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बिखर गयी विपक्षी एकता : 2024 में भाजपा सरकार का बनना तय

बिखर गयी विपक्षी एकता : 2024 में भाजपा सरकार का बनना तय

विपक्षी दल सारी कवायद के बाबजूद भी एक होने के बजाय और बिखरते चले जा रहे हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव शुरू होते ही ममता बनर्जी कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिली अन्य दलों के नेताओं के अलावा विशेष तौर से नेशनल पार्टी सुप्रीमों शरद पवार से मिली। शरद पवार को राष्ट्रपति का चुनाव लडऩे के लिये राजी करनें की कोशिश की पर शरद पवार कोई कच्ची गोलियां नहीं खेले। वे जानते थे कि विपक्ष का प्रत्याशी किसी तरह भी चुनाव नहीं जीत सकता इसलिये उन्होनेे तुरन्त मना कर दिया। दूसरे राजनेताओं को टटोलनें की कोशिश की। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने भी मना कर दिया। फिर उन्होनें अपनी ही पार्टी के सांसद यशवंत सिन्हा को कहा वे तुरन्त राजी हो गये। उन्होनें सोचा नाम तो होगा पहली बात तो व्यूरोकेट थे अत: उनका नाम सुझाना ही गलत था दूसरी तरफ जिस भाजपा की थाली में खाया उसी में छेद कर चुके थे। वे प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के साथ वित्तमंत्री रह चुके थे उन्होंने बाजपेयी जी को भी नहीं बख्शा था।

जब चुनाव आया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सुझाये गये एक जनजाति महिला द्रोपदी मुर्मू को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया। इस नाम के आगे विपक्ष की राजनीति फेल हो गयी। खुद ममता को कहना पड़ा कि पहले पता होता तो वे भी सहमत हो जाती। फिर भी विपक्ष मोर्चे पर डटा रहा और चुनाव में उनके प्रत्याशी ने बुरी तरह मुंहकी खायी। ममता बनर्जी चारों खाने चित्त, खाश तौर से जब लगभग सभी विपक्षी पार्टियों से थोड़ी बहुत क्रोस वोटिंग हुयी। यहां तक कि उनकी खुद की पार्टी से भी द्रोपदी मुर्मू को अप्रत्याशित वोट मिले।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना पार्टी के वोट भी भाजपा प्रत्याशी को पड़े क्योंकि उन्हें अपनी पार्टी के सांसदों के आगे झुकना पड़ा। राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग का दंश अभी लगा ही था कि उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी। सभी विपक्षी दल एक मत होकर किसी नाम पर चर्चा तक नहीं कर सके। कांग्रेस पार्टी ने श्रीमती मारग्रेट अल्वा का नाम घोषित कर दिया। पार्टी ने ये नाम काफी सोच समझ कर तय किया। उन्हें राजनीति का लम्बा अनुभव है, केन्द्रीय मंत्री रही हैं, महिला भी हैं। वे अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। यहां भी भाजपा ने बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को प्रत्याशी बना कर नहले पे दहला जड़ दिया। धनखड़ वरिष्ठ अधिवक्ता हैं जिनकी राजस्थान हाई कोर्ट में तूती बोलती थी। यहां सबसे बड़ी बात ये है कि वे गांव के एक किसान के बेटे हैं। इससे किसान खुश हो गये। वे जाट भी हैं। राजस्थान, हरयाणा और उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाटों का अच्छा खाशा प्रभाव है इससे जाटों में खुशी की लहर दौड़ गयी।

