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बदलते भारत की बदलती तस्वीर : द्रौपदी मुर्मू

बदलते भारत की बदलती तस्वीर : द्रौपदी मुर्मू

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद के लिए भारी मतों से विजयी होना भारत के राजनीतिक इतिहास की बड़ी घटना है। इस जीत के मायने हैं। देश के इस सर्वोच्च पद पर आज तक कोई वनवासी नहीं पहुंच सका था। द्रौपदी मुर्मू इस पद पर जाने वाली पहली वनवासी महिला हैं। इस जीत के दूरगामी प्रभाव भी दिखेंगे। द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के मयूरभंज जिले के रायरंगपुर के एक गांव से आती हैं। यह बेहद पिछड़ा इलाका है। वनवासी बहुल है। उन्होंने गरीबी देखी है, संघर्ष किया है और जमीन से जुड़ी रही हैं। पार्षद से राजनीति आरंभ की, विधायक बनीं, मंत्री बनीं, राज्यपाल बनीं और अब राष्ट्रपति का सफर तय करेंगी। एक पिछड़े इलाके से निकल कर अपनी क़ाबलियत और संघर्ष से यह पद हासिल किया है। अगर मुर्मू के व्यक्तित्व की बात की जाए तो वो बिल्कुल सरल स्वभाव की हैं और संवेदनशील भी। झारखंड में जब राज्यपाल थीं, उसी समय अखबार में एक खबर आई थी कि गरीबी के कारण एक मां अपने पांच साल के एक बच्चे को किसी को देना चाहती है। द्रौपदी मुर्मू कितनी संवेदनशील हैं, इसका अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है कि खबर पढ़ते ही उन्होंने घोषणा कर दी कि उस बच्चे को वह गोद लेंगी, पढ़ाएंगी-लिखाएंगी। बच्चे को राजभवन बुलाया गया। द्रौपदी मुर्मू ने उसकी पूरी जिम्मेवारी खुद ली।

द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति चुने जाने से हर वर्ग में खुशी है, लेकिन वनवासी समुदाय में खास उत्साह है। इससे एक बदलाव देखने को मिलेगा। संथाल, मुंडा, भील, गोंड, हो, उरांव समेत तमाम जनजातियों में आत्मविश्वास बढ़ेगा। उन्हें महसूस होगा कि देश के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति उनका अपना है, जो उनकी बातों को सुन सकता है। चुनाव प्रचार के दौरान जहां भी द्रौपदी मुर्मू गईं, उनका जोरदार स्वागत हुआ। अगर 2011 की जनगणना को ही आधार मानें, तो देश में आदिवासियों की आबादी 10.45 करोड़ है, यह बहुत बड़ी संख्या है। इतनी बड़ी आबादी को हमेशा से लगता रहा है कि उनकी बात को कोई सुनता नहीं है और सभी राजनीतिक दलों ने उन्हें ठगा है। इनका इस्तेमाल किया है। द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से वनवासियों का भरोसा बढ़ेगा। इस भरोसे का देश को फायदा मिलेगा।

अगर विकास के मापदंड के आंकड़ों को देखें तो पता चल जाएगा कि वनवासियों के असली मुद्दों पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया है। विकास की दौड़ में ये पीछे रह गए हैं जबकि देश के कई राज्यों में इनकी आबादी इतनी है कि वे उस राज्य की राजनीति को बदल सकते हैं। मध्य प्रदेश में 1.53 करोड़, महाराष्ट्र में 1.05 करोड़ की आदिवासी आबादी है। गुजरात (89 लाख), झारखंड (86 लाख), राजस्थान (92 लाख), छत्तीसगढ़ (78 लाख) और ओडिशा (95 लाख) में भी वनवासियों की संख्या अच्छी-खासी है, इन राज्यों के चुनावों में वनवासी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते तो हैं, लेकिन उनकी समस्याएं नहीं सुलझतीं।

द्रौपदी मुर्मू जिस वनवासी समुदाय से आती हैं, उसके सामने जल, जंगल और जमीन के मुद्दे प्रमुख हैं, जिनसे उनका जीवन जुड़ा है। वनवासी प्रकृति के करीब हैं और जंगलों को साफ कर उन्होंने इसे खेती के लायक बनाया। वे मानते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों पर उनका पहला हक है लेकिन सबसे पहले अगर किसी को विस्थापित किया जाता है तो वे वनवासी ही हैं। विस्थापन और पलायन वनवासियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। औद्योगिक विकास, डैम और अन्य प्रोजेक्ट के लिए उनकी जमीन ले ली जाती है और उनका पुनर्वास ढंग से नहीं किया जाता। सरकार ने वनवासियों के पक्ष में अनेक कानून बनाए हैं लेकिन उसका लाभ वनवासियों को मिल नहीं पाता। झारखंड में सीएनटी और एसपीटी एक्ट हैं, लेकिन ऐसे कानून की धज्जियां उड़ती रही हैं। आदिवासियों की जमीन पर दूसरे लोग कब्जा करते रहे हैं। देश के कई हिस्सों में ऐसा ही हो रहा है। अब आदिवासी समुदाय यह अपेक्षा करेगा कि इन कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाए। ऐसा कानून को पूर्णत: लागू करने की भी बात उठेगी। संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची को कड़ाई से लागू करवाने की भी मांग वनवासी संगठन-समुदाय करेगा। इसकी अभी तक अवहेलना होती रही है।

सच यह है कि वनाधिकार कानून तो बना है लेकिन पूर्णत: लागू नहीं हुआ है। वन और वन के उत्पादों पर वनवासियों के अधिकार को लेकर भी टकराहट होती रही है। वनवासियों की जमीन के नीचे अरबों-अरब के खनिज हैं। उनकी जमीन ली जाती हैं और वे अपनी उसी जमीन पर मजदूरी करते हैं, खनन कार्य करते हैं। मालिक नहीं बन पाते। ऐसे मामलों पर गंभीरता से संज्ञान लेने की अपेक्षा भी वनवासी समुदाय करेगा। कुछ साल पहले जब द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल थीं, तब जमीन संबंधी एक विधेयक लाया गया था। इस पर विवाद भी हुआ था। अंतत: द्रौपदी मुर्मू ने उस विधेयक को राज्य सरकार को वापस कर दिया था। इसकी काफी चर्चा हुई थी। उनका यह निर्णय यह बताने के लिए काफी है कि जमीन के मुद्दे की गंभीरता को वह बेहतर तरीके से समझती हैं।

द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से वनवासियों के अलावा महिलाओं के अंदर भी आत्मविश्वास बढ़ेगा। आधी आबादी के जो अधिकार हैं, उन्हें लागू करने में मदद मिलेगी। चुनौतियां रहेंगी ही, लेकिन पक्ष में यह बात है कि वर्तमान केंद्र सरकार की प्राथमिकता में वनवासी हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार में वनवासियों को सम्मान दिलाने का बड़ा प्रयास हुआ है। इनमें आजादी की लड़ाई में योगदान देनेवाले वनवासियों के सम्मान में देश के कई राज्यों में म्यूजियम बनाने का काम पूरा हो चुका है। भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन को देशभर में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का फैसला केंद्र सरकार कर चुकी है। इन निर्णयों से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में वनवासी समुदाय को आगे बढ़ाने, उन्हें सम्मान दिलाने की योजनाएं आती रहेंगी। द्रौपदी मुर्मू के शीर्ष पद पर रहने से इस तरह की समस्याएं सुलझाने में मदद जरूर मिलेगी।

 

 


डॉ.
प्रीती
(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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