हो गई थी। करीब ढाई हजार आरोपी, 2 हजार लोगों की गिरफ्तारी, मध्यप्रदेश की 20 अदालतों में दर्ज 55 केस और तूफान ने व्यापम और शिवराज सरकार का पूरा वजूद निगल लिया था। प्रदेश से निकलकर देश और विदेश तक में व्यापम एक ऐसा खौफ बन चुका है जो बेहिसाब है, खतरनाक है, करप्ट है और कातिल है।

शिवराज सरकार का यूटर्न

आखिरकार 7 जुलाई को वो दिन भी आ गया जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूरे व्यापम घोटाले की सीबीआई से जांच कराने के लिए हाईकोर्ट से गुजारिश करने का ऐलान किया। शिवराज सिंह चौहान ने कहा मैं रात भर सो नहीं सका और मैंने फैसला किया है कि सच सामने आना चाहिए व्यापम की जांच मैं सीबीआई को सौंपने की सिफारिश कर रहा हूं।

करीब 2 साल बाद सत्ता की धैर्य की सीमा टूटी थी। व्यापम घोटाले की जांच अब सीबीआई को दे देने का ऐलान सीएम शिवराज सिंह चौहान ने किया था। ठीक दो दिन बाद 9 जुलाई को इसी मामले पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में भी होनी थी। इसके अलावा राजभवन में बैठे एक शख्स के भविष्य पर भी फैसला होना था। 9 जुलाई 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने भी व्यापम के भीतर फैले भ्रष्टाचार के जाल और संदिग्ध मौतों की जांच को सीबीआई के सुपुर्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी ने स्वागत किया।

अदालत के इस फैसले के बाद सीबीआई जांच करेगी। जांच से उम्मीद है कि दूध का दूध और पानी का पानी होगा। दोषियों को सजा मिलेगी, लेकिन व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्यापम जो कभी हजारों, लाखों विद्यार्थियों के उम्मीदों का केंद्र था अब जब भी व्यापम का नाम आएगा तो उसे संभावनाओं का नहीं बल्कि सपनों के कुचलने वाली संस्था के तौर पर ही जाना जाएगा।

भोपाल से दीपा आशीष जोशी

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