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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 : महत्वाकांक्षाएं, चुनौतियां और समाधान

राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 : महत्वाकांक्षाएं, चुनौतियां और समाधान

शिक्षा नीति 2020 को हम दो भागों में बांट सकते हैं। एक, स्कूली शिक्षा एवं दूसरी, उच्च शिक्षा। आज हम उच्च शिक्षा पर बात करते हैं। इस नीति में यह कहा गया है कि यह विश्व की सबसे अच्छी शिक्षा व्यवस्था होगी जो व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास करेगी। उसमें ज्ञान, विज्ञान, नैतिकता, आत्मनिर्भरता राष्ट्रभक्ति, मानवता, वाकपटुता के गुण स्वाभाविक रूप से भरते हुए एक तर्कशक्तिपूर्ण, आत्मविश्वासी नवयुवक तैयार करेगी। जिसका विचार एवं व्यवहार का दायरा अध्यात्म, विज्ञान एवं शोध पर आधारित होगा। जो हमारी संस्कृति, परम्परा, स्वर्णिम इतिहास एवं पुरातन शोध को साथ लेकर उस पर गर्व करता हुआ विश्व पटल पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराएगा। इस व्यवस्था में पढक़र नवयुवक एवं नवयुवतियां आधुनिक एवं पुरातन ज्ञान-विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ विकसित मिश्रण होगा।

ऐसा भी कहा गया है कि इस व्यवस्था को पूरी तरह से लागू करते हुए पुन: हम विश्वगुरु का स्थान प्राप्त करेंगे। इस शिक्षा नीति में यह प्रावधान किया गया है कि युवक/युवती अपनी इच्छानुसार विषय पढ़ेंगे। जब इच्छा हो, पढ़ाई छोड़ सकते हैं और जब इच्छा हो फिर पढ़ाई शुरू कर सकते हैं। विज्ञान, वाणिज्य कला, तकनीक एवं व्यवसायिक शिक्षा विद्यार्थी एक साथ पढ़ सकता है। शिक्षकों का लगातार प्रशिक्षण होगा, उचित वेतन मिलेगा, अध्ययन-अध्यापन की सर्वोत्तम सुविधा मिलेगी। अध्यापक एक शिक्षक के साथ-साथ अच्छा मार्गदर्शक, दार्शनिक एवं मित्र भी होगा। विद्यार्थियों का सम्पूर्ण विकास उसका मूल उद्देश्य होगा। इस व्यवस्था में पैसों की कमी की वजह से किसी भी विद्यार्थी को अपनी इच्छानुसार विषय को पढऩे से नहीं रोका जाएगा।

इस व्यवस्था में यह भी कहा गया है कि प्रत्येक कॉलेज विभिन्न विषयों के अध्ययन एवं अध्यापन की सुविधा से युक्त होगा। अपने आप में स्वतंत्र अस्तित्व रखेगा। स्वयं ही पाठ्यक्रम बनाएगा। स्वयं ही परीक्षा कराएगा एवं स्वयं ही डिग्री प्रदान करेगा। धीरे-धीरे यह संस्थान विश्वविद्यालय का स्तर प्राप्त करेगा। इसके लिए उसे हर स्तर पर कुछ मानक अंक प्राप्त करने होंगे। यह अंक नेक नामक संस्थान पूर्ण रूप से परीक्षण कर प्रदान करेगी। सारे विश्वविद्यालय अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ अनुसंधान एवं सामाजिक विकास को विशेष महत्व देंगे। सभी विश्वविद्यालय अनिवार्य रूप से विभिन्न विषयों के अध्ययन एवं अध्यापन की सुविधा से युक्त होंगे।

एकाकी महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय या तो बहुआयामी अध्ययन-अध्यापन शिक्षण संस्थान बन जाएंगे या बन्द हो जाएंगे। इसी प्रकार सम्बद्ध कॉलेज भी खत्म हो जाएंगे। वे स्वतन्त्र हो जायेंगे और उनकी सम्बद्धता खत्म हो जाएगी। हर महाविद्यालय को नैक द्वारा प्रत्यापित होना आवश्यक होगा। उसको अपने मानकों को उचित अन्तराल में आगे बढ़ाते रहना होगा।

