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एकीकृत कश्मीर : अक्षुण्ण भारत

एकीकृत कश्मीर : अक्षुण्ण भारत

‘गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त, हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त’ धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को 75 साल बाद भी अपने दोबारा अखंड होने का इंतजार है। देश आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने पर अमृत महोत्सव मना रहा है लेकिन देश के मस्तक जम्मू-कश्मीर को 1947 से अब तक गैर कानूनी रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के इलाकों गिलगिट और बाल्टिस्तान और 1963 में पाकिस्तान से चीन ने हथाये अक्साई चीन इलाके की वापसी का इंतजार है। पीओके की जमीन को भारत के जम्मू-कश्मीर, पंजाब आदि सीमावर्ती इलाकों में आतंकवाद फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वहीं दूसरी और चीन विवादित सीमा रेखा का फायदा उठाते हुए लद्दाख और उत्तर पूर्व के इलाकों में घुसपैठ करता है।

भारत की गौरवशाली एवं वैभवशाली ऐतिहासिक ज्ञानपंरपरा में मान्यता है कि कश्मीर का नाम कश्यप ऋषि के नाम पर रखा गया। जिसे कालांतर में सम्राट अशोक ने 250 ई.पू. में बसाया। यह संपूर्ण क्षेत्र भारत को सामरिक, कूटनीतिक, राजनीतिक एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रभावी तरीके से स्थापित करता है, जो पुरातन में भारतीय गणराज्य की सीमाओं को उत्तर में चीन और पश्चिम में अफगानिस्तान से जोड़ता था।

लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने प्रशासनिक कौशल, दृढ़ संकल्प और कूटनीतिक समझ-बूझ से देश की 566 रियासतों का भारत गणराज्य में विलय कराया। वहीं तत्कालीन राजनीतिक परिस्थियों के चलते जम्मू-कश्मीर विलय से उनकी दूरियों ने भविष्य के लिए संकट के द्वार खोल दिये। 1947 से 2022 तक इन 75 सालों में हमने अपने संकल्प जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है को हमेशा दोहराया है। 15 अगस्त, 1947 से 2022 तक की 75 वर्षों की यात्रा में भारत ने जो खोया उसे दोबारा हासिल करने के समर्पित प्रयास पिछले कुछ वर्षों में हुए है। देश को उम्मीद जगी है कि अक्टूबर 1947 और 1963 में छल, बल और विश्वासघात से जो भारत की जमीन अनाधिकृत रूप से कब्जा की गई है वो वापस आएगी और तभी सही मायनों में हम अखंड भारत के सपने को साकार करते हुए तिरंगे को संपूर्ण भारत में लहरा पायेंगे।

आजादी के 72 साल बाद 05 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर को एक देश, एक विधान और एक निशान के सपने को साकार किया। अनुच्छेद 370 और 35 ए के प्रावधानों के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में देश के अन्य राज्यों की तरह विकास की नई इबारत लिखने की अवसर मिला। अब जम्मू-कश्मीर देश के बाकी राज्यों के तरह समान अवसर और समान आधार के साथ विकास की दौड़ में शामिल हो गया है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में इसे ऐतिहासिक भूल को ठीक करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया था।

कूटनीतिक एवं सामरिक दृष्टिकोण से अहम

जम्मू-कश्मीर मुख्यत: पांच भागों में विभाजित है- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगिट और बाल्टिस्तान। मौजूदा स्थिति में भारत के अभिन्न अंग कश्मीर के कुछ हिस्सों पर पाकिस्तान और चीन अपना दावा पेश करते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत के पास जम्मू, कश्मीर वैली, लद्दाख और सियाचीन गलेशियर है जबकि पाकिस्तान ने गिलगिट-बाल्टिस्तान पर अनाधिकृत नियंत्रण जमा रखा है वहीं  चीन ने भी कुछ हिस्सों पर जबरन कब्जा कर रखा है। जिसमें शाक्सगम वैली और अक्साई चीन क्षेत्र शामिल है जो मूल रूप से पीओके का हिस्सा है।

पीओके के मुद्दे के सुलझने से देश के उत्तर की सीमा की सुरक्षा में होने वाले व्यय में कमी आएगी साथ ही इस पैसे को क्षेत्र के विकास में खर्च किया जाएगा ताकि स्थानीय लोगों के जीवन में प्रगति हो सके।

आतंकवाद और तनाव से मुक्ति

भारत पिछले कई दशकों से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से झूझ रहा है। ऐसे में आतंरिक सुरक्षा के लिए कश्मीर बहुत अहम है। चूंकि जिस हिस्से में पाक का कब्जा है उसमें आतंकवादियों का ठिकाना है जो भारत को अस्थिर करने और विकास की गति को प्रभावित करने के लिए काम करता रहता है। इससे निपटने के लिए जरूरी है कि पूरे कश्मीर पर भारत का नियंत्रण हो।

