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युवाओं का देश, बड़ों के कारनामे

युवाओं का देश, बड़ों के कारनामे

आपने यह वाक्य अनेक बार या तो सुना होगा या खुद बोला होगा ‘देश का भविष्य युवाओं के हाथ में है और यह उनके लिए स्वर्णिम समय है’! मैं चूंकि शिक्षक रहा हूं अत: इसे अनगिनत बार दोहराया होगा। कितने ही युवा शिक्षा संस्थाएं छोड़ कर जाने के बाद मिलते रहते हैं और बाहर की दुनिया उनके साथ कैसा व्यवहार करती है इसके बारे में अपनी आप-बीती सुनाते रहे हैं। लाखों युवा प्रतिवर्ष रोजगार की खोज में पहली बार निकलते हैं और जीवन की वास्तविकताओं से रूबरू होते हैं। वैसे अब सारे छात्र इस तथ्य से परिचित हैं कि उन्हें अनेक प्रकार की धांधलियों का सामना करना ही पड़ेगा। जब सीबीएसई की परीक्षा बड़े पैमाने पर नकल पकड़े जाने के कारण निरस्त हो जाती है। तब सचाई और ईमानदारी पर हर एक का विश्वास डगमगा जाता है। इसमें वे भी शामिल हैं जिनका इस प्रकरण से संबंध भले ही न हो। ऐसे प्रकरण अब प्राय: प्रतिदिन ही मीडिया में आते रहते हैं। उस दिन प्रात:काल प्रोफेसर मुरारीलाल भारत के युवाओं के समक्ष विश्व स्तर पर संभव होने वाले उन सुनहरे अवसरों पर चर्चा कर रहे थे जिसके शब्जबाग आजकल आर्थिक जगत के विद्वान लुभावने सपनों की तरह बार-बार अपने लेखों तथा वक्तव्यों में प्रस्तुत कर रहे हैं। कहा जा रहा है की अनेक विकसित देशों में उम्रदराज लोगों की आबादी बढ़ रही है और युवाओं की घट रही है, भारत में और शिक्षित तथा कौशल सम्पन्न युवाओं के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रोफेसर साहब बोले कितना अच्छा होता अगर देश की शिक्षा व्यवस्था इस अवसर का लाभ उठाने के लिए अपने में समय रहते आवश्यक परिवर्तन कर सकती? वे इतने आशंकित क्यों है, इसका भी उन्होंने विश्लेषण किया। सभी जानते हैं कि स्कूल के बच्चों का और उच्च शिक्षा में युवाओं का उपलब्धि स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है। निजी स्कूल ज्यादा ध्यान धनोपार्जन पर देते हैं न कि शिक्षा की समग्रता तथा गुणवत्ता बढ़ाने पर। सरकारी स्कूलों में किसी को कोई चिंता है ही नहीं क्योंकि किसी भी गिरावट या कमी के लिए कोई भी उत्तरदायी निर्धारित ही नहीं है। कक्षा आठ तक कोई मूल्यांकन नहीं होना है अत: अध्यापकों को पढ़ाने की चिंता करने की कोई आवश्यकता है ही नहीं! इन स्कूलों में पढऩे वाले बच्चे अधिकतर समाज के पिछड़े वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं। वे आगे चलकर कक्षा नौ में बड़ी संख्या में फेल हो जाते हैं और यदि किसी प्रकार कक्षा दस तक स्कूल में बने भी रहे तो उनके पास नकल कराने वालों के आश्रय में जाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचता है। नकल कराने के कॉकस तथा माफिया अब देश के हर भाग में सक्रिय हो गए हैं। यही नहीं, कई दशकों से फर्जी डिग्री उपलब्ध कराने वाले भी अपना कारोबार लगभग खुलेआम चला रहे हैं। उम्र के संवेदनशील पड़ाव पर युवाओं का इस सब की और आकर्षित होना असामान्य नहीं माना जा सकता है। घोर प्रतिस्पर्धा के इस समय में यही तर्क उन माता-पिता पर भी लागू होता है जिनका हर तरफ फैले हुए भ्रष्टाचार के वातावरण में अपने बच्चों के लिए चिंतित होना भी स्वाभाविक है। सही तो नहीं है मगर हो तो ये ही रहा है। मैंने उनका ध्यान एक अन्य पहलू की ओर दिलाया बड़ी संख्या में नकल होने पर प्रतिभावान विद्यार्थी के साथ प्रवेश परीक्षा तथा काम के लिए चयन के साक्षात्कार के समय अन्याय होने की संभावना सदा बनी रहती है। अब तो उसे उन लोगों से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है जो फर्जी डिग्री तथा फर्जी अंकतालिका खरीद लेने की सामथ्र्य रखते हैं। ऐसे लोग तो अब मंत्री और नेता भी बन जाते हैं और उनके कारनामें उजागर भी होते रहते है। उम्मीदवारों की प्रष्टभूमि का सत्यापन करने वाली एक बहुराष्ट्रीय संस्था ने चार महीनों में दो लाख का सत्यापन किया और इसमें से तेईस प्रतिशत में कोई न कोई गड़बड़ी पाई गई! प्रोफेसर साहब कौशल विकास के लिए किये जा रहे

