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मुर्मू का चुनाव भारतीय लोकतंत्र का सुनहला अध्याय

मुर्मू का चुनाव भारतीय लोकतंत्र का सुनहला अध्याय

भारतीयों के संघर्ष और त्याग के बाद ब्रिटिश सत्ता हमें आजादी देने के लिए मजबूर तो हो गई, लेकिन उसे उम्मीद नहीं थी कि भारत अपनी आजादी के बरकरार रख पाएगा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल तो मानकर चल रहे थे कि कुछ ही वक्त बाद भारत बिखर जाएगा। लेकिन खुली हवा में सांस लेते भारत ने जो राह चुनी, उस लोकतंत्र पर आगे बढ़ते हुए उसने लंबी यात्रा पूरी की है। आज भारतीय लोकतंत्र की दुनियाभर में साख है। बीती 19 जुलाई को हुए राष्ट्रपति चुनाव ने इसे और चमकदार बना दिया है। भारतीय लोकतंत्र ने अपने सर्वोच्च पद पर ना सिर्फ एक महिला, बल्कि जनजातीय समुदाय की महिला को पहुंचाकर जैसे लोकतंत्र की जड़ों को और गहराई तक पहुंचा दिया है।

दुनिया में अभी महिलाओं को बराबरी का हक देने की बात की जा रही है। दुनिया में अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर धौंस जमाने वाले अमेरिका तक में अब तक कोई महिला सर्वोच्च पद पर नहीं पहुंच पाई है। लेकिन भारत में यह दूसरा मौका है, जब कोई महिला लोकतंत्र के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हुई है। द्रौपदी मुर्मू भारतीय इतिहास की दूसरी महिला हैं, जो सर्वोच्च पद पहुंची हैं। इसके पहले प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भारत की राष्ट्रपति रह चुकी हैं। भारतीय लोकतंत्र ने 1966 में ही इतिहास रच दिया था, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं। भारत में कुछ वर्ष पहले तक पांच-पांच राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी निभा रही थीं। द्रौपदी मुर्मू बाकियों से अलग हैं। सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाली वे पहली महिला तो हैं हीं, वे उस जनजातीय समुदाय से आती हैं,  जिन्हें वनवासी या मूलनिवासी कहा जाता है। प्रकृति से सीधा वास्ता रखने वाले इस समुदाय की किसी महिला का देश का पहला नागरिक बनना मामूली बात नहीं है। बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए गौरव का प्रतीक है।

यूं तो भारत में प्राचीन काल से लोकतंत्र रहा है। भारतीय राजतंत्र भी पश्चिमी राजतंत्र की तरह निरंकुश कम, लोकापेक्षी ज्यादा रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक सामान्य व्यक्ति के संशय के चलते मर्यादा पुरूषोत्तम राजा राम अपनी प्राणों से प्रिय पत्नी सीता का परित्याग करने से नहीं हिचके थे। बहरहाल जिस आधुनिक लोकतंत्र को यूरोप और अमेरिका गर्वोन्नत भाव से अभिव्यक्त करता रहा है, उसी यूरोप और अमेरिका में महिलाओं को अरसे तक वोटिंग का अधिकार तक नहीं मिला। जर्मनी में 12 नवंबर 1918 से महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। रूस में क्रांति के बाद 20 जुलाई 1917 को मतदान का अधिकार दिया गया, जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं। अमेरिका अपने लोकतंत्र को सबसे पुराना बताते नहीं थकता, लेकिन यहां पर 1920 में जा कर महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया गया। यूरोप के सर्वाधिक संभ्रांत होने का दावा करने वाले फ्रांस में 21 अप्रैल 1944 को महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। जिस संसदीय लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है, उसके जनक देश ब्रिटेन में 1918 में महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया गया। लेकिन भारत ने अपनी आजादी के साथ ही वयस्क और महिला-पुरूष दोनों को मतदान का अधिकार दिया। इसी अधिकार के दम पर भारतीय लोकतंत्र आगे बढ़ता रहा। पश्चिमी ताकतों की उम्मीदों के मुताबिक भारतीय लोकतांत्रिक ढांचा ढहा नहीं, उलटा लगातार मजबूत होता गया। द्रौपदी मुर्मू के निर्वाचन के साथ ही उसे नई ऊंचाई मिली है।

