ब्रेकिंग न्यूज़ 

नीतीश के पलटासन के बाद कैसी होगी भाजपा की भावी राजनीति

नीतीश के पलटासन के बाद कैसी होगी भाजपा की भावी राजनीति

2016 के गर्मियों की बात हैं। कोलकाता के एक कार्यकर्म में नाश्ते के बाद एक तत्कालीन बिहार सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री की मुलाकात हुई। उन दिनों भी राष्ट्रीय जनता दल के साथ नीतीश कुमार की सरकार चल रही थी। वरिष्ठ मंत्री जनता दल यू कोटे के थे। उनसे जब सरकार की अंदरूनी कहानियां पूछी गईं तो उनका दर्द छलक उठा था। उनका कहना था कि राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं से सहज संवाद करना जनता दल यू के नेताओं के लिए आसान नहीं रहता। उनका कहना था कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से वे लोग जितना सहज रह पाते हैं, वैसी स्थिति राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं के साथ नहीं है। इस मुलाकात के कुछ ही महीनों बाद नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल से अलग होकर अपनी राह चुन ली थी। भारतीय जनता पार्टी के साथ उनका यह साथ पांच साल तक चला। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके नेता और वे स्वयं तेजस्वी यादव के साथ सहज रह पाएंगे?

जनता दल यू और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बीच संवाद के लिए भले ही सहजता रही हो, लेकिन हाल के कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी के संगठन और मंत्रियों के साथ नीतीश कुमार का जैसे व्यवहार रहा है, उससे सबसे ज्यादा असहज भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता ही रहे हैं। उनकी कहीं सुनवाई तक नहीं होती है। नीतीश कुमार एक तरह से भारतीय जनता पार्टी पर दबाव बनाए रहते थे। बिहार भाजपा के नेताओं को यह भले ही नागवार गुजरता रहा हो, केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में उन्हें मन मसोसकर रह जाना पड़ता रहा है। शायद यही वजह है कि नीतीश के अलग होने के बाद भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता ही नहीं, हमदर्द भी बेहद खुश हैं। लोकतांत्रिक समाज में ऐसा शायद पहली बार हुआ है। भारतीय जनता पार्टी के एक कट्टर कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि वह और उसके जैसे लाखों लोग भाजपा को वोट देते रहे और भाजपा उनके वोट से हासिल ताकत को नीतीश कुमार के कदमों में रखती रही।

नीतीश कुमार के उभार में समाजवादी परिवार के दिग्गज देवीलाल खेमे का बड़ा हाथ रहा है। देवीलाल खेमे के मोहन प्रकाश ने युवा लोकदल का अध्यक्ष रहते उन्हें पहले बिहार युवा लोकदल का महासचिव और बाद में अध्यक्ष बनाया था। नीतीश कुमार को लेकर बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर की क्या सोच थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मोहन प्रकाश से करीब छह महीने तक उन्होंने बात नहीं की थी। नीतीश कुमार पहली बार 1989 में वीपी सिंह सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने। उन्हें यह पद दिलवाने में देवीलाल खेमे का ही हाथ था। वही देवीलाल एक बात कहते थे, लोकतंत्र लोकलाज से चलता है। कहना न होगा कि नीतीश कुमार ने अपने निर्माता नेता के इस कथन को पूरी तरह भूल गए हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर पहले लालू से वे अलग हुए, फिर भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाया और जब 2013 में भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया तो भाजपा से अलग होकर उन्होंने उस आरजेडी की गलबहियां डाल दी, जिसके भ्रष्टाचार और जंगलराज के विरोध में उन्होंने बिहार में भाजपा  के साथ नया इतिहास रचा। लेकिन यह गठबंधन भी सिर्फ तीन साल चल पाया और उन्होंने फिर से भाजपा का दामन थाम लिया। तब उन्होंने कहा था कि वे फिर कभी आरजेडी की ओर कदम नहीं बढ़ाएंगे।

