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अंत्योदय की सूर्योदय हैं हमारी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

अंत्योदय की सूर्योदय हैं हमारी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

किसी ने कल्पना नही की थी कि भोलीभाली संथाल आदिवासी लडक़ी द्रौपदी टुडु के जीवन में ऐसा मोड़ आयेगा जब वह दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर विराजमान होगी। उड़ीसा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव में 20 जून 1958 को जन्मी द्रौपदी मुर्मू का नया पता है, राष्ट्रपति भवन, रायसीना हिल, नयी दिल्ली, भारत। मुर्मू खानदान में ब्याही द्रौपदी (टुडु) मुर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति हैं और पहली आदिवासी महिला हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च मुकाम पर पहुंच कर आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है। वह आजाद भारत में जन्म लेने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। द्रौपदी मुर्मू की इस उपलब्धि को पूरा देश एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रहा है और आजादी के 70 साल बाद अंत्योदय का सूर्योदय देखने को मिला है।

संथाल आदिवासी परिवार की द्रौपदी मुर्मू का मर्मस्पर्शी जीवन अनेक उतार चढ़ाव से भरा रहा है। उनके जीवन में एक दौर ऐसा भी आया जब अपने पति श्यामचरण मुर्मू और दो पुत्रों लक्ष्मण एवं सिपुन की मृत्यु ने उन्हें  अवसाद के गर्त में ढकेल दिया था और उनके नजदीकी मान बैठे थे कि अब वह त्रासदी से शायद ही उबर पायेंगी। लेकिन कहते हैं कि होनी को कोई टाल नही सकता और 2015 के आरंभ में द्रौपदी मुर्मू प्रजापिता ब्रहमकुमारी के संपर्क में आईं और राजयोग की शिक्षा-दीक्षा ने उनके जीवन में उम्मीद की नई किरण पैदा की तथा उसकी आभा निरंतर प्रकाशमान होती चली गई। अब यह किरण सूर्य की लालिमा की भांति दमक रही है और वह हर भारतवासी के लिये उम्मीद की किरण बन चुकी हैं। उनका जीवन सबके लिये, खासकर गरीबों को प्रेरणा का संदेश दे रहा है और जीने की राह दिखा रहा है।

द्रौपदी की आरंभिक शिक्षा उनके पैतृक गांव उपरबेड़ा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई। उनका पहला संथाली नाम पुती था लेकिन उनके शिक्षक ने बेहतरी के लिये नाम बदलकर द्रौपदी रख दिया था। वह अपनी कक्षा में होनहार छात्रा थीं और जब उन्होंने सातवीं की पढाई पूरी कर ली तो उनके लिये पढाई को जारी रखने का संकट पैदा हुआ। इस मामले में द्रौपदी भाग्याशाली थीं क्योंकि उनके पिता बिरांची टुडु गांव के प्रधान थे और वह उस जमाने में भी अपनी बेटी को पढ़ाना चाहते थे। जहां चाह वहां राह, की कहावत चरितार्थ हुई। बिरांची टुडु अपनी 12 साल की बिटिया को लेकर रायरंगपुर में उड़ीसा के शहरी विकास मंत्री कार्तिक चंद्र माझी की जनसभा में पहुंच गये। सौभाग्य से माझी भी उपरबेडा गांव के थे और दोनो एक दूसरे को जानते थे। जैसे ही बिरांची उनसे मिले तो द्रौपदी ने अपनी सातवीं कक्षा की अंक तालिका उनके हाथ में थमा दी। संवाद सरल और अवसर की उम्मीदों से भरा था और माझी ने द्रौपदी को शाबासी देने के साथ आगे की पढ़ाई भुवनेश्ववर में कराने की व्यवस्था  करा दी। द्रौपदी ने कुंतला कुमारी सबत होस्टल में रहकर अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और 1974 में रमादेवी महिला कॉलेज में दाखिला लेकर समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान में स्नातक की उपाधि हासिल की।

बिरांची की छोटी बहन सरस्वती के अनुसार उनके भाई द्रौपदी को हर महीने दस रूपये भेजते थे और उन्होंने कभी भी और पैसे की मांग नही की। बस उसी में गुजारा करके अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्हें 1979 में उड़ीसा सचिवालय में जूनियर असिस्टेंट की नौकरी मिली और उसी वर्ष श्यारम चरण मुर्मू से उनका विवाह हो गया। मुर्मू दम्पत्ति के चार बच्चे हुये और पारिवारिक जिम्मेदारी बढ़ जाने के कारण द्रौपदी को नौकरी छोडऩी पड़ी। दम्पत्ति को पहला बड़ा सदमा 1988 में लगा जब उनकी बड़ी बेटी का बीमारी के कारण निधन हो गया।