द्रौपदी मुर्मू ना सिर्फ पूरे देश की करीब आधी आबादी यानी समूचे महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, बल्कि वनवासी समुदाय का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके साथ ही वे दलितों, गरीबों और पिछड़े समुदाय का भी प्रतीक हैं। भारतीय जनता पार्टी ने द्रौपदी को राष्ट्रपति पद के लिए चुनकर और देश के सहयोग से सर्वोच्च पद पर पहुंचाकर एक तरह से ना सिर्फ इन तमाम समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है, बल्कि वह देश की ग्रामीण और अरण्य संस्कृति आधारित मानवीय समूहों को भी गर्व का पल भी मुहैया कराया है। इसके जरिए जहां भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है, वहीं देश की मूल प्राकृतिक साहचर्य वाली अरण्य संस्कृति को भी नई ताकत मिली है। द्रौपदी मुर्मू का देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना, पिछड़े और कमजोर वर्ग के व्यक्ति का तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर बनना दरअसल समाज में पीछे रह गए तमाम वर्गों की गहरी और ताकतवर अभिव्यक्ति है। द्रौपदी मुर्मू के चुने जाने से इन वर्गों को नई ताकत मिली है, गर्व के पल मिले और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्र के साथ और गहरे तक जुडऩे का जरिया मिला है। इन संदर्भों में द्रौपदी मुर्मू का चुना जाना सिर्फ देश ही नहीं, दुनिया को नया और मजबूत संदेश है। द्रौपदी मुर्मू के माध्यम से दुनिया भारतीय लोकतंत्र की ताकत को नए सिरे से ना सिर्फ देख रही है, बल्कि पहचानने की कोशिश कर रही है। द्रौपदी मुर्मू के जरिए भारतीय लोकतंत्र ने दुनिया के कथित पुराने और संभ्रांत लोकतंत्रों को संदेश दिया है कि कमजोर तबकों को अधिकार देने की सीख देने वालों देख लो कि हमारी मिट्टी में कमजोर और वंचित तबके को कितना और कैसा मान दिया जाता है।

चूंकि द्रौपदी मुर्मू को शिखर पहुंचाने का राजनीतिक जरिया भारतीय जनता पार्टी रही है, इसलिए इसका राजनीतिक फायदा वह क्यों न उठाना चाहेगी। भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरूष नरेंद्र मोदी ने द्रौपदी मुर्मू को देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचाने में भूमिका निभाकर एक तरह से देश के वनवासी वर्ग के दिलों में भारतीय जनता पार्टी की जगह और गहरी कर दी है। यह समुदाय अब भी बहुत सीधा और सरल स्वभाव वाला है। यह बात और है कि छल-कपट से दूर रहने वाला यह वर्ग अपने आनबान और शान के लिए जान लड़ा देने में पीछे नहीं रहता। प्रकृति के सान्निध्य में रहने वाला यह वर्ग प्रकृति का अपमान भी नहीं बर्दाश्त कर पाता। वह प्रकृति का पूजक है। राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में द्रौपदी मुर्मू ने इसका उल्लेख भी किया। तब उन्होंने कहा था कि प्रकृति उन्हें पालती है और प्रकृति को सहेजने में वे भी अपना सहयोग देते हैं।