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जाटों के सबसे बड़े कद्दावर नेता रहे हैं, बाद में उनके पुत्र अजीत सिंह ने नेतृत्व संभाला अब उनके पुत्र जयन्त चौधरी समाजवादी पार्टी के गठबंधन में हैं और राज्यसभा सदस्य बन गये। जयन्त चौधरी और किसानों के प्रदर्शन में कृषि बिल के समय उभरे टिकैट नेता दोनों ही एक जाट के उपराष्ट्रपति बननें से हाशिये में चले जायेंगे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने कहा था कि वे लोक सभा चुनाव में सारी सीट जीतेंगे। जिन दो चार सीटों पर जाट बेल्ट में मुकाबला हो सकता था। अब उसकी संभावना भी खत्म हो जायेगी। इस तरह योगी का ये कथन कि वे सभी 80 सीटें जीतेंगे, पूरा होता दिखाई दे रहा है।

उपराष्ट्रपति चुनाव में बात यहां तक बड़ गयी कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुये कहा कि कांग्रेस पार्टी ने मारग्रेट अल्वा को प्रत्याशी बनाने से पहले उनसे पूछा नहीं। यह कहते हुये अपनी पार्टी को चुनाव से ही अलग कर लिया यानि उनके सदस्य वोट ही नहीं डालेंगे। उनके वोट डालने या न डालने से चुनाव पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला था क्योंकि एन.डी.ए. को बहुमत प्राप्त था। लोकतंत्र में यह भी देखने को मिला जहां पूरी सरकारी मशीनरी, चुनाव आयोग और देश के सभी बड़े नेता प्रत्येक व्यक्ति को अपना मताधिकार उपयोग करने को कह रहे हों। वहीं एक मुख्यमंत्री मत के उपयोग से मना कर रही है। शायद उनके मन में यह भी होगा कि यहां भी क्रॉस वोटिंग होगी और उनकी भद्द पिटेगी।

पूरे विपक्ष का ये हाल है कि एका तो दूर की बात बिखराव और हो रहा है। सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस हर चुनाव में सिमटती जा रही है और टूटती जा रही है। लगभग सभी प्रदेशों से पार्टी के बड़े बड़े नेता कांग्रेस छोड़ कर जा रहे हैं। ममता की तृणमूल कांग्रेस और सोनिया की कांग्रेस में मतभेद बड़ते जा रहे हैं। ममता अपनी पार्टी को कांग्रेस के विकल्प के रूप में दर्शा रही है जिसे सोनिया कांग्रेस बर्दाश्त ही नहीं कर सकती। उधर महाराष्ट्र में शिवसेना दो फाड़ हो गयी। बड़ा हिस्सा भाजपा से एकनाथ शिंदे की अगुवाई में जा मिला। नेशनल कांग्रेस के दो बड़े नेता जेल में हैं। कश्मीर की दोनों मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता इतना घबरा गये हैं कि कोई न कोई ऊलजुलूल ब्यान देते रहते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पार्टी के बड़े नेता तो राष्ट्रीय तिरंगा लगाने से मना कर दिया। अब क्या विपक्षी पार्टियां एैसी पार्टी का साथ देगी जो एक तरह से राष्ट्रहित के विरूद्ध बोल रही है। मुफ्ती की पी.डी.पी. पार्टी को विपक्ष अपने साथ कैसे रख सकेगा।

विपक्ष की एकता के जितने प्रयास किये जाते हैं वो और टूटती जाती है क्योंकि एक जुट होने में लोकतंत्र के हित से ज्यादा हर घटक अपना स्वार्थ पहले देखता है। उत्तर प्रदेश में इसलिये आज अखिलेश यादव की पार्टी अकेले रह गयी है। बसपा कांग्रेस तो उसके साथ कभी आयेगी नहीं। चाचा शिवपाल गये, ओम प्रकाश राजभर भी गये। विपक्षी ममता और कांग्रेस में नहीं बनती सपा अलग थलग पड़ गयी। कश्मीर की दोनों विपक्षी पार्टियां राष्ट्रहितों को नजर अंदाज कर रही। दक्षिण में राष्ट्रपति चुनाव में और उड़ीसा में सत्ताधारी बीजू जनता दल तथा एन.डी.ए. का साथ दिया। कुल मिला कर विपक्षी एकता बिखर कर चूर-चूर हो रही है।

 

 


डॉ.
विजय खैरा

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