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नेबरहुड फर्स्ट जरूरी या मजबूरी

नेबरहुड फर्स्ट जरूरी या मजबूरी

पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता, श्रीलंका में अभूतपूर्व आर्थिक संकट, मालदीव में जारी भारत-विरोधी अभियान, अफगानिस्तान में कठमुल्ला तालिबान और इन देशों के साथ-साथ नेपाल में भी चीन का बढ़ता दखल—भारत के पड़ोस में लगातार कुछ-न-कुछ चल ही रहा है जिससे नई दिल्ली की सिर दर्दी बढ़ गयी है और उसके सामने नई कूटनीतिक चुनौतियां उत्पन्न कर दी है जब की देश रूस-यूक्रेन युद्ध से उपजे हालातों से पहले से ही एक बड़ी समस्या में फंसा हुआ है। पड़ोसी देशों के हालात इसलिए भी चिंता बढ़ा रहे हैं क्योंकि श्रीलंका से शरणार्थियों के आने की आशंका है, वहीं इस द्वीप राष्ट्र में भारत समर्थित महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर अमल में देरी हो सकती है, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद बढऩे के आसार हैं, और यही नहीं चीन इनमें से कुछ देशों में भारत विरोधी भावनाओं को हवा देने में जुटा है।

पड़ोस में उभरता संकट इस समय भारतीय ‘विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती’ बन गया है। इसलिए जब पूरी दुनिया ही रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर परेशान है, भारत का पूरा ध्यान अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति पर केंद्रित है।

रक्षा विशेषज्ञों मानें तो मोदी सरकार इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि उसे संकट की इस स्थिति में सतर्क रुख अपनाते हुए ही मदद का हाथ बढ़ाना है, और वह ‘आतंरिक मामलों में दखल के आरोप लगने’ से बचने के लिए ‘किसी अन्य भूमिका’ की कोई योजना नहीं बना रही है, जैसा पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल की तरफ से अक्सर आरोप लगाया जाता रहा।

पड़ोसी देशों के साथ संबंध भारत की विदेश नीति का केन्द्रीय तत्व रहा है। यह देश मानता रहा है कि शांतिपूर्ण परिवेश से हमें विकास के अनिवार्य कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलेगी। यह भी स्पष्ट है कि एक स्थिर एवं समृद्ध दक्षिण एशिया से भारत की समृद्धि में भी योगदान मिलेगा। यह देश विविध क्षेत्रों में अंतर-संपर्क व्यवस्था को बढ़ावा देने और विश्वास बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध है। इनमें व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना और भारत की त्वरित आर्थिक प्रगति के आधार पर सभी पड़ोसी देशों के लिए जीत की स्थिति सुनिश्चित करना शामिल है। सामान्य संदर्भ में भारत अपने पड़ोसी देशों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करता है। फ्रौस्ट ने कहा था कि ‘अच्छी दूरी अच्छे पड़ोसी बनाते हैं।’ यह बात कुछ हद तक सही है परंतु आज हम इस बात को जानते हैं कि अच्छे पड़ोसियों के संबंध स्थापित करने के लिए लोगों से लोगों के बीच संपर्कों तथा व्यापार और राजनैतिक समझ की जरूरत होती है। भारत की खास जिम्मेदारी बनती है क्योंकि हम सभी पड़ोसी देश हैं। लेकिन यह पडोसी देश अब खस्ताहाल होते जा रहे हैं। श्रीलंका में अभूतपूर्व आर्थिक संकट ने ना सिर्फ वहां की सत्ता बदली बल्कि भारत के लिए भी खतरा उत्पन्न कर दिया है। श्रीलंका जैसा आर्थिक संकट भारत के अन्य पड़ोसी देशों में भी दस्तक दे रहा है, जिससे कभी भी वहां राजनीतिक अस्थिरता जन्म ले सकती है।

