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लालू की कठपुतली बने नीतीश

लालू की कठपुतली बने नीतीश

नीतीश कुमार का खुद की पार्टी जनता दल युनाईटड का, बिहार विधान सभा में अपना बहुमत नहीं है। अपराधिक छवि की पार्टी की वैसाखी लेकर मुख्यमंत्री बने हैं और उसके सहारे सपने देख रहे प्रधानमंत्री बनने के, जिसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के न सिर्फ आरोप लगे बल्कि अदालत से सजा पाकर जेल काट रहे हैं। सुशासन से अपने नाम को प्रचारित करने वाले नीतीश कुमार ने अदालत से सजा आफ्ता जेल काट रहे लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिल कर सरकार बनायी है। येे सरकार मात्र उनके समर्थन से नहीं, राजद के सरकार में सम्मिलित होकर बनी है। मंत्री परिषद में राजद के मंत्रियों की संख्या भी अधिक है। मंत्री परिषद में नीतीश बाबू की पार्टी जनता दल यू अल्पमत में हैं। नीतीश कुमार ने प्रमाणित कर दिया कि कुर्सी के लिये वे बिहार को बर्बाद कर सकते हैं। 45 विधायक की पार्टी का नेता 79 विधायकों की पार्टी के साथ सरकार बना रहा है और मंत्री परिषद में भी अल्पमत में हैं। जाहिर है कि नीतीश कुमार सौ प्रतिशत कठपुतली बनकर सरकार चला पायेंगे। बिहार सरकार अब भ्रष्टाचार में जेल काट रहे राजद के संस्थापक सर्वेसर्वा लालू यादव के इशारों पर चलेगी या ये कहें कि बिहार की सरकार अब जेल से चलेगी। लालू यादव राजनीति के मंजे खिलाड़ी है। भाजपा का साथ छोड़कर आये नीतीश से मुसलमान वोटों को खिसकाने के लिये राजद उन्हें प्रधानमंत्री तो क्या मुख्यमंत्री से भी निपटा देगी। नीतीश को हर कदम पर लालू से सलाह लेना पड़ेगी। कैविनेट में लालू के बेटे तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री के नाते पूरी सरकार पर नजर और पकड़ बनाये रखेंगे।

राजद को भाजपा के बाद किसी पार्टी से अगर खतरा है तो जनता दल यू से ही है क्योंकि कांग्रेस बिहार में भी मृतप्राय: ही है। इसलिये राजद सत्ता में रह कर अपने को मजबूत कर सबसे पहले नीतीश को ही निपटायेगी ताकि भाजपा के मुकाबले के लिये विकल्प के तौर पर खड़ी हो सके। राज्य में चल रही भ्रष्टाचार की जांचे और पुलिस पर दबाब बनाकर पुराना दबदबा कायम करने का प्रयास करेगी। नीतीश को प्रधानमंत्री का ख्वाब दिखा कर 2024 तक पूरे बिहार में फिर से यादव मुसलमान का समीकरण साध कर हाशिये में आयी नितिष की पार्टी का पूरा बैंड बजा देगी। बिहार में तारिक अनवर के अलावा और कोई कद्दावर नेता नहीं होने के कारण कांग्रेस दुवारा उठ नहीं पायेगी और कांग्रेस हाई कमान से तारिक को शायद ही फ्री हैण्ड काम करने को मिले। राजद अकेली एक पार्टी ही भाजपा के विकल्प के तौर पर दिखाई देगी जो शत प्रतिशत मुसलमानों के वोट पानें में सफ ल होते ही नीतीश को बाहर का रास्ता दिखा देगी। प्रधानमंत्री के लिये नीतीश को आगे करके उनके नेतृत्व में विपक्ष को एक कर लोकसभा चुनाव लड़ाने से भाजपा को फ ायदा ही फायदा है। एक तो विपक्षी पार्टी इक_े होकर भी चुनाव लड़ कर सत्ता में नहीं आ सकती।