इसके बाद नीतीश कुमार को केंचुल छोडऩे वाला, पलटू राम आदि-आदि के विशेषणों से लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने नवाजा। कुछ महीने पहले तो तेजस्वी के ऐसे ही किसी आरोप से चिढक़र उन्होंने विधानसभा में ना सिर्फ तेजस्वी, बल्कि लालू यादव तक को खरी-खोटी सुनाई थी। 2020 के विधानसभा चुनावों में तो लालू यादव के परिवारवाद और ज्यादा बच्चे पैदा करने तक पर उन्होंने टिप्पणी की। दोनों तरफ की स्तरहीन बयानबाजियों के बावजूद अब दोनों एक हैं। इन उदाहरणों से साफ है कि राजनीति की खाल बेहद मोटी होती है। सत्ता के चुंबक से वह अतीत के असभ्य गालीगलौज तक को भूल कर खिंची चली आती है। क्या सामान्य व्यक्ति के जीवन में ऐसा संभव हो सकता है? नीतीश के पेट में दांत है, लालू यादव कहते रहे हैं। लालू यादव ने तो उन्हें सांप तक कह दिया था। तब लालू ने कहा था कि वह हर दो साल में केंचुल बदलते हैं। इतनी कड़वी बयानबाजी के बावजूद अगर वे फिर से एक बार आरजेडी के साथ हैं तो उनके जिगर की दाद देनी पड़ेगी।

नीतीश बेशक आरजेडी के साथ चले गए हैं, लेकिन इस बार वे पहले की तुलना में और कमजोर साबित हुए हैं। तेजस्वी उनके पास समर्थन का पत्र लेकर नहीं गए, बल्कि अपने घर बुलाया और अपनी मां के हाथों समर्थन पत्र दिलवाया। एक तरह से उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है। नई संगत में नीतीश की चुनौती पिछली सरकार की तुलना में ज्यादा रहेगी। भाजपा अपने स्पीकर का अपमान तो पचा सकती है, अपने कार्यकर्ताओं तक को दबा कर रख सकती है। लेकिन आरजेडी के साथ ऐसा नहीं होगा। शुरूआती कुछ महीनों तक खुरपेच भले ही ना हो, लेकिन बाद में खींचतान सामने आएगी। आरजेडी चुप नहीं बैठेगी। तेजस्वी भले ही कह रहे हों कि समाजवादियों के पूर्वज एक रहे, लेकिन वे पुरानी बातें भूल नहीं पाए हैं। उनकी कोशिश यही होगी कि नीतीश को कमजोर किया जाए। वैसे नीतीश भी ऐसी कोशिश करेंगे। क्योंकि अब तक का उनका राजनीतिक इतिहास बताता है कि वे राजनीतिक रूप से शायद ही किसी के सगे हैं। वे अपने सामने किसी को उभरने नहीं देना चाहेंगे। उभरने और न उभरने देने के बीच ही उनके और तेजस्वी के बीच खींचतान शुरू होगी। इसके बाद की राजनीति देखने लायक होगी।

नीतीश कुमार ने आरोप लगाया है कि पहले चिराग पासवान के विधानसभा चुनावों में जनता दल यू को नुकसान पहुंचाया गया। फिर आरसीपी सिंह के जरिए उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश हो रही थी। इसीलिए उन्हें अपनी अलग राह चुननी पड़ी। लेकिन यह भी सच है कि अपने सजातीय आरसीपी को पहले नीतीश कुमार ने ही अपना निजी अधिकारी बनाया, फिर राजनीति में लेकर आए। उन पर नीतीश कितना भरोसा करते थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने प्रतिबद्ध और पुराने समाजवादी नेताओं को परे रखते हुए उन्होंने आरसीपी को जनता दल यू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। अध्यक्ष बनने के बाद आरसीपी जड़ जमाने लगे तो नीतीश कुमार ने उनकी जड़ ही हिला डाली और जनता दल यू से निकाल बाहर किया। वैसे नीतीश कुमार कलाबाज नेता हैं। उन्होंने इसी तरह महादलित समुदाय से आने वाले जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया और जब मांझी ने अपनी राह बनानी शुरू की तो उनका महादलितवाद का भूत उतर गया और मांझी को सबक सिखाने की गरज से अलग कर दिया।

हैरत की बात यह है कि बार-बार कलाबाजियों और छोटा दल होने के बावजूद वे सत्ता पर बतौर मुख्यमंत्री काबिज होते रहे। एक और बड़ी बात यह रही कि 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों को छोड़ दिया जाए तो जनता दल यू हमेशा सहयोगी दलों से छोटा दल ही रहा। लेकिन मुख्यमंत्री की कमांडिंग सीट पर वे ही काबिज होते रहे। चाहे भाजपा हो या आरजेडी, नीतीश को ही अगुआ बनाती रहीं। फिलहाल भाजपा विरोध और सत्ता के शहद के लालच में कार्यकर्ताओं को बांधे रखने के लिए तेजस्वी ने एक बार फिर उन्हें नेता भले ही मान लिया हो, लेकिन अब वे परिपक्व होने की तरफ बढ़ चुके हैं। कुछ ही दिनों बाद बिहार को नेतृत्व देने की उनकी दबी इच्छा बाहर चली आए तो हैरत नहीं होनी चाहिए। वैसे आरजेडी शराबबंदी के खिलाफ रही है। लेकिन अब देखना दिलचस्प होगा कि आरजेडी का शराबबंदी को लेकर क्या रूख रहता है और अगर तेजस्वी शराबबंदी के अपने विचार कायम रहे तो नीतीश का क्या रूख रहेगा? वैसे जिस तरह वे पलटते रहे हैं, तो हो सकता है कि शराबबंदी के मसले पर भी पलट सकते हैं।

