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संतुलित शख्सियत की धनी

संतुलित शख्सियत की धनी

25 जुलाई को द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली और आजाद भारत में पैदा होने वाली, सबसे कम उम्र की और देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनने का रिकॉर्ड बनाया। यह नए भारत की नई संकल्पना है, जहां समाज के अंतिम पायदान का व्यक्ति भी इस ऊंचाई तक पहुंच सकता है। यही दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के संकल्प की पूर्ति का रास्ता है जिसे बीजेपी ने अमली जामा पहनाया है। राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले संबोधन में द्रौपदी मुर्मू ने कहा भी की उनकी जीत उनकी अकेले की जीत नही है, यह भारत के सभी गरीबों की जीत है।

द्रौपदी मुर्मू ने ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर की रामा देवी कॉलेज से आर्ट्स ग्रेजुएट हैं। सिंचाई विभाग में क्लर्क की नौकरी भी की। उसके बाद वो शिक्षक बन गईं। बाद में उन्होंने राजनीति जॉइन कर लीं। द्रौपदी मुर्मू दो बार विधायक बनकर ओडिशा विधानसभा पहुंचीं और 2007 में उन्हें सर्वोत्तम विधायक का नीलकंठ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में मुर्मू को मंत्री बनाया गया। फिर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें झारखंड का राज्यपाल बना दिया। 18 मई 2015 को झारखंड की 9वीं राज्यपाल बनाई गईं और 12 जुलाई 2021 तक इस पद पर रहीं।

गौरतलब है कि द्रौपदी मुर्मू झारखंड की पहली महिला राज्यपाल (2015- 2021) भी थी। झारखंड की पूर्व राज्यपाल और अब  राष्ट्रपति वो शख्सियत हैं जिन्होंने सत्ता और विपक्ष के बीच हमेशा संतुलन को बनाए रखने का काम किया। इस दौरान उनका कार्यकाल पूरी तरह बेदाग रहा था। झारखंड की राज्यपाल रहते हुए द्रौपदी मुर्मू ने खुद को विवादों से दूर रखा। राजभवन पर हमेशा केंद्र में सत्तारूढ गठबंधन की सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगता रहा हैं, लेकिन द्रौपदी मुर्मू ने इस तरह के विवादों से अलग रखा। राज्य में संवैधानिक प्रमुख के रूप में उन्होंने पक्ष-विपक्ष दोनों नेताओं की बातें सुनी, बल्कि उनके कार्यकाल में राजभवन का द्वार हर संगठनों के लिए खुला रहा। आदिवासी हित के मद्देनजर द्रौपदी मुर्मू ने राज्यपाल रहते हुए बीजेपी की पूर्ववर्ती रघुवर दास और झारखंड मुक्ति मोर्चा की मौजूदा हेमंत सोरेन को कई नसीहत देने का काम भी किया।

सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक को किया वापस

बीजेपी की पूर्ववर्ती रघुवर दास की सरकार ने आदिवासियों के हितों को संरक्षित करने वाले दो महत्वपूर्ण कानून छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी) में संशोधन की कोशिश की और विपक्षी सदस्यों के भारे हंगामे के बीच 21 नवंबर 2016 को इसे विधानसभा से पारित कर कराने के बाद जब राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के पास भेजा गया, तो आदिवासी हितों को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने करीब सात महीने तक विचार करने के बाद 26 जून 2016 को इस विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार को वापस भेज दिया। इस सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक में जमीन मालिक को अपनी भूमि में परिवर्तन का अधिकार मिलने की बात कही थी। इसमें प्रावधान था कि कृषि के अलावा वे अपनी जमीन का उपयोग व्यावसायिक कार्यों के लिए भी कर सकेंगे।

टीएससी गठन के मुद्दे पर सीएम हेमंत सोरेन को दी नसीहत

वर्ष 2019 में राज्य में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार गठन के बाद ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल का गठन किया गया, इसमें राज्यपाल की शक्तियों को कम कर दिया गया, जिसके बाद राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू कानूनी सलाह ले रही थी, लेकिन उनका कार्यकाल खत्म हो गया। इसके बावजूद उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को इसे लेकर आवश्यक नसीहत दी थी और स्पष्ट किया था कि संविधान में जो व्यवस्था की गयी है, उसे सबको मानना चाहिए, उसको उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए। आर्टिकल 44 में आदिवासी हित की रक्षा के लिए गर्वनर के पास पूरी शक्ति है। लेकिन राज्य सरकार ने अपने स्तर से ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल का गठन कर दिया गया, उन्होंने अपने मत से वर्तमान राज्यपाल रमेश बैस को अवगत करा दिया और बाद में राज्यपाल रमेश बैस ने टीएसी गठन की फाइल को राज्य सरकार को वापस कर दिया। हेमंत सरकार ने टीएसी को लेकर जो नई नियमावली बनायी थी, उसमें काउंसिल में कम-से-कम 2 सदस्यों को नामित करने का राज्यपाल के विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया था और तकरीबन सभी अधिकार मुख्यमंत्री के हाथ आ गये थे, इसी कारण राज्यपाल ने इस नियमावली को मंजूरी देने से इंकार कर दिया था।

पत्थलगड़ी विवाद को दूर करने के लिए पहल

राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के कार्यकाल में ही झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में पत्थलगड़ी का विवाद उत्पन्न हुआ। इस विवाद को शांत कराने के लिए राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के तहत बने ग्राम प्रधानों और मानकी-मुंडाओं को राजभवन में बुलाकर उनसे बातचीत की और इस मसले के समाधान की कोशिश की।

जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण पर दिया बल

राज्यपाल के रूप में द्रौपदी मुर्मू ने झारखंड में जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण को बल दिया। कुलाधिपति के रूप में भी वह लगातार विश्वविद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए बैठकें करती रही। उन्होंने झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के शिक्षकों की नियुक्ति के मार्ग को प्रशस्त किया। साल 2016 में विश्वविद्यालय के लिए लोक अदालत लगवायी और विरोध के बावजूद चांसलर पोर्टल को शुरू कराया।

भविष्य पर नजर

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को जैसे ही राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया, इसने झारखंड के सोरेन और ओडिशा की पटनायक सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब उनके नाम पर सहमति जताई होगी, तब निश्चित रूप से उनके दिमाग में समीकरण घूम रहे होंगे। झारखंड के लिहाज से देखें तो आदिवासियों के आसपास पूरी राजनीति घूमती रहती है। सियासी तौर पर सबसे मजबूत सोरेन परिवार इसकी वकालत करता है। कांग्रेस की मदद से आजकल सत्ता में भी है। ऐसे में आदिवासी महिला को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने पूरे गेम को विपक्ष के पाले में डाल दिया है।

पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड में आदिवासियों के नाम पर राजनीति परवान चढ़ती है। आदिवासियों के बीच धर्मांतरण भी बड़ा मुद्दा है। हिन्दू संगठनों के लिए कम से कम द्रौपदी मुर्मू नाम का रोल मॉडल मिल जाएगा। जिनका हवाला देकर अपनी बात को कह सकते हैं। वहीं, इन राज्यों की राजनीति की बात करें तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजेडी और झारखंड में सोरेन परिवार की झारखंड मुक्ति मोर्चा ताकतवर क्षेत्रीय दल हैं। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस का दबदबा नहीं के बराबर है, जिस कारण बीजेपी को इन राज्यों में सीधे क्षेत्रीय दलों से मुकाबले में लोहे का चना चबाना पड़ता है। ऐसे में द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति भवन में भेजकर पार्टी अपनी लड़ाई आसान करना चाहती है।

नीलाभ कृष्ण

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