श्यामचरण मुर्मू का बैंक अधिकारी बनने के बाद 1993 में रायरंगपुर में उनके गांव पहाड़पुर से जुड़े ब्लॉक में तबादला हो गया। द्रौपदी भी वहीं पर श्री अरबिंद इंटीग्रल एजुकेशन स्कूल की मानद अध्याापिका बन गईं। समय के साथ द्रौपदी मुर्मू सामाजिक कार्यों में सक्रिय होती चली गईं और सौभाग्य से रायरंगपुर को आदिवासी पालिका क्षेत्र अधिसूचित कर दिया गया। द्रौपदी मुर्मू एक लोकप्रिय शिक्षक रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थीं और 1997 में स्थाानीय निकाय के चुनाव में एक सशक्त। उम्मीदवार के रूप में उभर कर सामने आईं। कांग्रेस और बीजू जनता दल ने उनसे संपर्क किया लेकिन उनका रूझान भारतीय जनता पार्टी के प्रति था। स्थानीय भाजपा नेता निगमानंद पटनायक द्रौपदी मुर्मू से संपर्क में थे, उनके आग्रह पर वह पार्षद का चुनाव लड़ीं और जीत गईं। जनता जर्नादन की सेवा उन्हें विरासत में मिली थी और ये संस्कार उनकी तरक्की का मार्ग प्रशस्त करते चले गये। फिर 2000 के विधानसभा चुनाव में वह रायरंगपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं और जीत गई। यही नहीं, नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजद-भाजपा गठबंधन सरकार में वह अगस्त 2002 में मंत्री बन गईं। वह 2005 में फिर विधायक निर्वाचित हुईं और 2007 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ  विधायक के नीलकंठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भाजपा ने उनकी बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिये 2009 में मयूरभंज से लोकसभा का टिकट दिया लेकिन वह कड़ी टक्कर देने के बाद हार गईं। राजनीतिक और पारिवारिक दृष्टि से यह साल उनके लिये बहुत ही दुखद रहा। उनके बड़े बेटे लक्ष्मण की अकस्मात मौत हो गई। पुलिस को संदेह है कि दोस्तों के साथ रात का खाना खाने के बाद जब वह अपने चाचा के घर लौट रहा था तो मोटरसाइकिल दुर्घटना में उसके सिर में चोटें आईं जिसके कारण उसकी मौत हुई। पारिवारिक त्रासदी जारी रही और 2013 में मुर्मू दम्पत्ति के छोटे बेटे सिपुन की कार दुर्घटना में मौत हो गई और फिर अगले वर्ष 2014 में द्रौपदी के पति श्यामचरण मुर्मू की दिल का दौरा पडऩे से मौत हो गई। द्रौपदी मुर्मू पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और वह बुरी तरह से टूट गईं, उनकी मन:स्थिति विचलित हो गई। फिर अपने शुभचितकों की सलाह पर प्रजापिता ब्रह्मकुमारी के संपर्क में आईं और राजयोग की दीक्षा लेकर अपने जीवन को पटरी पर ले आईं। उन्होंने अपने पति श्यामचरण और बच्चों लक्ष्मण एवं सिपुन की याद में पहाड़पुर गांव में आदिवासी बच्चों के लिये आवसीय हाई स्कूल खोला, जहां वह अक्सर जाती रहती है। द्रौपदी मुर्मू की छोटी बेटी इतिश्री भुवनेश्वर में एक बैंक अधिकारी हैं और दामाद गणेश चंद्र हेमब्रम रग्बी खिलाड़ी हैं।

द्रौपदी मुर्मू को 2015 में झारखंड का राज्य्पाल नियुक्त किया गया और वह फिर से जनसेवा में जुट गईं। मुख्यमंत्री रघुबर दास ने आदिवासी इलाकों के लिये छोटा नागपुर पट्टा कानून और संथाल परगना पट्टा कानून में संशोधन के विधेयकों को मंजूरी के लिये द्रौपदी मुर्मू को भेजा जिसमें आदिवासी भूमि के हस्तांतरण और विक्रय के प्रावधान थे। द्रौपदी मुर्मू को ये संशोधन विधेयक आदिवासी दलित और पिछड़े तबके के हित के खिलाफ लगे और उन्होंने आठ महीने तक अपने पास रोककर रखा और फिर बिना हस्ताक्षर किये लौटा दिया। भले ही भाजपा की राज्य सरकार को झटका लगा लेकिन पार्टी के एक वर्ग को उनका यह रूख पसंद आया जिसने उनकी लोकप्रियता बढ़ा दी। जुलाई 2021 में राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त  होने के बाद वह अपने गांव लौट आईं और जनता जनार्दन की सेवा में जुट गईं। लेकिन वक्त ने करवट ली और द्रौपदी मुर्मू को भाजपा ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और कांटे की टक्कर वाले इस चुनाव में उनकी उम्मीदवारी के सामने विपक्ष बिखर गया। वजह साफ थी देश को पहली बार एक आदिवासी राष्ट्रपति मिल रहा था और वह भी एक महिला थी जिसका सरोकार सदैव गरीब, दलित, पिछड़े और आदिवासी के उत्थान के प्रति समर्पित रहा।

अशोक उपाध्याय
(लेखक, पूर्व संपादक, यूनीवार्ता हैं)

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