बहरहाल भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक नजरिए से इस परिघटना के विश्लेषण से पहले कुछ आंकड़ों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में वनवासी समुदाय की संख्या दस करोड़ 42 लाख से कुछ ज्यादा है। इस हिसाब से तब भारत की जनसंख्या में जनजातीय समुदाय की हिस्सेदारी करीब 8.6 प्रतिशत रही। एक अनुमान के मुताबिक अब यह हिस्सेदारी करीब 8.9 प्रतिशत हो गई है। इस समुदाय को विधानसभाओं और लोकसभा में प्रतिनिधित्व देने के लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान है। इसके तहत लोकसभा की 543 सीटों में से 47 सीटें जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह पूरे देश के तमाम राज्यों की विधानसभाओं की संख्या 4120 है। जिसमें जनजातीय समुदाय के लिए 556 सीटें आरक्षित हैं। भारत में कुछ राज्यों में जनजातीय समुदाय की ताकत का अंदाजा वहां की विधानसभा की सीटों में मिले उनके आरक्षण से लगाया जा सकता है। अरूणाचल और नगालैंड की विधानसभा सीटों की संख्या 60-60 है, लेकिन दोनों जगह जनजातीय समुदाय के लिए 59-59 सीटें आरक्षित हैं। इसी तरह मेघालय विधानसभा की 60 सीटों में से 55 सीटें जनजातीय समुदाय के लिए रिजर्व हैं। इसके बाद नंबर आता है मिजोरम का, जहां की विधानसभा में 39 सीटें इस समुदाय के लिए रिजर्व है। इसके बाद मध्य प्रदेश का स्थान है, जहां 47 विधानसभा सीटें वनवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में 34, उड़ीसा में 33, झारखंड में 28, महाराष्ट्र 25, त्रिपुरा में 20 और पश्चिम बंगाल में 16 सीटें जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित हैं। जाहिर है कि द्रौपदी मुर्मू के जरिए भारतीय जनता पार्टी ने इस समुदाय का भरोसा हासिल करने की दिशा में बड़ा और गंभीर कदम उठाया है।

द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति चुने जाने के बाद देश के जनजातीय समुदाय में कैसी प्रतिक्रिया है, उसका अंदाजा 20 जुलाई को धनबाद में उमड़े वनवासी समुदाय के हुजूम और उसके उत्साह को देखकर लगाया जा सकता है। तब धनबाद मानो प्रकृति के बेटे-बेटियों के रंगों से सराबोर हो गया था। ढोल-मृदंग की थाप पर चारों तरफ आदिवासी नृत्य और गीत का मंजर बिखरा हुआ था। समूचा समुदाय जैसे उत्साह के तमाम रंगों में डूब गया था। जाहिर है कि इस समुदाय को भी पता है कि उसे क्या हासिल हुआ है। सिद्धू कानू, बिरसा मुंडा जैसे बलिदानियों की संतानें सडक़ों पर थीं, नाच-गा रही थीं। जाहिर है कि भारतीय जनता पार्टी इसी उत्साह के जरिए अपनी राजनीतिक पटकथा लिखने की कोशिश में हैं। अब तक के जो रंग हैं, वे कम से कम उसके लिए उत्साह जनक ही हैं।

द्रौपदी मुर्मू का चुना जाना भारतीय लोकतंत्र की ही गौरव गाथा का नया अध्याय नहीं है, बल्कि वह भारतीय वनवासी, वंचित, गरीब, प्रकृति पूजक समुदाय को नया मान मिलने की कहानी भी है। महिलाओं को लोकतांत्रिक समाज में नए सशक्तीकरण का प्रतीक भी है देश के सर्वोच्च शिखर पर द्रौपदी मुर्मू का पहुंचना। इसके नतीजे निश्चित रूप से सकारात्मक ही होंगे, भारत की अंतरराष्ट्रीय साख में नया सुनहला वरक तो वैसे ही जुड़ ही चुका है। आने वाले दिनों में भारतीय लोकतंत्र स्वाभिमानी संथाल समुदाय की बेटी द्रौपदी मुर्मू के जरिए नई गाथा रचेगा, जिसकी बुनियाद पर भारत कई कदम और आगे बढ़ जाएगा।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

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