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बुक या फेसबुक निर्णय की अहम् घड़ी

बुक या फेसबुक निर्णय की अहम् घड़ी

1990 के आर्थिक सुधारों के आईने में सम्प्रति जिस क्षिप्रता से वैश्वीकरण का दौर वैश्वीकरणचल पड़ा है, उसके उत्तर संक्रमण काल में मानव के विचारों, भावों एवं अनुभूतियों में तब्दीलियों की तेज आंधी आई हुई है-जिसके अनियंत्रित बहाव में यदि किसी का सबसे अधिक नुकसान हुआ है तो वह है मानव की कल्पनाशीलता और भावों की संवेदनशीलता का। प्रतिकूल परिवर्तनों की उस लम्बी फेहरिस्त में यदि किसी का बसा-बसाया संसार लूटा है तो वह है किताबों की दुनिया का। परिस्थितियां तो इतनी नाजुक हुई हैं कि आज हम बुक कम पढ़ रहे हैं फेसबुक अधिक देख रहे हैं। बुक से फेसबुक तक के इस युगांतकारी सफर में हमारी मानसिक शक्ति और विजुअलाइजेशन पावर का धीरे-धीरे मंदन हुआ है जो हमारे आत्मबोध और आत्म मीमांसा का प्रश्न बन चुका है।

इंटरनेट के आगाज से पहले नानी और दादी की दुनिया होती थी जिनका वात्सल्य संसार कहानियों से भरा होता था। ‘मां, तू कह एक कहानी, बेटा क्या तूने समझ लिया मुझको अपनी नानी?’, सरीखे मधुर भावों की स्निग्धता में कहानी प्राय: ऐसे शुरू होती थी, ‘…बेटा बहुत समय पहले किसी घने जंगल में एक शेर रहता था। उसी जंगल में एक हाथी भी रहता था। एक दिन की बात है। जंगल में अचानक तेज बारिश होने लगी…जंगल पानी से भर गया…’ और इस कहानी के साथ-साथ पिक्चराइजेशन शुरू होता था… कहानी सुननेवालों के दिमाग में कहानी के पात्र, सीन और सीनरी किसी सिनेमा की रील के मानिंद बड़ी तेजी से चलते रहते थे। घने जंगल की तस्वीर बनती थी, डरावना शेर जीवंत होकर दहाड़ उठता था और हाथी अपनी विशालता के साथ हमें बौना कर जाता था। बारिश की बूंदों से मन और प्राण नहा उठते थे। कहानी खत्म हुई और किताबों के संसार की अपने आस्तित्व की आखिरी निर्णायक लड़ाई का आगाज हो गया और सोशल नेटवर्किंग साइटस के रूप में खूबसूरत चेहरों को पढऩे और देखने की एक नई परंपरा ने आधुनिकतम भगवान का रूप ले लिया।

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आज प्रश्न यह नहीं है कि पुस्तकों के पठन के प्रति लोगों में उदासीनता की जड़ कहां है? अति महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आखिर पुस्तकों के उस तिलस्मी दुनिया की वापसी का माकूल रास्ता क्या है? कहते हैं कि पुस्तकें उसी तरह से मानव मस्तिष्क के लिए अनिवार्य हैं जैसे तलवार की धार के लिए सान का पत्थर। इसका आशय यह है कि एक पुस्तक फेसबुक और इंटरनेट की करिश्माई दुनिया की अपेक्षा मन की धार को अधिक गहराई से तेज करती है। फिर पुस्तकों में कमियां कहां रह गईं जिसके परिणामस्वरुप इनसे पाठकों का मोह भंग हो गया है? लाइब्रेरी साइंस का एक बेसिक प्रिंसिपल यह कहता है कि प्रत्येक पुस्तक का एक पाठक होता है, इस लिहाज से फिर क्या यह सच नहीं है कि प्रत्येक पाठक की भी एक पुस्तक होती है? कदाचित आज इस मुद्दे पर हमें काफी शिद्दत से सोचने की आवश्यकता है कि क्या आज हम सही मायनों में एक पाठक को उसके मन-पसंद की पुस्तक दे पा रहे हैं? किसी पुस्तक के बारे में कहा जाता है कि वह पुस्तक उस लेखक के जीवन का वह दर्पण होता है जिसमें पाठक खुद को देखने और परखने की कोशिश करता है। लेकिन मैं यहां पर एक मूलभूत बात, जो कि हम दुर्भाग्यवश भूल जाते हैं, जिसके बारे में, मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा, वो यह है कि लेखक के अपने जीवन के अनुभव और अनुभूति कभी भी सार्वभौमिक रूप से पाठकों के परिवार के जीवन की परिस्थितियों से अनिवार्य रूप से मेल नहीं खा सकता है। आज जबकि हम भौतिकवादी अर्थव्यवस्था की गलाकाट प्रतियोगिता के युग में रह रहे हैं और जहां पर हर कोई एक दूसरे से आगे बढऩे के लिए किसी तांगे के घोड़े की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है, तो यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि आखिर हम पाठकों को परोस क्या रहे हैं? पुस्तकों का जीवन पर प्रभाव एक सुधारात्मक पक्ष वाला होना चाहिए जो पाठक के अंतर्मन को कुरेदकर समस्या की जड़ में ले जाए और फिर दोषरहित समाधान बताए। महान लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने कहा था, ‘स्वास्थ्य पुस्तकों को पढऩे में सावधानी रखें। कहीं मिसप्रिंट से आपकी मृत्यु न हो जाए।’

आशय यह है कि पुस्तकें पाठक के लिए आत्मा के उस प्रकाश पुंज के रूप में होनी चाहिए जो हमारे मन के अंधेरे को दूर कर आत्मज्ञान की रौशनी फैलाएं और वर्षों से मन पर पड़े भ्रम और अज्ञानता के मकडज़ाल को साफ कर हमारा सही मार्गदर्शन करें। मन को और अधिक तिमिर की तरफ ले जाने वाली और मन को और अधिक भ्रमित करने वाली पुस्तकों को पढऩे के बारे में पुनर्विचार की आवश्यकता है।

महान लेखक ऑस्कर वाइल्ड ने एक बार कहा था, ‘पुराने समय में किताबें विद्वानों के द्वारा लिखी जाती थीं और सामान्य लोग पढ़ते थे। आज किताबें सामान्य लोगों के द्वारा लिखी जाती हैं और किसी के द्वारा भी नहीं पढ़ी जाती हैं।’

आज जबकि हम सूचना तकनीक के जमाने में रह रहे हैं जहां ज्ञान को शक्ति माना जा रहा है, तो हमें यह शिद्दत से सोचने की दरकार है कि सोशल साइट्स के विभिन्न उत्पादनों के साथ कदम-कदम पर सूचनाओं की प्रचुरता के युग में पुस्तकों की अहमियत को कैसे धारणीय बनाया जाए और प्रत्येक पाठक को उनकी अपनी पसंदीदा पुस्तक तक कैसे पहुंचाया जाए। आज आवश्यकता है कि पुस्तकों की गुणवत्ता को परिष्कृत करके उसमें पाठकों के मन की बातों को ऐसे पिरोया जाए जिसके अक्स में उन्हें अपना चेहरा, चरित्र और चमत्कार साफ-साफ परिवर्तित होता हुआ प्रतीत हो।

श्रीप्रकाश शर्मा

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