दक्षिण एशियाई देशों से संपर्क

भारत के विकास के लिए जरूरी है कि दक्षिण एशियाई देशों के साथ जमीनी संपर्क बना रहे। मौजूदा परिस्थिति में ऐसा नहीं है। दरअसल, अफगानिस्तान के रास्ते भारत बाकी दक्षिण एशियाई राष्ट्रों से सीधे जुड़ सकता है, लेकिन अभी के हालात के मुताबिक ऐसा संभव नहीं है। चूंकि कश्मीर के जिस हिस्से से अफगानिस्तान की सीमा सटती है वह पीओके में पड़ती है। इसलिए भारत वह दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के बीच अभी हवाई संपर्क है, जमीनी संपर्क नहीं। हालांकि भारत ने जमीनी रास्ते से संपर्क बनाने के लिए कुछ कदम आगे बढ़ाए हैं।

पलायन रुकेगा, विकास होगा

आतंकवाद और दहशतगर्दी की घटनाओं ने कश्मीर पंडितों को पलायन पर मजबूर कर दिया। कश्मीर के स्थानीय निवासी होने के बावजूद उन्होंने अपने घरों को छोडक़र शरणार्थियों की तरह जिंदगी बसर करनी पड़ी है। इन इलाकों की वापसी से देश के नागरिकों को वापस अपने घरों में लौटने का मौका मिलेगा। वर्तमान सरकार के धारा 370 और 35 ए के हटने के फैसले के बाद क्षेत्र में विकास की नई इबारत लिखी जानी शुरू हो गई है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कई विकास परियोजनाओं के साथ लोगों को केन्द्रीय योजनाओं का लाभ मिलना भी शुरू हो गया है।

जल, जंगल और पहाड़

हिमालय की तराई वाला यह पूरा क्षेत्र प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा से लबरेज है। भारतीय पुरातन चिकित्सा और आर्युर्वेद में काम आने वाली दुर्लभ प्रकार की जड़ी-बूटियों एवं अन्य औषधीय पौधों की यहां बहुतायात है। पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे वाले हिस्से में भी इन औषधीय पौधे हैं जिनका संरक्षण संपूर्ण मानव जाति के लिए श्रेयस्कर होगा। व्यापारिक उद्देश्यों की अंधी दौड़ में जंगलों और पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई ने इस क्षेत्र की जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा असर डाला है। इसे सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए कदम उठाने आवश्यक हो गये हैं।

व्यापार को बढ़ावा

भारत को पाकिस्तान और चीन के कब्जे वाले इलाकों की वापसी से क्षेत्रीय समानता स्थापित होगी। वर्तमान केन्द्र सरकार क्षेत्र में समावेशी विकास के लिए विभिन्न प्रयास कर रही है लेकिन इसे संपूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका है। क्षेत्रीय समानता से त्रिपक्षीय (भारत-पाकिस्तान और चीन) अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा भी मजबूती के साथ कर पाएंगे। कश्मीर के सेब दुनिया में प्रसिद्ध हैं साथ ही सेब यहां के खानपान का अहम हिस्सा है। ऐसे में सेब के साथ अन्य सामग्री को विश्व बाजार में पहुंचने में सुविधा होगी।

सांस्कृतिक संपदा और पर्यटन में वृद्धि

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो अखंड जम्मू-कश्मीर को मंदिरों के परिक्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन कालांतर में अनाधिकृत कब्जे ने इस धरोहर को छिनबिन कर दिया। पीओके की वापसी से कश्मीर को एक मुक्कमल स्वरूप मिलेगा बल्कि उसकी सांस्कृतिक विरासत में वृद्धि होगी। इसके अतिरिक्त धार्मिक यात्राओं के दौरान की जाने वाली सुरक्षा की व्यवस्था में कमी आएगी जिससे श्रद्धालु ज्यादा सुविधा एवं सुलभता के साथ आराध्य से दर्शन कर सकेंगे।

तकरीबन 75 साल पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने हमले की रात कहा था कि ‘मैं सोने जा रहा हूं, कल सुबह अगर तुम्हें श्रीनगर में भारतीय सैनिक विमानों की आवाज सुनाई न दे, तो मुझे नींद में ही गोली मार देना।’ हरी सिंह जी के विश्वास को कायम रखते हुए अगले दिन भारतीय शूरवीरों ने पाकिस्तान समर्थित कबीलाई सेना को खदेड़ दिया। इतिहास की गलतियों के परिणामस्वरूप आज भले ही कश्मीर हमारे सामने अखंड स्वरूप में न हो लेकिन केन्द्र की निर्णायक सरकार ने पीओके और चीन के कब्जे वाले इलाकों को मुक्त कराने के लिए सकारात्मक प्रयास शुरू कर दिये हैं। अंत्योदय के मूलमंत्र और सबका साथ, सबका विकास व सबका विश्वास की भावना के प्रति समर्पित केन्द्रम सरकार ने दशकों तक उपेक्षित जम्मू- कश्मीर में विकास को नई रफ्तार दी है।

धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं की अपनी विख्यात प्राचीन  खूबसूरती और खानपान की विशिष्ट एवं समृद्ध संस्कृति के लिए पहचाना जाने वाले कश्मीर आने वाले भविष्य में दोबारा वही गौरव हासिल करेगा।

 

 

 

आलोक चक्रवाल
(लेखक उप-कुलपति, गुरू घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ हैं)

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