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जेटली की गुगली में उलझे दिग्गज

जेटली की गुगली में उलझे दिग्गज

By रंजना

जेटली ने मध्यवर्ग को टैक्स में कोई राहत नहीं दी है, लेकिन इसे समझने वालों की समझ पर छोड़ दिया है। उन्होंने बजट में चिकित्सा बीमा, सुकन्या योजना, परिवहन भत्ता समेत अन्य में पीछे से लोगों की जेब में पैसा डाल दिया है। जेटली ने गरीब वर्ग का पूरा ध्यान रखा।

वित्त मंत्री अरुण जेटली की गुगली पर बाजार, कॉरपोरेट जगत से लेकर विपक्ष तक सकते में है। जेटली ने सबकी बोलती बंद कर दी है और बाजार में मांग बढ़ाने के लिए ‘फ्रेंडली एटमॉसफीयर’ को वरीयता देते हुए आम से लेकर मध्यवर्ग तक  का पूरा ख्याल रखा। उच्च वर्ग को जितना प्रोत्साहन दिया उतनी उसकी जेब पर कैंची चला दी है। ऐसे में पूरी माथा-पच्ची करने के  बाद भी विरोधियों को बजट 2015-16 में आलोचना का कोई अवसर नहीं मिल पा रहा है।

जेटली ने मध्यवर्ग को टैक्स में कोई राहत नहीं दी है, लेकिन इसे समझने वालों की समझ पर छोड़ दिया है। उन्होंने बजट में चिकित्सा बीमा, सुकन्या योजना, परिवहन भत्ता समेत अन्य में पीछे से लोगों की जेब में पैसा डाल दिया है। गरीब वर्ग का पूरा ध्यान रखा। उसके पास सब्सिडी का न केवल सीधे अब पैसा पहुंचेगा, बल्कि  12 रूपए में दो लाख रूपए तक  का दुर्घटना बीमा भी मिलेगा। दरिद्र नारायण के लिए जेटली ने वह सब कुछ करने की कोशिश की है जो उसे भूख, बदहाली से बचा सके । इस बजट में सरकार की सामाजिक सुरक्षा की प्रतिबद्धता भी साफ दिखाई दे रही है। इसी गरज से सरकार ने बीमा सुरक्षा को कवच के रूप में उभारने, पेंशन योजना को धार देने, लड़कियों को बोझ जैसी समझ से बाहर निकालने के लिए सुकन्या योजना के  लिए ऊंची और कर रहित ब्याज दर की घोषणा, आखिर यह सब किसके लिए हैं। क्या इसके साथ मध्यवर्ग प्रभावित नहीं होगा, उसे राहत नहीं मिलेगी?

देश के सामने इस समय आर्थिक चुनौती बड़ी समस्या है। रोजगार के अवसर तेजी से घटे हैं। उत्पादन क्षेत्र कहीं से उम्मीद नहीं जगा पा रहा है। बाजार में मांग नहीं है। ऐसे में तैयार माल की गारंटी न होने के  चलते कंपनियों का उत्पादन ठप पड़ गया है। तमाम कंपनियों की यूनिट बंद हुर्इं। इसके  लिए दो ही थ्योरी है। पहली यह की मांग बढ़े। दूसरी यह कि  आकर्षक सामान और बाजार की प्रस्तुति आ जाए और लोग जेब से पैसे खर्च करके खरीदना शुरू कर दें। वित्त मंत्री ने पहली थ्योरी को कारगर माना है। वह पहले उद्योगों को उनके अनुकूल माहौल, मध्यवर्ग को थोड़ी राहत और दरिद्र नारायण की जेब में पैसा डालकर बाजार में मांग पैदा करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं, ताकि  ग्रास रूट पर अभाव न हो, मध्यम वर्ग के  सपने कुचलने न पाएं और कॉरपोरेट तथा उद्योग जगत खड़ा हो जाए, उत्पादन में वृद्धि नजर आने लगे, मांग और आपूर्ति का बन जाए। इससे बाजार में मंहगाई काबू में आ जाए तथा लोग आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था का आनंद ले सकें ।

इसके लिए उन्होंने कारपोरेट और उद्योग जगत को काफी राहत दी है। सीधी सी बात है कि  उद्योग जगत की मशीन और प्लांट चलेंगे तो रोजगार के अवसर पैदा होंगे। रोजगार से मध्यवर्ग की जेब में पैसा आएगा। सरकार को टैक्स मिलेंगे। राजस्व बढ़ेगा, राजकोषीय घाटा घटेगा तथा सरकार सामाजिक कार्य बुनियादी ढांचे पर जोर दे सकेगी। इसके  साथ ही अर्थ व्यवस्था की गाड़ी चल निकलेगी।

अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि पिछली सरकार की नीतियां दुरुस्त नहीं थी। इसका हमें खामियाजा भुगतना पड़ा है। इसलिए नई सरकार ने पहले वह सभी इंतजाम करने पर अधिक  जोर दिया है जिससे बिगड़ी मशीनरी दुरूस्त होकर ऑपरेशनल हो जाए। इसका पहला प्रमाण रेल बजट है, जिसमें सरकार लोक लुभावन घोषणाओं से बची और रेल में जान डालने की रणनीति को अपनाया है। यही प्रयास आम बजट में भी हुआ है।

बाजार में मंहगाई में कमी देखने में आई है। इसका जितना बड़ा श्रेय मोदी सरकार की नीतियों को जाता है, उतना ही बड़ा श्रेय अंतर्राष्ट्रीय बदलाव को भी जाता है। अंतर्राष्ट्रीय कारकों के चलते तेल के दाम घटे हैं। तमाम अन्य चीजों पर फर्क पड़ा है। लेकिन, यदि अंतर्राष्ट्रीय कारक फिर से प्रभावी होने लगेंगे और वहां दाम बढऩे लगेगा तो भारतीय बाजार इससे अछूता नहीं रह पाएगा। फिर मंहगाई तंग करने लगेगी। इसलिए केन्द्र की एक  कोशिश अंतर्राष्ट्रीय कारकों के  चलते हुए लाभ को घरेलू खपत आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में भुना लेने की है। इसी के बरअक्स अर्थव्यवस्था का ताना-बाना बुना गया है। इसलिए इस बजट को लेकर लोगों के पास विरोध की प्रतिक्रिया नहीं के  बराबर है।

बजट में रवानगी को साफ तौर पर देखा जा सकता है। शेयर बाजार जहां अपनी रंगत दिखा रहा है और पिछले साल के  जून महीने से अब तक  एक  हजार अंक चढ़ चुका है, वहीं रिजर्व बैंक  ने मंहगाई की स्थिति को देखकर रेपो रेट .25 प्रतिशत फिर कम करने का निर्णय लिया है। इससे देश के उन करोड़ों उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी, जिन्हें बैंक  से ब्याज के बदले ईएमआई देनी पड़ रही है। उन लोगों को भी राहत मिलेगी जो नया मकान, गाड़ी या कुछ खरीदना चाह रहे हैं। इससे पूंजी प्रवाह को बल मिलेगा। रियल स्टेट को उर्जा मिलेगी तथा आधारभूत संरचना को आकार देने में सहूलियत होगी।

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