आर्थिक स्तर पर दिवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान में तो यह स्थिति आ पहुंची कि सैन्य प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को अमेरिका के उप विदेश मंत्री वेंडी शर्मन से मदद मांगनी पड़ी।  जनरल बाजवा ने वेंडी शर्मन से अपील करते हुए कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.5 बिलियन डॉलर बतौर कर्ज पाकिस्तान को जल्द से जल्द दिलाने में मदद करें। उन्होंने तर्क दिया है कि इस्लामाबाद का विदेशी मुद्रा भंडार रसातल की ओर है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाकिस्तान के कमजोर पड़ते रुपये से कर्ज की ब्याज अदायगी तक में दिक्कत आ रही है। जाहिर है जनरल बाजवा को अमेरिकी उप विदेश मंत्री से मदद की अपील उस वक्त करनी पड़ी है, जब पाकिस्तान के हुक्मरानों के इस संदर्भ में प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।  गहराते आर्थिक संकट के बीच सत्ता से हटाए गए भूतपूर्व वजीर-ए-आजम इमरान खान शाहबाज सरकार पर हमला बोल अमेरिका पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। जाहिर है ऐसे में इस्लामाबाद के पास अमेरिका से मदद मांगने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पाकिस्तान के हर सुख-दु:ख के साथी सदाबहार दोस्त चीन भी मदद के लिए आगे नहीं आ रहा है। आंकड़ों की भाषा में बात करें तो पाकिस्तान पर चढ़े विदेशी कर्ज में 25 फीसदी हिस्सेदारी सिर्फ चीन की है। एक लिहाज से देखें तो कर्ज के मकडज़ाल के जरिये बीजिग भारतीय उपमहाद्वीप में नई ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में उभर रहा है।

उधर ऐतिहासिक आर्थिक मंदी झेल रहे चीन के एक और दोस्त श्रीलंका की स्थिति हर गुजरते दिन के साथ बद् से बद्तर हो रही है।  विश्व बैंक ने और आर्थिक मदद से इंकार कर दिया है। नए आर्थिक पैकेज ने श्रीलंका के समक्ष मैक्रो-इकोनॉमिक पॉलिसी का फ्रेमवर्क तैयार कर उसे अमल में लाए जाने की शर्त रख दी है। विश्व बैंक ने अपने एक बयान में कहा है कि आर्थिक स्थिरता के लिए मैक्रो-इकोनॉमिक पॉलिसी का फ्रेमवर्क बेहद जरूरी है। इसके जरिये व्यापक ढांचागत सुधार लाए जा सकेंगे, जिससे आर्थिक स्थिरता के साथ उन कारणों के निदान में भी मदद मिलेगी, जिनकी वजह से श्रीलंका इस गति को प्राप्त हुआ है।  साथ ही फ्रेमवर्क की मदद से श्रीलंका आर्थिक संकट के इस दौर से भी उबर सकेगा।

पड़ोसियों में बांग्लादेश की स्थिति इतनी बुरी नहीं है, लेकिन गहराते आर्थिक तनाव के संकेत मिलने लगे हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि बांग्लादेश में अमेरिकी डॉलर के आधिकारिक एक्सजेंच रेट और ब्लैक मार्केट के रेट में 10 फीसदी का अंतर है। हालांकि लगभग रसातल में पहुंच चुकी पाकिस्तान और श्रीलंका मुद्रा की तुलना में बांग्लादेश की मुद्रा टका अमेरिकी डॉलर के सामने फिलहाल मजबूती से खड़ा है। इसके बावजूद खाद्यान्न और ईंधन की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए ढाका को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 4.5 बिलियन डॉलर का कर्ज लेना पड़ा है। अच्छी बात यह है कि शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता का कोई संकेत नहीं है। यह अलग बात है कि हाल के दिनों में बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरता बढ़ी है।

म्यांमार की भी यही स्थिति है पश्चिमी देशों के सैन्य जुंता पर लगातार थोपे जा रहे प्रतिबंधों के बाद आर्थिक संकट की तपिश झेल रहा है।  मालदीव भी विद्यमान महंगाई में कब तक अपने को बचाए रखेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। यद्यपि भारतीय रुपये और नेपाली रुपये का संस्थागत तंत्र काठमांडू के लिए स्थिति हाथ से बाहर नहीं जाने देगा।  इसकी एक वजह यह भी है कि नेपाल के राजनेताओं को समझ आ गया है कि आर्थिक मसलों पर विवेक से काम लेना जरूरी है, ना कि चीन के कर्ज के मकडज़ाल में लगातार फंसते जाना।

एन साथिया मूर्ति ओ आर एफ ऑनलाइन पर लिखते हैं ‘कोविड-19 के चलते लगे लॉकडाउन, महामारी से निपटने की कवायद और उससे जुड़े भारी-भरकम खर्चे- आर्थिक मोर्चे पर महसूस की जा रही तकलीफों के दो मुख्य कारक हैं। भारत भी समय-समय पर इन मुसीबतों से दो-चार हो रहा है। श्रीलंका के तजुर्बे से साफ है कि आंतरिक मोर्चे पर कई अहम कारकों को दशकों तक जड़ें जमाने और फलने-फूलने की छूट दे दी गई।

