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डिजिटल दौर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और मीडिया शिक्षा

डिजिटल दौर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और मीडिया शिक्षा

देश में सबसे पहले माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की पहल की और इसी सत्र से राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार सात नए पाठ्यक्रम प्रारंभ किए। आज का समय प्रतिस्पर्धा का नहीं बल्कि सहयोग का है। इसलिए सभी उच्च शिक्षा संस्थाओं को आपस में समन्वय कर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना चाहिए। इसके लिए कई विश्वविद्यालयों से सहयोग और समन्वय स्थापित किया जा रहा है। विश्वविद्यालय ने अकादमिक क्षेत्र में कई पेटेंट प्राप्त किए हैं और आगे भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल होंगी।

माखनलाल विश्वविद्यालय आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत उच्च शिक्षा क्षेत्र के नए आयाम गढ़ रहा है। वर्ष 2021-22 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति आधारित सात नए पाठ्यक्रम का सफलता पूर्वक कोर्स का संचालन किया गया। वर्ष 2022 में प्रवेश परीक्षा में एक और पाठ्यक्रम यानी इस वर्ष सभी छात्र आठ नए पाठ्यक्रम के प्रवेश के लिए परीक्षा में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा की सफलता का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहले वर्ष ही पूरे सीटे भर गई। कई छात्र प्रवेश लेने से वंचित रह गए। लेकिन विद्यार्थियों के अंदर रूचि देखते हुए कुछ सीटें बढ़ाने का भी फैसला लिया गया है। इसके साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत विश्वविद्यालय आज दूसरी यूनिवर्सिटी के साथ अनुबंध कर उन्हें जनरल इलेक्टिव के तहत नए कोर्स उपलब्ध करा रही है। वहीं विश्वविद्यालय ने एनसीसी के साथ अनुबंध कर 24 क्रेडिट का कोर्स शुरू किया है, जिससे अब एनसीसी स्टूडेंट केवल शौकिया तौर पर नहीं इसे एक कोर्स के रूप में इसका अध्ययन कर सकते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति को विश्वविद्यालय में लागू करने के पीछे स्टूडेंट के स्किल डेवलपमेंट को बढ़ाना है। इसी क्रम में फिल्म उद्योग में बढ़ते असर को देखते हुए हाल में विश्वविद्यालय में चतुर्थ भारतीय लघु फिल्मोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें देश भर से आए फिल्म कलाकारों, निदेशकों और उससे जुड़े मीडिया शिक्षकों ने विद्यार्थियों का मार्ग दर्शन किया। इस आयोजन के दौरान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विश्वविद्यालय में फिल्म अध्ययन विभाग की शुरूआत की। मीडिया के पारंपरिक क्षेत्रों में अवसर कम होते जा रहे हैं, ऐसे में विश्वविद्यालय में पूरा जोर स्टूडेंट के स्किल डेवलपमेंट पर है। आज जब युवाओं के लिए रोजगार एक बड़ी चुनौती है ऐसे में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय स्टूडेंट को तेजी से देश की प्रतिष्ठित मीडिया संस्थाओं में अवसर उपलब्ध करा रहा है। जब युवाओं के लिए रोजगार एक बड़ी चुनौती हो गई है, ऐसे में माखनलाल विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थाओं में अवसर उपलब्ध करा रहा है। विश्वविद्यालय का पूरा जोर युवाओं के स्किल डेवलपमेंट कर उनको मीडिया के क्षेत्र की मांग के अनुरूप तैयार करना है। आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप यूनिवर्सिटी में छात्रों को मीडिया क्षेत्र से जुड़े लोग पढ़ा रहे हैं, जिससे स्टूडेंट मीडिया की बारीकियों और तकनीकों से अवगत हो रहे हैं। उनका तेजी से प्लेसमेंट भी हो रहा है। विश्वविद्यालय के अच्छे छात्र अच्छी कंपनियों में बड़े पैकेज के साथ नौकरी के अवसर प्राप्त कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ध्यान में रखकर के विश्वविद्यालय के नए कैंपस में रेडियो कर्मवीर के नाम से सामुदायिक रेडियो स्टेशन शुरू करने जा रहा है। इसके लिए भारत सरकार से भी मंजूरी मिल गई है।

