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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर संशय का निवारण

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर संशय का निवारण

उदय इंडिया – नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बच्चों की शिक्षा में दिलचस्पी जगे और रोजगार के मौके उत्पन्न हों, इन बातों पर विशेष जोर दिया गया है। इस पर आपका मंतव्य क्या है?

अतुल कोठारी – नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यालय स्तर के ढांचे में 5+3+3+4 का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था पहले प्राथमिक शिक्षा नीति में पहले नहीं थी, इसे अब जोड़ा गया है। इसमें इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया है कि बच्चों के अंदर खेल-खेल में सृजनात्मकता पैदा की जाए। यह एक सही दिशा है नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की। छठवीं क्लास से ही प्रायोगिक और व्यवसायिक प्रशिक्षण शुरू हो जाएगा और नवीं क्लास से ही कौशल विकास अनिवार्य होगा। इसमें बच्चों को इंटर्नशिप भी कराई जाएगी। तो इस तरह से ये बच्चों के लिए काफी नए अवसर देता है और उच्च शिक्षा पर भी मल्टीपल एक्जिट और एंट्री का स्कोप रखा गया है। जिससे बच्चे यदि फर्स्ट या सेकेंड ईयर के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं तो आज की स्थिति में बच्चों को कुछ नहीं मिलता है। लेकिन नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अगर वो एक साल भी पढ़ाई करते हैं तो उन्हें उसका सर्टिफिकेट दिया जाएगा। और दो साल के बाद छोड़ते हैं तो उन्हें डिप्लोमा दिया जाएगा। अगर वो कुछ साल का विराम देकर फिर से पढ़ाई शुरू करना चाहें तो उन्हें नए सिरे से शुरूआत नहीं करनी पड़ेगी। इसमें मल्टी डिसिप्लिनरी अप्रोच जोड़ा गया है। यानी कि बच्चा अगर एक यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर रहा है तो आगे की पढ़ाई दूसरी यूनिवर्सिटी से जारी रख सकता है। वर्तमान व्यवस्था के तहत यह संभव नहीं है। मान लीजिए कोई छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर रहा है और उसे लगता है कि कोई विशेष कोर्स बैंगलोर यूनिवर्सिटी से करना बेहतर होगा। तो ऐसी परिस्थिति में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति उसे विश्वविद्यालय बदलने का विकल्प उपलब्ध कराती है। या फिर वो समानांतर रुप से भी पढ़ाई कर सकते हैं। इस तरह की अनेक सुविधाजनक व्यवस्था विद्यार्थियों के लिए की गई है।

 

उदय इंडिया – नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बच्चे आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स के विषयों को मिला जुलाकर चुन सकते हैं। क्या इससे यह खतरा नहीं है कि बच्चों में किसी खास विषय की विशेषज्ञता विकसित होने में बाधा उत्पन्न होगी?

अतुल कोठारी – यह बेहद उचित प्रश्न है। अभी का 10+2 का सिस्टम बदल जाएगा। और बच्चों को विषय चुनने की स्वतंत्रता होगी। लेकिन यहां शिक्षकों का दायित्व बेहद बढ़ जाता है। क्योंकि बच्चों को उचित दिशा देनी पड़ेगी और बच्चों को विषय चुनने में सहायता करनी पड़ेगी। उन्हें बिल्कुल खुला नहीं छोड़ सकते। बच्चों को भविष्य में क्या करना है इसका संज्ञान शिक्षकों को रखना होगा। यदि कोई बच्चा डॉक्टर बनना चाहता है और अगर वह बायोलॉजी अपने विषय में नहीं रखता है तो उसे मेडिकल में दाखिला नहीं मिलेगा। इसलिए शिक्षकों को छात्रों को दिशा देनी पड़ेगी। शिक्षकों को छात्रों को विषयों का संयोजन अच्छी तरह समझाना पड़ेगा। जैसे कि मेडिकल की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए मनोविज्ञान पढ़ना बेहतर रहेगा। जो बच्चा इंजीनियरिंग में जाना चाहता है तो उसके लिए मैनेजमेन्ट पढ़ना भविष्य के लिए बेहतर साबित होगा। इसके लिए एनसीईआरटी दिशा तय करेगी। बच्चों को यह सोचना होगा कि भविष्य में जिस क्षेत्र में वह अपना करियर बनाना चाहते हैं उससे संबंधित या मदद करने वाले विषय का वह चुनाव करें। इसमें बच्चों के अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व बेहद बढ़ जाता है। क्योंकि बच्चे तो बच्चे हैं। अगर बच्चे अपने साथियों की देखा-देखी विषय रखने लगे और भविष्य में उन्हे संबंधित विषय पढ़ने में मन ना लगे तो समस्या खड़ी हो जाएगी। इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों को विषयों के चुनाव का ध्यान रखना पड़ेगा।


उदय इंडिया –
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बच्चों को किस कांबिनेशन में विषय चुनना है। इस बारे में कोई गाइडलाइन तैयार की गई है क्या?