अध्यापकों को अध्ययन-अध्यापन प्रशिक्षण एवं शोध की पूरी सुविधा प्राप्त होगी। उनको उनका पूर्ण पारिश्रमिक मिलेगा। उनको अपना कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता मिलेगी। यही व्यवस्था उनकी पदोन्नति में भी सहायक होगी। अध्यापक शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। राष्ट्रीय शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान की वर्तमान कार्यशैली में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अनियमितताएं खत्म होंगी। शिक्षण-प्रशिक्षण की प्रतिष्ठा पु:न स्थापित की जाएगी। एकाकी बीएड कॉलेज बन्द होंगे। शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान वहीं चलेंगे, जिनके पास विभिन्न विषयों की पढ़ाई पहले से हो रही होगी। अध्यापक बनने के लिये चार वर्ष का बीए-बीएड या बीएससी-बीएड होना न्यूनतम अनिवार्य शिक्षा होगी। यदि किसी ने शिक्षण विषय में 4 वर्ष का कोर्स कर रखा है तो वह बीएड एक साल का कर सकता है। जिसने शिक्षण विषय में तीन साल का कोर्स कर रखा है, वह बीएड दो साल का कर सकता है।

इसी तरह एमएड किया जा सकता है। शिक्षक-प्रशिक्षण के सारे प्रवेश पूरे भारत में एक प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होंगे। ताकि पूरे देश में शिक्षकों का स्तर एक जैसा हो। शिक्षक-प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। उसमें भाषाज्ञान, इतिहास, भारतीय संस्कृति, व्यवसायिक शिक्षा, संस्कार पर विशेष महत्व दिया जाएगा। प्रत्येक विद्यार्थी को अनिवार्य रूप से शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान में जाकर शिक्षण योजना से लेकर अध्यापन तक का काम करना होगा।

सभी कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों के नियंत्रण एवं नियमन के लिए विभिन्न संस्थान जैसे यूजीसी. एआईसीटीई, एनसीटीई, बीसीआई आदि द्वारा सभी संस्थानों के नियमन एवं निरीक्षण का अधिकार समाप्त हो जाएगा। उसके स्थान पर एक उच्च शिक्षा आयोग बनेगा। वही सभी कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों का नियमन एवं नियंत्रण करेगा। इसके पीछे सरकार का यह मानना है कि नियमन के नियम कम पर कठोर होंगे तथा अधिकांश नियमन संस्थाओं द्वारा पारदर्शिता रखते हुए राष्ट्रीय वेबसाइट पर अपने विभिन्न आयामों की घोषणाओं के आधार पर होंगे। उनका नेक द्वारा दिया गया मापदण्ड (ग्रेडिंग) भी महत्वपूर्ण योगदान करेगा।

यह भी कहा गया है कि विश्व के 100 उच्च श्रेणी के विश्वविद्यालयों को भारत में आकर अपना परिसर खोलने की इजाजत होगी। उसी प्रकार भारत के भी श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को भारत के बाहर अपने परिसर को खोलने की इजाजत होगी। सभी विश्वविद्यालय विदेशी बच्चों को अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान के लिये आकर्षित करेंगे। इस प्रकार नालन्दा एवं तक्षशिला जैसे मानक विश्वविद्यालयों का सपना साकार होगा।

सम्पूर्ण भारत में सारे विश्वविद्यालय अनुसंधान में लगेंगे। उनको वित्तीय सहायता देने एवं उनको समसामायिक अनुसंधान एवं प्रोत्साहित करने के लिये एक राष्ट्रीय अनुसंधान आयोग अलग से बनेगा (एनआरएफ)।

उच्च शिक्षा आयोग के अन्तर्गत चार परिषदें बनेंगी। वे इस प्रकार होंगी-

  1. नेशनल हायर एजुकेशन रेगुलेटरी काउंसिल (एनएचईआरसी)
  2. नेशनल एक्रीरेशन काउंसिल (नाक)
  3. हायर एजुकेशन ग्रांट काउंसिल (एचईजीसी)
  4. जनरल एजुकेशन काउंसिल (जीईसी)

वर्तमान में देश में उच्च शिक्षण संस्थाओं का ब्यौरा इस प्रकार है-

(क)         आईआईटीएस                                     23

(ख)        एनआईआईटीएस                              31

(ग)         इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस                20