बेशक अब तक नीतीश कलाबाजी के चलते बिहार की राजनीति में नंबर वन राजनेता बने रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि 2015 के बाद से उनका करिश्मा कमजोर हो रहा है। कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठते रहे हैं। बिहार देश का अकेला राज्य है, जहां के विश्वविद्यालयों में सत्र दो साल की देरी से चल रहा है। राज्य की प्राथमिक से लेकर माध्यमिक शिक्षा भी बदहाल हो चुकी है। बिहार अब भी श्रमिक उत्पादन का ही केंद्र  बना हुआ है। बिहार से ये श्रमिक अब भी बिहार से बाहर खराब जीवन स्तर के साथ जिंदगी बिताने और छोटी मजदूरी करने को मजबूर हैं। नीतीश के सहयोगियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी खूब लगे हैं। शराब निषेध की नीति के बाद बिहार की पिछड़ी दबंग जाति के लोगों ने शराब के अवैध कारोबार पर कब्जा कर लिया है। सत्ता बदलने के बाद उनका उत्साह बढ़ेगा और अतीत की तरह वे अगल बेलगाम होते नजर आएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बिहार से बाहर गए लोग अब बदलती दुनिया को देख रहे हैं। उन्हें अब यह बात सालती है कि पिछले दो दशकों में देश के ही दूसरे हिस्से कितने बदल गए, लेकिन बिहार अब भी पिछड़ा क्यों हैं? जाहिर है कि इन प्रवासियों के जरिए बिहार में भी एक वर्ग इन दिनों विकसित हुआ है, जिसे बिहार की बदहाली सालती है। 2013 से बिहार में राजनीतिक अस्थिरता रहना, सरकारों का बदलते रहना और इसके बावजूद नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बने रहना, इसके बावजूद बिहार का पिछड़ा बने रहना अब बिहार के युवाओं को साल रहा है। निश्चित तौर पर अब नीतीश कुमार से सवाल पूछे जाएंगे। जिस तरह से इस बार नीतीश की सरकार को लेकर उत्साह का भाव नहीं दिख रहा है, उससे साफ है कि अब नीतीश को बिहार के लोगों ने काठ की हांडी मानना शुरू कर दिया है। लगातार विचारधाराएं और राजनीतिक बैसाखियां बदलते रहना, इसके बावजूद लोगों की स्थिति में गुणवत्तायुक्त बदलाव ना आना लोगों को खल रहा है। जिसका जवाब अगले चुनावों में नीतीश के लिए देना मुश्किल होगा।

बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने एक गड़बड़ी की। नीतीश के साथ के चलते उसने बिहार के स्तर पर नेतृत्व उभरने नहीं दिया। बिहार भाजपा की कमी है कि उसके पास कार्यकर्ता हैं, संगठन भी है , लेकिन नेता नहीं है। माना जा सकता है कि अब भारतीय जनता पार्टी अपने लिए नेतृत्व उभारने की कोशिश करेगी। भारतीय जनता पार्टी अब तक नीतीश की गोद में बैठी दिखती रही है, अब उसे इस छवि से बाहर निकलना होगा। बीजेपी को नीतीश के इस कदम की आशंका थी, लेकिन पार्टी आलाकमान ने इस बार उन्हें मनाने की कोशिश नहीं की। पार्टी ने महाराष्ट्र की तरह मान लिया है कि बिहार में खुद के दम पर उभारने के लिए कभी न कभी कुरबानी देनी ही होगी तो यह कुरबानी इस बार ही सही। अगर बीजेपी ने अपना नेतृत्व उभारा तो तय है कि आने वाले दिनों में भाजपा से सहजता महसूस करने वाले जनता दल यू के नेता भाजपा का दामन थामने में देर नहीं लगाएंगे। नीतीश कुमार बेशक राष्ट्रीय राजनीति में उभरने की मंशा जाहिर कर दिए हों, लेकिन यह तय है कि मगध के मैदान में अगला युद्ध भाजपा बनाम आरजेडी ही होगा।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

Leave a Reply

Your email address will not be published.