अतुल कोठारी – इसकी व्यवस्था विद्यालयों में करनी होगी। कोई भी शिक्षा नीति इसकी व्यवस्था नहीं करती। वह सिर्फ गाइडलाइन देती है। बाकी व्यवस्था राज्यों और संस्थानों में करनी होगी।

 

उदय इंडिया – शिक्षा समवर्ती विषय है। हर राज्य के अपने अलग स्कूल बोर्ड हैं। तो क्या भविष्य में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में केन्द्रीय और राज्य स्कूल बोर्डों के बीच किसी तरह के टकराव की स्थिति तो पैदा नहीं होगी।

 

अतुल कोठारी – शिक्षा आज से समवर्ती सूची में नहीं है। यह काफी समय से है। नई शिक्षा नीति तैयार करते समय केन्द्र सरकार और एनसीईआरटी ने सभी राज्य सरकारों और उनके बोर्डों से सुझाव मांगा है। ऐसे में कोई राज्य ये नहीं कह सकता कि उनसे इस विषय पर चर्चा नहीं की गई। इस बारे में बेहद लोकतांत्रिक तरीका अपनाया गया है। सबकी राय को स्थान दिया गया है। जिस तरह से एनसीईआरटी केन्द्र सरकार की संस्था है। उसी तरह राज्यों के भी अपने पुस्तक तैयार करने वाले बोर्ड हैं, उन सभी से विशद चर्चा की गई है।

 

उदय इंडिया – जुलाई 2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा हुई। यह पूरी तरह कब तक लागू हो जाएगी?

अतुल कोठारी – समिति ने 2035 तक इसे पूरी तरह लागू करने का प्रावधान किया है। इसमें विषयों के हिसाब से लागू करने की समय सीमा रखी गई है। जैसे व्यवसायिक शिक्षा के लिए, विशेष तौर पर हायर एजुकेशन के लिए यह समय सीमा 2025 रखी गई है। अभी हायर एजुकेशन में 27 फीसदी बच्चे जाते हैं। उसे बढ़ाकर 50 फीसदी करने की समय सीमा भी 2025 तक की रखी गई है। इस प्रकार अलग अलग विषयों के लिए 2025, 2030 और 2035 तक की समय सीमा रखी गई है। इस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पूरी तरह लागू करने की समय सीमा 2035 तक रखी गई है।

उदय इंडिया – नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फामूर्ला की योजना रखी गई है। बच्चों को उनकी अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने की योजना बनाई गई है। क्या इतनी भाषाओं में पुस्तकें उपलब्ध हैं?

अतुल कोठारी – विद्यालय स्तर पर तो सभी राज्यों की अपनी भाषाओं में पुस्तकें तैयार हैं। प्रश्न उच्च शिक्षा का है। उच्च शिक्षा में भी आर्ट्स, कॉमर्स साइंस में अधिकतर राज्यों में पुस्तकें तैयार हो गई हैं। अब सवाल रह जाता है व्यवसायिक शिक्षा का। जैसे इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेन्ट जैसे विषय जब से शुरू हुए उसकी पुस्तकें अंग्रेजी में ही हैं। लेकिन एक साल पहले अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने आठ भाषाओं में इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम तैयार करके दे दिया गया है। आईआईटी, एनआईटी जैसे कई तकनीकी शिक्षा संस्थानों में स्थानीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार कर लिया है। जैसे त्रिपुरा की एनआईटी अगरतला में अंग्रेजी के साथ बांग्ला में पाठ्यक्रम तैयार कर लिया गया है। एनआईटी पटना में हिंदी भाषा में पाठ्यक्रम तैयार है। देखा जाए तो जहां स्थानीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करने का काम सबसे कठिन लग रहा था। वहां इसकी तैयारी शुरू हो गई है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि मध्य प्रदेश सरकार ने हिंदी भाषा में मेडिकल की पढ़ाई कराए जाने की तैयारी कर ली है। इसके लिए सरकार ने कमिटी भी बना ली है। प्रोफेशनल एजुकेशन के क्षेत्र में अपनी भाषा में ज्ञान देना सबसे कठिन लग रहा था। लेकिन अब उसमें भी प्रशंसनीय तरीके से काम प्रारंभ हो गया है। इसमें थोड़ा समय लगेगा। लेकिन यह दो से चार सालों में हो जाएगा। लेकिन सबसे बड़ी जरुरत समाज की मानसिकता में बदलाव लाना है। सरकार तो क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार कर देगी। लेकिन उसमें छात्रों को एडमिशन भी लेना तो पड़ेगा ना। तो इसके लिए समाज में जागरूकता लानी होगी। क्योंकि समाज में यह ग्रंथि है कि अंग्रेजी के बिना कुछ हो ही नहीं सकता है। लोग सोचते हैं कि अगर हमारे बच्चे क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी पढ़ाई करेंगे तो उन्हें भविष्य में पता नहीं नौकरी मिलेगी या नहीं। समाज की इसी मानसिकता को दूर करना सबसे बड़ा कार्य है। मुझे भी निजी तौर पर व्यवसायिक शिक्षा को क्षेत्रीय भाषाओं में शुरू किया जाना बेहद कठिन लग रहा था। लेकिन खुशी की बात है कि यह काम शुरू हो गया है। धीरे-धीरे अगले 4 से 5 सालों में इस रास्ते की मुश्किलें दूर कर ली जाएंगी।

 

उदय इंडिया – अंतरराष्ट्रीय नौकरियों के बाजार में भारतीय छात्रों को चीन के मुकाबले प्राथमिकता दी जाती थी। क्योंकि भारतीय बच्चे अंग्रेजी का ज्ञान रखते हैं। अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर पूरी तरह अमल किया जाएगा तो भारतीय छात्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय नौकरियां हासिल कर पाना मुश्किल तो नहीं हो जाएगा?