प्रयासों से परिचित हैं। वे चिंतित भी हैं कि क्या केवल तकनीकी कौशल मात्र सीख लेना किसी व्यक्ति को देश या विदेश में कार्य करने के लिए काफी है? उन्होंने विस्तार से बताया कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास कितना आवश्यक है उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए। विदेश जाने वाला हर व्यक्ति भारत का प्रतिनिधि भी होता है अत: उसको अपने देश की सम्यक जानकारी से परिचित होना ही होगा।

लगभग पच्चीस साल पहले बच्चों पर बस्ते के बढ़ते बोझ पर देश भर में चर्चा हुई थी। राज्यसभा में प्रसिद्ध लेखक आर. के. नारायण नें एक यादगार भाषण दिया और उसके परिणामस्वरूप इस विषय पर यशपाल समिति गठित की गई। उसकी संस्तुतियों का जो भी हश्र हुआ हो, परीक्षा के प्रश्न पत्रों का स्वरुप तेजी से बदला गया। वस्तुनिष्ठ तथा छोटे उत्तर वाले प्रश्नों की संख्या लगातार बढ़ती गई। आतंरिक मूल्यांकन का महत्व बढ़ा। कुल मिलाकर हर शिक्षा बोर्ड अपने परीक्षा परिणामों का प्रतिशत बढ़ाने में जुट गया। बच्चों के प्राप्तांक भी तेजी से बढ़े। सीबीएसई परीक्षा में 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले बच्चों के माता-पिता का दु:ख लेखक ने अनेक अवसरों पर स्वयं देखा है। जब ऊंचे पदों पर कार्य करने वाले माता-पिता 93 प्रतिशत अंक पाने वाले और नामी-गिरामी स्कूल में पढ़े अपने पुत्र के लिए उसके सामने कहते हैं कि इसने हमारा नाम डुबो दिया, तब लगता है की कमी तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती ही आ रही है। जब दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश के न्यूनतम अंक 99 या 100 पर रुक जायेंगे तब ऐसा होना स्वाभाविक ही है। मुरारीलाल जी ने कहा कि ऐसे अवसरों पर 1960-65 का वह वक्त याद आता है जब 70 प्रतिशत पाने वाले को सारा शहर गर्व और गौरव से सराहता था। मैंनें उन्हें टोक कर याद दिलाया कि तब कहां थे टीवी, कंप्यूटर, इन्टरनेट, विकिपीडिया,एसएमएस,चैटिंग और भी बहुत कुछ! आज के बच्चों को कितनी अधिक जानकारी एक क्लिक पर मिला जाती है। कम उम्र में वे कम्प्यूटर संबंधित कौशल आसानी से सीख लेते हैं। आज के बच्चे अपनी तीसरी पीढ़ी को बहुत कुछ सिखाते हैं। ज्यादातर दादाजी लोग अब नाती-पोते से ही अवसर मिलने पर मोबाइल इस्तेमाल करना सीख रहे हैं। प्रोफेसर साहब बहुत प्रभावित नहीं हुए मेरी बात से, बोले अब छोटे मकान, छोटे परिवार में दादा-दादी नाना-नानी के लिए जगह ही कहां होती है। विज्ञान नें बहुत कुछ नया तथा लाभकारी दिया है मगर मनुष्य नें उसका उपयोग नई पीढ़ी को ध्यान में रखकर नहीं किया है। आज हम बच्चों को समय से पहले बड़ा बना रहे हैं, हमारे सिनेमा के आइटम सॉन्ग तथा बड़े नामवालों द्वारा जंक-फूड इत्यादि का बेशर्मी से प्रचार-प्रसार केवल धनार्जन के लिए करना क्या नई पीढ़ी के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुंह मोडऩा नहीं माना जाना चाहिए?

हमारी चर्चा में बालश्रम से लेकर स्कूल न जा पाने वाले बच्चे, और आगे चलकर उच्च शिक्षा में लगातार बढ़ रहे निजीकरण और उस कारण समाज के बड़े वर्ग में पनप रहे आक्रोश पर भी संवाद होना ही था। हम दोनों सहमत थे कि विकास की कोई भी अवधारणा केवल आर्थिक रुप से संपन्न वर्ग को ही अवसर प्रदान कर सफल नहीं हो सकती है। इस समय हमारी नीतियां कुछ भी कहें, वास्तविकता तो यही है कि एक बड़ा वर्ग उच्च शिक्षा के निजी संस्थानों में प्रवेश पाना असंभव पाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के यहां जो नौकरियां उपलब्ध हैं उनमें भी यह वर्ग अपने को कहीं नहीं पाता है। भाषा अपने आप में बड़ी अवरोधक बन गई है। पिछली सरकार ने अपने दस वर्ष के शासन काल में शिक्षा में ही अनेक ‘मिशन’ बनाये। वे सरकारी प्रकल्प बन कर ही रह गए हैं। आवश्यकता तो एक समग्र युवा आन्दोलन की है, जो हर युवा को देश के काम में लगा सके और उसका मनोबल ऊंचा बनाये रख सके।

जगमोहन सिंह राजपूत

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