कभी ऐसे समीकरण बने भी कि जैसे भाजपा से निकाले गये या हाशिये में डाले गये नेता इक_े होकर नरेन्द्र मोदी के विरोध में खड़े हो जाये और विपक्ष के साथ मिल कर लोकसभा का चुनाव लड़ें तो भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती देना आसान नहीं होगा। काल्पनिक तौर पर कहें तो एक स्थिति एैसी बन सकती है कि भाजपा के कद्दावर नेता नितिन गडकरी पार्टी से अलग हो जायें तभी भाजपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल होगा। ये एक तो संभव नहीं दिखता कि गडकरी कभी भाजपा छोड़ेगे। उनके साथ जो अप्रत्याशित हुआ है या उनके कद को यकायक कम किया गया उसका लाभ लेकर विपक्ष उन्हें प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बना कर 2024 के लोकसभा चुनाव लडऩे का प्रयास अवश्य करेगा। यदि गडकरी भाजपा के वी. पी. सिंह बनते हैं तो चुनाव बाद भाजपा की सरकार बने या गडकरी के नेतृत्व में विपक्ष की सरकार बने दोनो ही परिस्थितियों में  नीतीश कुमार  न घर के रहेंगे न घाट के। घर पर राजद ने अभी कब्जा शुरू किया है फिर छुड़ा ही लेगी। इस तरह नीतीश का बिहार तो छूटा ही। घाट पर तो प्रधानमंत्री का पद कभी मिलना नहीं। वैसे भी 45 विधायक हैं उनके पास और इनसे बड़े बड़े नेता शक्तिशाली अनुभवी बैठे हुये हैं।

शरद पवार के पास इनसे अधिक विधायक हैं और राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं। राहुल गांधी सबसे बड़ी पार्टी और सबसे अधिक सांसद वाली पार्टी कांग्रेस के कारण कभी भी अपना क्लेम नहीं छोडग़ें। ऊपर से नीतीश कुमार से चौगनी शक्तिशाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी प्रधानमंत्री की प्रबल दावेदार है। उनके पास 235 विधायक हैं 36 सांसद हैं नीतीश के पास 45 विधायक 10 सांसद है। ममता बनर्जी लगातार अपनी दम पर खुद की पार्टी के भारी बहुमत से सरकार बनाती है। नीतीश कुमार ने हमेशा वैशाखी और दूसरी पार्टी के सहारे से सरकार बनायी है और टुकड़ों टुकड़ों में मुख्यमंत्री बने हैं। ममता जबसे सरकार में आयी बराबर चुनाव जीत रही है।

नीतीश कुमार की राजनैतिक हैसियत ममता के मुकाबले काफी कम है। ममता ने राष्ट्रपति चुनाव में सारे विपक्ष को इक_ा किया पर नीतीश कुमार घर बैठे रहे। विपक्ष कभी सत्ता मे आता भी है तो उसमे नीतीश कुमार की हैसियत शायद एक मंत्री की ही बन पाये। नीतीश कुमार अभी से पछतानें लगे होंगे क्योकि सरकार बदलते ही बिहार में अपराध बडऩे लगे। दिन दहाड़े लूट और मारकाट, आतंकवाद, गुंडागर्दी शुरू हो गयी जिसे राजद के नेताओ का आशीर्वाद प्राप्त दिखाई दे रहा है। कुछ माह के बाद नीतीश कुमार केवल नाम के मुख्यमंत्री रह जायेंगे। सारी सरकार राजद चलाने लगेगी तब नीतीश बाबू सरकार में रह कर तड़पेंगे और सरकार से बाहर आकर सड़क पर हो जायेंगे। लालू यादव की लिमिटिड पार्टी ने प्रधानमंत्री का झूंठा सपना दिखा कर इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। एक उपाय अब भी सम्भावित है कि समय रहते नीतीश कुमार भाजपा से पुन: सम्बन्ध स्थापित करके गठजोड़ बना कर मध्यावति चुनाव करा दें तो शायद मुख्यमंत्री बने रह जायें।

 


डॉ. विजय खैरा

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