अतुल कोठारी – देखिए यह देश में एक भ्रम है कि जो बच्चे विदेश में नौकरी या व्यवसाय करने के लिए गए उनका आंकड़ा निकालकर देखिए कि उसमें से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग कितने हैं। दूसरी बात ये है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अंग्रेजी को पूरी तरह हटाने की बात नहीं की गई है। यह वैकल्पिक है।

मैं देश भर में घूमता हूं। जो लोग बड़े-बड़े पदों पर हैं उनसे मेरा संपर्क भी रहता है। मैं देखता हूं कि जिन लोगों ने अपनी भाषा में पढ़ाई की है। वही लोग आज बड़े-बड़े पदों पर स्थित हैं। भारत के बड़े-बड़े वैज्ञानिक जैसे जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय, डॉ. अब्दुल कलाम हों, उन सभी ने अपनी मातृभाषा में पढ़ाई और बहुत अच्छे वैज्ञानिक बने। हमें अंग्रेजी की कोई विशेष जरुरत

नहीं है।

हम ये मानते हैं कि अंग्रेजी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है। इसे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन विज्ञान की अच्छी सामग्री रूसी भाषा में है, दर्शन शास्त्र जर्मन भाषा में उत्तम है, साहित्य की सामग्री फ्रेंच में ज्यादा अच्छी मिलती है। हमने सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं बल्कि दुनिया की सभी भाषाओं में, जिनमें अच्छा ज्ञान है, उसमें महारत हासिल करने वाले लोग तैयार करने होंगे। लेकिन इसके लिए ये जरुरी नहीं है कि बच्चों को केजी से ही अंग्रेजी पढ़ाना होगा। तीन महीने का कोर्स करके कोई भी अंग्रेजी भाषा सीख सकता है।

सरकार ने कहीं भी अंग्रेजी को हटाने की बात नहीं की है। कोई भी बच्चा तीन भाषाएं सीख सकता है। जिसमें दो भाषाएं भारतीय होनी चाहिए। तीसरी भाषा के रुप में उसके सामने अंग्रेजी या किसी और अंतरराष्ट्रीय भाषा के चुनाव का विकल्प खुला हुआ है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि जो लोग एक विषय के रुप में अंग्रेजी पढ़ते हैं उनकी अंग्रेजी इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वालों से बेहतर होती है। क्योंकि विज्ञान कहता है कि जो अपनी भाषा को अच्छी तरह सीख लेता है वह दुनिया की किसी भी भाषा में महारत हासिल कर सकता है। इंग्लिश मीडियम के बच्चे जो किंडरगार्डन से ही अंग्रेजी में पढ़ाई करते हैं, वह ना तो अपनी भाषा अच्छी तरह सीख पाते हैं और ना ही अंग्रेजी ही अच्छी जान पाते हैं।

 

उदय इंडिया – भारत में शिक्षकों की पहले से बहुत कमी है। नए प्रारुप के अनुरुप क्या पुराने शिक्षक अप्रासंगिक हो जाएंगे। ऐसे में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरुप क्या बड़ी संख्या में शिक्षकों को भर्ती किए जाने की तैयारी हमारे पास है?

अतुल कोठारी – कोई भी पुराना शिक्षक अप्रासंगिक नहीं होगा। क्योंकि नई नीति के अनुसार शिक्षकों का प्रशिक्षण जारी है। खास तौर पर आॅनलाइन एजुकेशन को देखें तो इसके लिए भी प्रशिक्षण जारी है। हालांकि पहले भी आॅनलाइन पढ़ाई की बातें चल रही थीं। लेकिन देश में कोरोना आने के बाद आॅनलाइन काम ने जोर पकड़ लिया। ऐसा किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन कोरोना के दौरान पुराने शिक्षकों ने सफलतापूर्वक आॅनलाइन पढ़ाई का तरीका सीख लिया।

मैं मानता हूं देश में शिक्षकों की कमी है। लेकिन इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ज्यादा है। क्योंकि केन्द्र सरकार ने अपने कोटे के शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन आर्थिक कारणों से राज्यों में शिक्षकों भर्ती नहीं हो पा रही है। लेकिन इसका समाधान आॅनलाइन पढ़ाई के जरिए निकाला जा सकता है कि किसी भी विषय का विशेषज्ञ शिक्षक एक साथ कई यूनिवर्सिटी के छात्रों को पढ़ा सकता है। इससे शिक्षकों की कमी की समस्या पूरी की जा सकती है। ’

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