ब्रेकिंग न्यूज़ 

बर्बाद हुआ विपक्ष

बर्बाद हुआ विपक्ष

विधान सभा चुनाव में ओंधें मुंह गिरी सपा के सरकार बनाने के सपने चकनाचूर क्या हुये। पिछले पांच साल गतिहीन, दिशाविहीन रहे पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव एक दम सुस्त अवस्था में दिखाई दिये। हालत यहां तक हो गयी कि चुनाव में मुंह की खायी सपा और उसके सहयोगी दल हार के लिये अखिलेश को ही जिम्मेदार ठहरानें लगे। उनके सहयोगी दल सुसपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने तो वातानुकूलित नेता घोषित करते हुये उन्हें एयरकंडीशन से बाहर निकाल कर कार्यकतार्आंे से मिलने की सीख दे डाली। उन्होंने सरेआम जनता से दूर रहने वाला नेता बता दिया यानि जो कभी सत्ताधारी पार्टी भाजपा न कह सकी वो काम उनके सहयोगी दल ने कर दिया।

अखिलेश अपने ही सहयोगी द्वारा प्रेस के माध्यम से उन्हें जनता और कार्यकर्ताओं में नीचा दिखाने पर खून का घूंट पीकर रह गये। अभी वे इससे उभरे भी नहीं थे कि अपनी मजबूत गढ़ मानी जाने वाली आजमगढ़ और रामपुर की सीटें लोक सभा के उपचुनावों में खो बैठे। ये सीटें हारने का गम तो विधान सभा में बहुमत न मिलने से भी भारी था। आजमगढ़ की सीट तो हारने का कभी स्वप्न में भी नहीं सोच सकते थे।

सपा नेता ने राजभर से दूरी बना ली। यहां तक कि मिलना तो दूर उन्हें राष्ट्रपति के चुनाव में समर्थन का फैसला लेने वाली बैठक में नहीं बुलाया। राजभर को राष्ट्रपति चुनाव में अपनी मर्जी से फैसला लेने का मौका मिल गया। इस अवसर को भाजपा ने लपक लिया और भाजपा समर्थित प्रत्याशी द्रोपदी मर्मू के लिये उनसे समर्थन मांग लिया। उन्होंने सहार्द स्वीकार करते हुये भाजपा नेताओं का धन्यवाद किया। पूर्व भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष, केन्द्रीय गृहमंत्री की प्रशंसा भी की।

उसके पहले अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह यादव भी राष्ट्रपति चुनाव में पहले ही उनका साथ छोड़ चुके हैं और मर्मू को ही वोट देंगे। दोनों नेताओं की शिकायत एक जैसी है कि अखिलेश ने उन्हें बैठक में नहीं बुलाया। लगता है राहुल गांधी की तरह अखिलेश भी कॉम्पलेक्स से पीड़ित हो चले हैं अत: जो भी उन्हें थोड़ी सी सलाह देना चाहता है, कटु सत्य बोलता है उससे दूरी बना लेते हैं।

इसके पहले भी उनकी बौखलाहट का दृश्य विधान सभा में देखा जा चुका है जब वो झल्ला कर सदन में बोलते हुये उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बाप तक पहुंच गये थे। एक पूर्व मुख्यमंत्री से सदन की मयार्दा भंग करने की कभी एैसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी। एैसा शायद ही कभी किसी सदन में हुआ हो जहां किसी मंत्री के बाप को कुछ बोला गया हो। तब लोगों ने सोचा हो सकता है कि अभी अखिलेश चुनाव में हुयी पराजय के मानसिक दबाब से बाहर न निकल पाये। उस समय उन्हें एक घाव आजम खां ने भी दिया था जब सदन में पहली बार आने पर अपने नेता से न मिलने गये न दुआ सलाम की न ही अभिवादन। उन्हें कभी आजम खां से ऐसी उम्मीद न रही होगी।

