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शिक्षा, संस्कार और संस्कृति का समन्वय

शिक्षा, संस्कार और संस्कृति का समन्वय

 

 

 

 

दीपक कुमार रथ
(editor@udayindia.in)

भारत संपूर्ण विश्व को राह दिखाने के लिए तेजी से विश्वगुरु बनने के अपने मार्ग पर सक्रिय रूप से बढ़ रहा है। भारत की आंतरिक इच्छा शक्ति इसके सामाजिक ताने-बाने में छिपी है, जो कि पूरी दुनिया में अनोखा है। साथ ही हमारे देश को उच्चतम बुद्धिमत्ता का वरदान प्राप्त है। यह बात ऐतिहासिक रुप से प्रमाणित हो चुकी है कि हमारा देश विज्ञान, साहित्य, अध्यात्म जैसे हर विषय में अपने उच्चतम शिखर पर था। हमारे प्राकृतिक संसाधन, अनुशासित सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति के अनुरुप जीवन शैली ने हमें संसार के दूसरे हिस्से के लोगों की अपेक्षा बेहद आगे निकलने का मौका दिया। हमारी नई शिक्षा नीति 2020, जिसमें छात्रों को तार्किक और आलोचनात्मक सोच के साथ बढ़ावा देने का प्रावधान रखा गया है। उसमें भविष्य के लिए एक व्यापक दृष्टि दिखाई देती है। नई शिक्षा नीति का ये सबसे अहम पहलू है कि वह छात्रों को पारंपरिक सोच के ढांचे से निकालकर नए तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करता है। जिससे कि नए तरह के ज्यादा से ज्यादा विचारों को हमारे मस्तिष्क में जगह मिले। इसकी वजह से छात्र नए तरह के विचारों को विकसित करने की तकनीक का इस्तेमाल बेहद निपुणता से कर पाने में सक्षम होंगे। इसके अलावा छात्रगण समस्याओं के समाधान के लिए नए-नए तरीको से भी परिचित होंगे। जिसमें से किसी एक का चुनाव वह पूरी तरह जांच -परख करने के बाद कर पाएंगे। इस नजरिए से नई शिक्षा नीति बेहद क्रांतिकारी है। हमारी शिक्षा नीतियों की एक बड़ी खामी यह थी कि इसकी वजह से छात्रों पर होमवर्क का बोझ बढ़ गया। लेकिन नई शिक्षा नीति में इस समस्या के बारे में भी गंभीरता से सोचा गया है। नई शिक्षा नीति में होमवर्क के दबाव को कम करने के साथ ही बच्चों की तार्किक क्षमता को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

भारत की पहली शिक्षा नीति साल 1968 में आई, दूसरी शिक्षा नीति 1986 में आई। इसके 34 साल बाद साल 2020 में नई शिक्षा नीति की घोषणा की गई। साल 1986 की शिक्षा नीति और 2020 की शिक्षा नीति के बीच में यूपीए सरकार ने साल 2004 में न्यूनतम साझा कार्यक्रम की घोषणा की थी। जिसमें संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की अपेक्षा अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों पर विशेष ध्यान दिया गया था। उनमें आधुनिक और तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की गई थी और उन संस्थानों को अल्पसंख्यक समुदाय तक सीमित कर दिया गया था। जिसकी वजह से ऐसा लगने लगा था कि शिक्षा सभी के लिए जरूरी नहीं बल्कि सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए ही आवश्यक है। यूपीए सरकार के इस कदम के खिलाफ मोदी सरकार की नीति किसी समुदाय के तुष्टिकरण तक सीमित नहीं है। बल्कि इसमें भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने की क्षमता मौजूद है। साथ ही इसमें बच्चों के कौशल विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। जो कि इसे विशिष्ट बनाता है। इसी उद्देश्य के साथ भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की घोषणा की है। जिससे कि पश्चिमी-निर्मित अंग्रेजी-प्रभुत्व वाली शिक्षा प्रणाली का भारतीयकरण किया जा सके और स्थानीय शिक्षा (वोकल फॉर लोकल) के माध्यम से स्थानीय जरूरतों को पूरा किया जा सके। ताकि भारत में निर्मित (मेक इन इंडिया) के उद्देश्य को दुनिया के लिए निर्मित (मेक फॉर वर्ल्ड) में बदला जा सके। नई शिक्षा नीति इस बात को सुनिश्चित करती है कि वसुधैव कुटुम्बकम की उद्घोषणा करने वाले हिंदू दर्शन में मानवता की सेवा करने के लिए अधिक से अधिक तरीकों की तलाश कर ली जाए। शिक्षा नीति के जरिए भारत की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था में बदलाव लाना सचमुच एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। भारत में प्रचलित औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने ‘काले साहबों’ के निर्माण से ज्यादा कुछ नहीं किया। इसलिए सिर्फ शिक्षा नीति में सुधार लाने से कुछ विशेष हासिल नहीं होगा। इसके लिए समग्र बदलाव की जरूरत है। इसे देखते हुए नई शिक्षा नीति में भारत को आत्मनिर्भर वैश्विक अर्थव्यवस्था बनाने की क्षमता मौजूद है। इस समग्र एवं खुद को बदलने में सक्षम और बहुआयामी शिक्षा व्यवस्था में 21वीं सदी की चुनौतियों से जूझने की पूरी क्षमता मौजूद है।

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