बता दें कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की घोषणा के साथ ही मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। इस नीति द्वारा देश में स्कूल एवं उच्च शिक्षा में परिवर्तनकारी सुधारों की अपेक्षा की गई है। इसके उद्देश्यों के तहत वर्ष 2030 तक स्कूली शिक्षा में सौ प्रतिशत जीईआर के साथ-साथ पूर्व-विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा के सार्वभौमिकरण का लक्ष्य रखा गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा से जुड़े कुछ प्रावधान किए गए हैं। जिसमें एनईपी-2020 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘सकल नामांकन अनुपात’ को 26.3 प्रतिशत (वर्ष 2018) से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य रखा गया है, इसके साथ ही देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में 3.5 करोड़ नई सीटों को जोड़ा जाएगा। वर्ष 2022 में इस पर काम तेजी से शुरू भी गया है। मीडिया से जुड़े कोर्स और अन्य कोर्स में भी राष्ट्रीय शिक्षा निति के तहत स्नातक पाठ्यक्रम में मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट व्यवस्था को अपनाया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी के अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा (1 वर्ष के बाद प्रमाण-पत्र, 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 वर्षों के बाद स्नातक की डिग्री तथा 4 वर्षों के बाद शोध के साथ स्नातक)।

एनईपी में विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने के लिये एक ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ दिया जा रहा है, ताकि अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें डिग्री प्रदान की जा सके। मीडिया शिक्षा के तहत राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत एम.फिल कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिये एक एकल नियामक अर्थात भारतीय उच्च शिक्षा परिषद की परिकल्पना की गई है, जिसमें विभिन्न भूमिकाओं को पूरा करने हेतु कई कार्यक्षेत्र होंगे। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर पूरे उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक एकल निकाय के रूप में कार्य करेगा।

उनके कार्यों को सुचार रूप से संपादित करने के लिए चार नए प्रावधान –

’               राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद- यह शिक्षक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक नियामक का कार्य करेगा।

’               सामान्य शिक्षा परिषद : यह उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के लिये अपेक्षित सीखने के परिणामों का ढाँचा तैयार करेगा अर्थात उनके मानक निर्धारण का कार्य करेगा।

’               राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद) : यह संस्थानों के प्रत्यायन का कार्य करेगा जो मुख्य रूप से बुनियादी मानदंडों, सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण, सुशासन और परिणामों पर आधारित होगा।

’               उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद : यह निकाय कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों के लिये वित्तपोषण का कार्य करेगा

 

एनईपी/ऑनलाइन शिक्षा और चुनौतियां

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत ऑनलाइन एजुकेशन को बढ़ावा दिया गया है। खासकर मीडिया जगत में हो रहे रोजाना तकनीक परिवर्तन को देखते हुए मीडिया शिक्षा में ऑनलाइन शिक्षा का अपना विशेष स्थान है। शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन माध्यम भले ही आज के परिपे्रक्ष्य में चुनौती हो, लेकिन लॉकडॉउन के बाद जिस तरह इससे जुड़ने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, इससे यह तो साफ ही इसका भविष्य सुनहरा होगा। टेक्नोलॉजी की दुनिया में हर कोई मोबाइल या लैपटॉप की सहायता से इंटरनेट की दुनिया से जुड़ना चाहता है। पिछले कुछ दिनों से देखा गया है कि शिशु से लेकर उच्च शिक्षा से जुड़े हुए छात्रों ने ऑनलाइन शिक्षा की चुनौती को स्वीकार किया है। मगर यह भी सही है, कि डिजिटल प्रणाली पूरी तरह से भौतिक संरचना की जगह नहीं ले सकती है। उदाहरण के लिए, प्रयोगशाला से जुड़े काम के लिए छात्र कहां जाएंगे?  इसके लिए हम एक हाइब्रिड प्रणाली पर काम कर सकते हैं, जिसमें डिजिटल और भौतिक स्वरूप, दोनों को ही शामिल करें। साथ ही, डिजिटल रूप से इंटरएक्टिव लैब बनाने के लिए हम वर्चुअल और ऑगमेंटेड रियलिटी का इस्तेमाल कर सकते हैं। जहां तक गुणवत्ता की बात है, तो डिजिटल एजुकेशन में अच्छे शिक्षक इंटरनेट के जरिए बच्चों को सीधे पढ़ा सकते हैं, और इंटरनेट यदि हर छात्र के लिए उपलब्ध हो जाए, तो न शिक्षा को बहुत तेजी से देश के कोने-कोने पर पहुंचाया जा सकता है। लेकिन भारत अभी पूरी तरह से ऑनलाइन शिक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है। इस क्षेत्र में अभी बहुत काम करने की आवश्यकता है। जिसमें ऑनलाइन नेटवर्क के अलावा देश के शैक्षिक संस्थानों को ऑनलाइन शिक्षा के लिए तैयार करना होगा।

एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 22 प्रतिशत लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं। यह दशार्ता है कि स्थिति कितनी विकट है। अनेक स्थानों पर अध्यापकों नें बच्चों को ऐसे स्थानों पर इकठ्ठा करना प्रारम्भ किया जहां सिग्नल मिल सके, वे टीवी या स्मार्ट फोन का प्रबंध कर सकें, मगर यह बृहद स्तर पर समस्या का समाधान नहीं है। भारत में इंटरनेट उपयोग करनेवालों की अनुमानित संख्या लगभग 640 मिलियन मानी जा सकती है। इनमें मोटे तौर पर 40 प्रतिशत शहरों में तथा 14 प्रतिशत गाँवों में हैं। महाराष्ट्र की शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के एक सर्वेक्षण के अनुसार महाराष्ट्र में दो-तिहाई परिवारों के पास स्मार्ट फोन नहीं हैं, केवल एक प्रतिशत के पास लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर है। जब महाराष्ट्र की यह स्थिति है तो बिहार, ओडिशा, झारखंड या उत्तर प्रदेश में स्थिति इसे तो बदतर ही होगी। यह एक चुनौती है इसे देश को स्वीकार करनी होगी। इस क्षेत्र में अभी बहुत काम करने की आवश्यकता है। हालांकि शिक्षा में हर पक्ष में बहुत कुछ बदल रहा है। शैक्षिक मूल्यांकन को लेकर नई सोच स्वीकार हो रही है जिसमें विद्यार्थी नें जो सीखा है उसका उपयोग वह विभिन्न स्थितियों और समस्याओं के समाधान में कैसे करेगा, इस पर बल दिया जाएगा, विद्यार्थियों की विश्लेष्णात्मक क्षमताओं को बढ़ाया जाना है। ऑनलाइन और आमने-सामने की पद्धतियों में इसके ढंग अलग होंगे और तदनुसार अध्यापकों को तैयार करना होगा।

आशा की किरण यही है कि नई शिक्षा नीति डिजिटल इन्फ्रास्ट्रकचर, सामग्री निर्माण, डिजिटल रिपोजिटरी और प्रसार, तथा डिजिटल अंतर कम करने के लिए कटिबद्धता से परिपूर्ण है। ‘इस तथ्य को देखते हुए कि अभी भी जनसंख्या का एक बड़ा भाग ऐसा है जिसकी डिजिटल पहुंच अत्यधिक सीमित है, मौजूदा संचार माध्यम जैसे टेलीविजन, रेडियो और सामुदायिक रेडियो का उपयोग टेलीकास्ट और प्रसारण के लिए बड़े पैमाने पर किया जाएगा। इस तरह के शैक्षिक कार्यक्रमों को छात्रों की बदलती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न भाषाओं में 247 उपलब्ध कराया जाएगा। सभी भारतीय भाषाओं में सामग्री पर विशेष ध्यान दिया जाएगा और इस पर विशेष बल दिया जाएगा कि जहां तक संभव हो, शिक्षकों और छात्रों तक डिजिटल सामग्री उनकी सीखने की भाषा में पहुंचे।’ नीतिगत स्तरपर इसमें वह सभी कुछ आ जाता है, जो ऑनलाइन शिक्षा के प्रति आशंकाओं का निवारण करता है। यह भी सही है कि ऑनलाइन व्यवस्था कक्षा और स्कूल तथा वहां के जीवंत संपर्क का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते हैं। बनने भी नहीं चाहिए, मनुष्य को सामाजिकता पूर्ण-रूपेण वापस चाहिए।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा बजट को जीडीपी के 6 प्रतिशत तक बढ़ाने की घोषणा एक सराहनीय कार्य है। अधिकांश शिक्षक और अभिभावक तकनीकी रूप से दक्ष नहीं हैं और उनमें से कई तो ऐसे हैं जिनके पास तकनीक के बारे में बुनियादी ज्ञान का भी अभाव है। ऐसे में यह बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है, कि उन्हें इस विषय में प्रारंभिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे अपने बच्चों को भी शिक्षित कर सकें। कोरोना महामारी ने हमें नए और रचनात्मक तरीकों में बदलाव के साथ समायोजन स्थापित करने के विषय में बहुत कुछ सिखाया है। लेकिन इस मार्ग में अपेक्षित एवं कमजोर वर्गों को साथ लेकर चलना भी आवश्यक है। सरकार द्वारा शिक्षकों का डिजिटलीकरण करने के साथ-साथ बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा के ऐसे प्लेटफॉर्म और अध्ययन सामग्री को निशुल्क उपलब्ध कराने पर बल देना चाहिए। उन्हें स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि वे ऑनलाइन शिक्षा के दौर में मात्र आवश्यक बुनियादी ढांचे के अभाव के चलते पीछे न रह जाए।

 

 

प्रो. केजी सुरेश

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

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