उत्तर प्रदेश विधान सभा मे इस समय कांग्रेस पार्टी की दो और बहुजन समाज पार्टी की एक सीट है यानि दोनों पार्टियां लगभग समाप्त होने की ओर हैं। ये वे पार्टीं हैं जिनके कई बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं। विधान सभा में विपक्ष की जो तस्वीर उभर कर आयी है उससे इन पार्टियों का आगे कोई भविष्य दिखाई नहीं दे रहा है। सपा के सहयोगी उन्हें छोड़कर भाग रहे हैं। आजमगढ़ और रामपुर हारने से सपा समर्थक मुसलमान मायूस हो चुके हैं। आजम खां का खुल कर साथ नहीं देने से उनके समर्थक नाराज बैठे हैं। जिसकी एक बानगी आजमगढ़ के लोक सभा चुनाव में देखनें को मिली है। आजमगढ़ में यादव वोट भी अब बंट गया है इसलिये भाजपा के निरहुआ (यादव) आसानी से अच्छे वोटों से चुनाव जीते हैं। अखिलेश यादव की वैसे भी व्यक्तिगत समर्थक न के बराबर हैं। जिसे यादव, मुसलमान और अन्य जातिगत आधारित सहयोगी दल के समीकरण से उनकी पार्टी चुनाव जीतती थी वो समीकरण अब टूट चुका है। एक आंकलन के अनुसार पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा को लगभग 6 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले हैं। उसका कारण सिर्फ तीन तलाक कानून रद्द करने के अलावा मुसलमानों को आवास योजना में मिले घर, गैस कनेक्शन, आदि हैं। यादवों की अखिलेश से बढ़ती दूरी, मुसलमानों का मोदी, योगी की तरफ बढ़ता रुझान, कांग्रेस की डूबती नैया, सहयोगी दलों का अखिलेश पर टूटता विश्वास के कारण उत्तर प्रदेश में विपक्ष विकलांग होता जा रहा है।

भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था। भाजपा ने लोकसभा में 10 प्रतिशत सीटें नहीं जीतने दी जिससे कांग्रेस को मान्यता प्राप्त विपक्ष से मुक्त कर दिया। भारत के सबसे बड़े प्रदेश जो देश का पांचवा हिस्सा है, को कांग्रेस मुक्त कर ही दिया है। जहां से उसका लोक सभा में मात्र एक सांसद और विधान सभा में मात्र दो ही सदस्य रह गये हैं। कांग्रेस मुक्त भारत में  भाजपा से ज्यादा खुद कांग्रेस का अपना हाथ है जो गल्तियों में गल्तियां करती जा रही है। हिन्दुओं को नाराज करनें में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का बड़ा हाथ है जो जाकिर जैसे हिन्दू विरोधियों की प्रशंसा करते हैं ये वही जाकिर मुसलमान गुरु है जो कुरान का नाम लेकर कहता है कि काफिर का कत्ल करना हमारी कुरान में लिखा है। दिग्विजय, मणिशंकर जैसे नेताओं की सलाह पर चल कर कांग्रेस ने खुद अपनी चिता

सजाई है।

2024 में आने वाले लोक सभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर जीत मिल सकती है। रामपुर और आजमगढ़ जैसे विपक्षी गढ़ में जीत हासिल कर उसका उत्साह सातवें आसमान पर है। जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति का प्रत्याशी बना कर जाटों का मन भी जीत लिया है। जाट किसान के बेटे को उपराष्ट्रपति बनाये जाने से भाजपा को राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारी लाभ होगा। टिकैट की जातिवादी दुकान बन्द हो जायेगी। सतपाल मलिक वर्तमान राज्यपाल जैसे लोगों का भी मुंह बन्द हो गया है। जिस तरह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पहले चाचा शिवपाल सिंह फिर आजम खां अब राजभर को नाराज किया है। उससे अब विपक्ष में एका बन पाना मुश्किल है। कांग्रेस खार खाये बैठी है, ब.सपा सुप्रीमो मायावती ने सपा के विरोध की कसम खा रखी है। वह कह चुकी है कि वे किसी का भी साथ देगी पर सपा का विरोध करेंगी। एैसे बिखरा विपक्ष योगी जैसे चाणक्य नेता के आगे एक दम बौना हो गया है। ’

 

 

 

डॉ. विजय खैरा

Leave a Reply

Your email address will not be published.