बाकी दुनिया की तरह ये तमाम देश भी 21वीं सदी में महामारी जैसे हालात के लिए तैयार नहीं थे। हालांकि 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी और 2015 में नेपाल में आए भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के वक्त भी इन देशों में किसी तरह की तैयारी नहीं थी। बहरहाल शहरी और ग्रामीण आबादी में सोशल मीडिया की समान रूप से घुसपैठ के चलते इन देशों की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का स्तर काफी तेजी से बढ़ता चला गया है। नतीजतन तीसरी दुनिया से ताल्लुक रखने वाले दक्षिण एशियाई देश कर्ज से संचालित भारी-भरकम ख़र्चों वाले रास्ते पर चलने लगे। रोजगार निर्माण के बगैर विकास की इस अधूरी यात्रा ने इन देशों के बुनियादी आर्थिक पैमानों को प्रभावित किया है। सबसे बड़ी बात ये है कि इस पूरी कवायद में कर्ज चुकाने की ताकत जुटाने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया….. जो हालात श्रीलंका में दिख रहे हैं वही भारत के ज़्यादातर पड़ोसी देशों में भी हकीकत बनकर सामने खड़े हैं। इनमें चीन से मिलने वाला अव्यावहारिक कर्ज भी शामिल है। यहां एक बात ऐसी है जो भारत को तो पता थी लेकिन इन छोटे-छोटे देशों ने कभी खुले तौर पर स्वीकार नहीं की। दरअसल, इन देशों के पास मध्यम और दीर्घकाल में अपने नागरिकों की कुशलता और अपनी अर्थव्यवस्थाओं की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक ‘आकार’ मौजूद नहीं थी। यहीं पर भारत के भौगोलिक आकार, आबादी और अर्थव्यवस्था की अहमियत सामने आती है।’

बहरहाल, भारत की कवायद इन देशों को आर्थिक मदद के फैसले के साथ ही ख़त्म नहीं होगी।  दरअसल, इनमें से हरेक देश के घरेलू सियासी समीकरण में भारत-विरोधी पटकथाओं के कारक शामिल हैं।  इन शिगूफों में मौजूदा कवायदों को आज या कल बेपटरी करने की क्षमता मौजूद है।

इसका साफ-साफ इशारा तो मालदीव में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की अगुवाई वाले विपक्षी खेमेबंदी के ‘इण्डिया आउट’ अभियान से मिल ही जाता है। श्रीलंका में गहराते  जबरदस्त आर्थिक संकट के बीच भी विपक्ष की अलग-अलग पार्टियों ने भारत की आर्थिक मदद से चल रही परियोजनाओं पर सवाल उठाने से परहेज नहीं ही किया है।  नेपाल और भूटान में भी हालात इससे अलग नहीं हैं। बांग्लादेश में भारत को मध्यम और दीर्घकाल के लिए योजना बनानी है। वहां प्रधानमंत्री शेख हसीना की दोस्ताना सरकार से आगे के कालखंड के लिए भारत को अभी अपनी योजना तैयार करनी है।

भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ अस्थिर आर्थिक रिश्तों को लेकर आगे नहीं बढ़ सकता। न ही वो अपने पड़ोसियों की दिक्कतों को अवास्तविक बताकर इन हकीकतों को झुठला सकता है। इसके पीछे हमेशा आर्थिक कारक ही नहीं होते।  घरेलू मोर्चे पर अनिश्चित राजनीतिक परिस्थितियों के चलते द्विपक्षीय आर्थिक रिश्तों का स्वभाव अस्थिर बना रहता है। आने वाले सालों और दशकों में पड़ोसी देशों के लिए उनकी सरजमीं पर या भारत के अंदर रकम मुहैया कराने, परियोजनाएं चलाने या नौकरियां उपलब्ध कराने की बजाए ये तमाम परेशानियां ना सिर्फ भारत की नेबरहुड फस्र्ट पॉलिसी के लिए चिंताओं का सबब बनी रहेंगी, बल्कि भारत की भी सामजिक और आर्थिक परिवेश पर खतरा मंडराता रहेगा। इसलिए दोनों के बीच संतुलन की आवश्यकता है।

 

नीलाभ कृष्ण

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