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राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति चुनाव : भाजपा ने साधे एक तीर से कई निशाने

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति चुनाव : भाजपा ने साधे एक तीर से कई निशाने

जिस तरह राष्ट्रपति के चुनाव में भाजपा ने एक दम से रामनाथ कोविन्द का नाम तय करके दलित कार्ड खेला था और सबको चौंका दिया था। उसी तरह इस बार भी पार्टी ने आखिरी समय पर द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी बना कर सबको चकित कर दिया, बड़ी सफाई और सीने से सटा कर कार्ड खेला। आदिवासी महिला का नाम आते ही विपक्ष चित्त हो गया। आदिवासियों और दलितों के वोटों पर ही निश्चिन्त होकर कांग्रेस ने पचास साल राज किया। आज भी कांग्रेस को आदिवासियों पर पूरा भरोसा है। उनका वोट अधिकांशत: कांग्रेस को मिलता रहता है। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा ने दलित चेहरा आगे करके दलितों के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियों को करारा झटका दिया था। मायावती जैसे नेता तक धराशायी हो गये। इस बार पिछली बार से भी ज्यादा सटीक तीर चला दिया। आदिवासी वोटों का प्रभाव तो लगभग पूरे देश में ही हैं। छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश, राजस्थान जहां विधानसभा के चुनाव आने वाले हैं, वहां पर कांग्रेस से भाजपा का सीधा मुकाबला है। हमेशा इन प्रदेशों में दोनों पार्टियों में कांटे की टक्कर होती रहती है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अभी कांग्रेस पार्टी की सरकार है। मध्य प्रदेश में भी पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ही बहुमत मिला था। बाद में  भाजपा ने अपनी सरकार बना ली। इन चुनावों को देखते हुये भाजपा ने आदिवासी राष्ट्रपति बना कर इन प्रदेशों में अपनी जीत सुनिश्चित कर ली।

इन प्रदेशों में आने वाले लोक सभा चुनाव के समय में भी कांग्रेस पार्टी से आदिवासियों के वोटों की दम पर ही टक्कर मिलने वाली थी। अब लोकसभा चुनाव में बंगाल, उड़ीसा, आसाम, नार्थ ईस्ट में भाजपा को भारी लाभ होगा। आदिवासी का राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर पहुंचना एक सपना था जो आजादी के मिलने के 75 साल बाद पूरा हुआ। आदिवासियों में खुशी छा गयी है और कई जगहों पर उन्होंने जश्न भी मनाये। पहली बात यह कि भाजपा ने आदिवासी प्रत्याशी बना कर राष्ट्रपति चुनाव में अपनी जीत पक्की की क्योंकि विपक्ष को डर लग रहा था कि आदिवासी महिला का खुला विरोध उन्हें सदा के लिये भारी पड़ सकता है। विपक्षी पार्टियों को लग रहा था, कहीं एैसा न हो कि द्रोपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बन जाने से उतना नुकसान नहीं होगा जितना उनके हारने से हो जायेगा क्योंकि मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से कोई सीधा नुकसान तो होता ही नहीं लेकिन मुर्मू के चुनाव हारने से आदिवासियों की नाराजगी विपक्ष को सदा के लिये झेलना पड़ सकती थी। बंगाल की मुख्यमंत्री तो इतना घबरा गयी कि यह कह बैठी थी कि उन्हें पहले पता होता तो वे अपनी ओर से कोई प्रत्याशी ही नहीं आगे बड़ाती और आदिवासी मुर्मू को ही समर्थन करती। ममता को भयभीत देख कर बाकी विपक्ष की सिट्टी-विट्टी गोल हो गयी। उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का समर्थन मिलने की शुरू से ही उम्मीद थी पर भाजपा ने जब उड़ीसा की आदिवासी को प्रत्याशी बनाया तो उन्होनें तुरन्त मुखर होकर समर्थन कर दिया। इस तरह भाजपा न केवल राष्ट्रपति चुनाव जीतने की राह आसान कर ली पर लोक सभा चुनाव में भी आदिवासी वोटों को पक्का करने का काम कर लिया। कांग्रेस के आदिवासी वोटों में सेंध लगा दी। ये बात कोई छोटी-मोटी बात नहीं है ये दाव खेल कर, भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 2019 की स्थिति को दोहरानें का काम कर लिया। देश के समूचे आदिवासी समाज में भाजपा के पक्ष में एक मजबूत सटीक संदेश चला गया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बंगाल आदि में भाजपा की राह कठिन होने का मुख्य कारण आदिवासी वोट ही रहा है। नरेन्द्र मोदी की दूर दृष्टि ने आदिवासी को राष्ट्रपति बना कर आने वाले चुनाव जीतने की राह आसान कर ली। भाजपा को बिना मांगे ही आदिवासियों का वोट मिल जायेगा। पूरे विश्व में भी एक संदेश गया जिससे भारत के लोकतंत्र की चर्चा हुयी, प्रशंसा हुयी है। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जीत आदिवासी वोटों में स्थायी स्थान बना कर विधानसभा चुनाव में जीत और 2024 में लोकसभा चुनावों में उनका समर्थन, साथ ही साथ देश विदेश में भारतीय लोकतंत्र का डंका बजाकर भाजपा ने एक तीर से कई शिकार कर लिये।