(घ)         सेन्ट्रल यूनिवर्सिटीज                       54

(ड.)         डीम्ड यूनिवर्सिटीज                         123

(च)         स्टेट गर्वमेंट यूनिवर्सिटीज              411

(छ)         स्टेट प्राइवेट यूनिवर्सिटीज                            361

कुल                                                                   1023

इनमें से कुछ ही संस्थानों में बहुआयामी शिक्षा की व्यवस्था है। जब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सन्दर्भ में बहुआयामी शिक्षा की बात करते हैं तो उसका मतलब होता है कि एक महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में एक-एक इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलीटेक्निक कॉलेज, आई.टी.आई कॉलेज, ह्यूमैनिटी कॉलेज, लॉ कॉलेज, एग्रीकल्चर कॉलेज, पैरामेडिकल एवं नर्सिंग कॉलेज, बी.एड कॉलेज, फार्मेसी कॉलेज, विज्ञान कॉलेज एवं वाणिज्य एवं प्रबन्धन कॉलेज आदि। यानी ये सभी एक ही स्थान पर हों। इनमें पढ़ाने वाले प्रोफेसर पर्याप्त संख्या में हों। सभी विषय उपलब्ध हों। सभी तरह की पुस्तकें हों, प्रयोगशालाएं हों और वहां पर अनुसंधान के सभी अवसर उपलब्ध हों।

चुनौतियां-

  1. यह सब एक दिवास्वप्न लगता है क्योंकि वर्तमान में अधिकांश सरकारी संस्थानों में जो या तो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित होकर चल रहे हैं उनमें अध्यापकों एवं आधारभूत सुविधाओं का नितान्त अभाव है।
  2. कुछ कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में इतने विद्यार्थी पंजीकृत हैं कि अगर वे सभी विद्यार्थी एक साथ आ जाएं तो उस कॉलेज में पैर रखने को जगह नहीं होगी। उनकी अनिवार्य प्रतिदिन शिक्षा का तो सवाल ही नहीं उठता। उनकी परीक्षाएं खेल मैदान में तम्बू लगाकर की जाती है।
  3. सरकारी विश्वविद्यालयों में ऐसे कई प्रोफेसर हैं जो पूरे साल में एक बार भी कक्षा में पढ़ाने नहीं जाते। मात्र राजनीतिक या सरकार की तरफ से निजी महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों में निरीक्षण करने जाते हैं और अनाप-शनाप पैसा बटौर कर लाते हैं। यह कड़वा सच है कि शिक्षा में पूर्णतया भ्रष्टाचार व्याप्त है।
  4. महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय अध्ययन-अध्यापन एवं संस्कार केन्द्रों के बजाय छात्र एवं शिक्षक राजनीति के अड्डे बने हुए हैं।
  5. जहां तक निजी संस्थानों का हाल है उनमें से अधिकांश पूर्ण रूप से व्यवसायिक तरीके से चल रहे हैं। उनमें कोई सेवा एवं संस्कार देने का भाव नहीं है। जो ठीक चल रहे हैं वे पूर्ण रूप से विदेशी कम्पनियों के लिये अच्छे वफादार देश की जनता को लूटने के लिये नौकर तैयार कर रहे हैं जो ठीक से नहीं चल रहे हैं। वे हर तरह का नैतिक-अनैतिक काम कर रहे हैं। फिर भी बिकने को तैयार हैं। क्योंकि उनसे बैंकों का लोन नहीं चुकाया जा रहा है। जो थोड़ा-बहुत स्टाफ है उसकी तनख्वाह नहीं दी जा रही है। स्थितियां बड़ी विकट एवं विकराल हैं। फिर हमें देखना है कि हमारी आवश्यकता क्या है?

