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शिखर पर सामाजिक समरसता

शिखर पर सामाजिक समरसता

 

 

 

 

दीपक कुमार रथ
(editor@udayindia.in)

द्रौपदी मुर्मू के देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद, देश के इस सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पूर्ण सामाजिक समरसता का लक्ष्य हासिल कर लिया गया। जो कि संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का सपना था।  द्रौपदी मुर्मू वर्तमान राजनीति का एक ऐसा चेहरा हैं, जिनके लिए राजनीति ताकत और पैसा नहीं बल्कि सामाजिक सेवा और परोपकार का माध्यम होता है। उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक करियर के दौरान शुचिता और उच्चतर राजनीतिक मूल्यों का सम्मान रखा है।  यही वजह है कि जब वह राष्ट्रपति बनीं तो उनके राजनीतिक विरोधी भी नमन करने के लिए मजबूर हुए। द्रौपदी मुर्मू की जीत ने लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप का उदाहरण पेश किया है। अतीत में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दो उम्मीदवार, जो राष्ट्रपति जैसे उच्च संवैधानिक पद तक पहुंचे, उनका जीवन आदर्श रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में राष्ट्रपति बनने वाले मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन भारतीय संस्कृति, परंपरा और मानवीयता का जीवंत उदाहरण था। उनके अलावा पूर्व राष्ट्रपति  रामनाथ कोविंद ने तो बड़ी ही विनम्रतापूर्वक राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम लोगों के लिए भी खोल दिए। इसी महान परंपरा की वाहक नवनियुक्त राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने पहले ही अभिभाषण में यह संकेत दे दिया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार देश के गरीबों के उत्थान के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाने वाली है। यह एक सुखद संयोग है कि जिस घड़ी में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की विदाई हो रही थी और द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति भवन में कदम रख रही थी, ठीक उसी समय दिल्ली में भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उप-मुख्यमंत्रियों की बैठक हो रही थी। इस बैठक में गरीबों के हितों की योजनाओं की समीक्षा की गयी और इस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बड़ा सन्देश दिया।

द्रौपदी मुर्मू के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने का सांकेतिक महत्व है। जिसे सोशल मीडिया के इस जमाने में भी नकारा नहीं जा सकता है। यह कदम हाशिए पर पड़े गरीब और बहिष्कृत लोगों को लोकतांत्रिक सत्ता की प्रक्रिया में शामिल करेगा। वास्तव में द्रौपदी मुर्मू का देश की राष्ट्रपति के रूप में चयन देश की महिला और आदिवासी दोनों का ही सशक्तिकरण है। आजादी के बाद पैदा हुई द्रौपदी मुर्मू, देश के लिए बेहद गौरवपूर्ण आजादी के अमृत महोत्सव काल में राष्ट्रपति पद पर आसीन हुई हैं। उनके शपथ ग्रहण के दौरान जिस तरह से आदिवासी और वनवासी समाज ने खुशी जाहिर की, उसने भारत राष्ट्र की नई राजनीतिक ताकत की तरफ इशारा किया है। यह सिर्फ द्रौपदी मुर्मू के जीवन का ही नया अध्याय नहीं है बल्कि यह सदियों से हाशिए पर रहे वंचित समाज के लिए भी नई शुरुआत है, जिनकी भलाई के लिए द्रौपदी मुर्मू ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है।

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