ऐसी ही सूझ-बूझ उपराष्ट्रपति के चुनाव में दिखाई है। जगदीप धनखड़ को प्रत्याशी बना कर भी एक तीर से कई निशाने साधे हैं। भाजपा प्रत्याशी का उपराष्ट्रपति चुनाव तो बहुमत के दम पर जीतना पक्का था। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कांग्रेस पार्टी की सोनिया गांधी को पछाड़ कर अपने आप को मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। सोनिया गांधी के नेशनल हेराल्ड मामले में भ्रष्टाचार के केस में फंसने से ममता को राह आसान दिखाई दे रही थी। वे बेलगाम होकर राज्यपाल तो क्या प्रधानमंत्री का निरादर कर रही थी। बंगाल में उनकी और राज्यपाल रहे जगदीप धनखड़ की आपसी झड़प बराबर होती रहती थी। ममता ने कई बार उनकी बेइज्जती की पर धनखड़ ने शालीनता के साथ सुलझाने का प्रयास किया। मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक खुले आम भाजपा सरकार के खिलाफ बोलने लगे थे। उन्होंने कई बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्र सरकार के विरूद्ध भी सार्वजनिक रूप से टिप्पणियां की। उनके बोल उन्हें पद से हटाने के लिये काफी थे। वास्तव में मलिक चाहते थे कि उन्हें सरकार राज्यपाल पद से हटा दें ताकि वे जाटों में ये बात फैला सकें। जम्मू -कश्मीर के राज्यपाल पद से हटा कर उन्हें मेघालय का राज्यपाल बना दिया इससे वे ना खुश थे। निकाले जाने पर वे जाट होने का लाभ लेना चाहते थे ताकि कह सके कि जाट होने के माने उन्हें निकाला गया और वे जाटों को इकट्ठा कर कृषि बिल आदि पर बराबर सरकार के खिलाफ अमना मुंह खोल रहे थे। धनखड़ भी किसान जाट के बेटे हैं इस तरह धनखड़ के उपराष्ट्रपति बनते ही उनका मुंह सिल गया।

कृषि बिल को लेकर जाटों में कुछ नाराजगी थी जिसे टिकैत ने हवा दी हालांकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जाट बाहुल्य क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति काफी संतोषजनक रही। पर जाटों में अच्छा प्रभाव रखने वाले जयंत चौधरी को रोकना आवश्यक था खासतौर पर जब वे समाजवादी पार्टी के गठबंधन के साथ थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के यादव और भाजपा के विरोधी मुस्लिम जाटों के साथ एक एैसा समीकरण होता जो लोकसभा के चुनाव में भाजपा को भारी पड़ता। जगदीप धनखड़ एक वरिष्ठ प्रसिद्ध अधिवक्ता और विद्वान व्यक्ति है। उनके उपराष्ट्रपति बनने से अब भाजपा का पलड़ा जाट बेल्ट में भारी हो गया। इसका लाभ राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिलने वाला है। धनखड़ राजस्थान से ही आते हैं फिर लोकसभा चुनाव और हरयाणा विधानसभा चुनाव में भी मिलेगा। राजस्थान और हरयाणा में भाजपा की कांग्रेस से कांटे की टक्कर थी। इस तरह उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा ने इन प्रदेशों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा, रालोद का गठबंधन कमजोर कर राजस्थान, हरयाणा में जाटों का मन जीत कर टिकैत और सतपाल मलिक का भोंपू बन्द कर दिया।

 

Deepak Kumar Rath

 

डॉ. विजय खैरा

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