यूएनडीपी के आंकड़ों के मुताबिक पूरी दुनिया में 121 करोड़ युवा हैं। इनमें से 21 प्रतिशत भारत में हैं। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। भारत की कुल आबादी का 18 प्रतिशत युवा है। हमारे देश की आवश्यकता है कि हमारे देश में जो युवा हैं उनको उचित शिक्षा, प्रशिक्षण, रोजगार, उद्यमशीलता, देशभक्ति, समाज के प्रति संवेदनशीलता, हमारी संस्कृति, संस्कार एवं महापुरुषों का आदर-गर्व एवं उसी अनुसार आचरण, ये सब हमें पूर्ण रूप से चाहिए। तभी हमारा युवा आत्मनिर्भर होगा, आत्मविश्वासी होगा। उसका मनोबल ऊंचा होगा, और फिर देश आगे बढ़ेगा। इसलिए यह तो तय है कि भौतिक विकास देश के विकास का सम्पूर्ण मापदण्ड नहीं हो सकता।

इसके लिये हमें निम्न काम करने होंगे:-

(1) कक्षा 12 पास करने के बाद छात्र/छात्रा को अनिवार्य रूप से दो वर्ष देश के लिये बिना किसी पारिश्रमिक सेवा करने का नियम बनाना चाहिये और यह सेवा सेना या शस्त्र बलों या राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान में करनी होगी। उसे उसकी शारीरिक क्षमता के अनुसार कठोर परिश्रम कम से कम दिन में 10 घण्टे नि:स्वार्थ भाव से करने का अभ्यास होना चाहिये। यदि ऐसा होता है तो नवयुवकों में देशभक्ति एवं सामाजिक संवेदनशीलता स्वत: ही आ जायेगी। जिसकी हमको सबसे अधिक पहली आवश्यकता है।

(2) कक्षा 6 से लेकर 12 तक एवं स्नातक की शिक्षा में एक पेपर होना चाहिए, जिसे 70 प्रतिशत अंकों से उसे पास करना जरूरी होना चाहिए। इस पेपर में संविधान, नैतिकता, सद्व्यवहार, राष्ट्रीय महापुरुष संत, शिक्षाविद् वैज्ञानिक, न्यायाधीश आदि के जीवन को विस्तार से पढ़ाना चाहिए। सही परिप्रेक्ष्य में धर्म एवं जातियों की विस्तृत जानकारी भी इस पेपर के माध्यम से दी जानी चाहिये।

(3) हमारे कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का निरन्तर प्रशिक्षण होना चाहिए। उन्हें विषयवस्तु में निपुणता तो होनी ही चाहिए साथ-साथ नौजवान पीढ़ी को कैसे पढ़ाना चाहिए? कैसे उनका मार्गदर्शक, मित्र एवं दार्षनिक बना जाए? यह भी सिखाना चाहिए। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहनी चाहिए। तभी हम जिम्मेदार, आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, देशभक्त एवं समाज के प्रति संवेदनशील युवक तैयार कर समाज को दे पाएंगे। इसी के द्वारा व्यक्ति में ईमानदारी, सदाचार, आपसी सहयोग एवं सह-अस्तित्व का भाव पैदा होगा।

(4) केन्द्र सरकार को एक उच्च शिक्षा वित्त आयोग बनाना चाहिये, जिसमें कम से कम 50 लाख करोड़ रुपया जमा कराना चाहिये। इस वित्त आयोग से सभी कॉलेज, विष्वविद्यालयों एवं विद्यार्थियों को जरूरत के अनुसार रियायती दर पर ऋण उपलब्ध कराना चाहिए। उसमें निजी एवं सरकारी का फर्क खत्म कर देना चाहिए। उनकी सुविधा अनुसार वापसी की किन्तु निर्धारित की जानी चाहिए। सभी तरह के अनुदान एवं छात्रवृत्तियां बन्द कर देनी चाहिए। संस्थान एवं विद्यार्थी अपनी जरूरत के अनुसार लोन लें और उसको रियायती ब्याज दर पर चुकाए। इससे वित्त आयोग की आमदनी बढ़ती रहेगी। सभी महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय अपने विषयों के अनुसार आधारभूत निर्माण कर पाएंगे तथा आवष्यकतानुसार अपनी प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय बना पाएंगे। उसी अनुसार अध्यापक नियुक्त कर पाएंगे और आत्मनिर्भर बनेंगे।

मेरे विचार से ऐसा सब कुछ होने पर ही उच्च शिक्षा नीति के आदर्शों को पाने का प्रयास हम कर पाएंगे। अन्यथा नई शिक्षा 2020 की उच्चशिक्षा पर प्रस्तुत प्रस्तावना एक दिवास्वप्न बनकर ही रह जाएगी।

 

 

डॉ. अशोक कुमार गदिया

(लेखक स्वतंत्र  लेखक एवं विचारक हैं)

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