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एकता, एकजुटता एवं राष्ट्रबोध

एकता, एकजुटता एवं राष्ट्रबोध

बी  ते 15 अगस्त 2022 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से जिन ‘पंच प्रणÓ की बात की उनमें से एक प्रण ‘एकता और एकजुटताÓ है । उन्होंने आजादी के इस अमृत काल में ‘पंच प्रणÓ का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि अगले 25 वर्ष की भारत की अति महत्वपूर्ण विकास यात्रा में हमें अपने संकल्पों और सामथ्र्य को केंद्रित करते हुए आगे बढऩा है । ‘एकता और एकजुटताÓ पर बल देते हुए उन्होंने हमारी विविधता और विविध पंथ-परंपराओं को भारत का गौरव बताते हुए, ऊँच-नीच  तथा अपना-पराया का भेद मिटाते हुए, ‘श्रमेव जयतेÓ के भाव के साथ समाज में सब का सम्मान करते हुए, लैंगिक समानता स्थापित करते हुए, नारी के गौरव को प्रतिष्ठित करते हुए ‘इंडिया फस्र्टÓ यानि ‘राष्ट्र सर्वोपरिÓ की भावना को राष्ट्र की एकता और एकजुटता के लिए अनिवार्य बताया।

एकता और एकजुटता किसी भी समाज व राष्ट्र  की  प्रगति  का मूल आधार है । तमाम  विविधताओं  के  बावजूद  यह  एकता  का ही सूत्र है जिसने कई सहस्त्राब्दियों से भारत की महानता को अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित किया है । भारत की समृद्ध संस्कृति ने आदिकाल से पूरे विश्व को प्रभावित किया है । सहिष्णुता, आपसी सहयोग, सार्वभौमिक स्वीकृति, विभिन्न पंथ-परंपराओं, रीति-रिवाजों, पूजा पद्धतियों, लोक कलाओं तथा  खानपान पद्धति को अपनाने वाले जनमानस का सौहार्द एवं सामंजस्य पूर्ण सहअस्तित्व ही स्वस्थ भारत की पहचान है।

भारत ने सदा से पूरे विश्व को यह सन्देश दिया है कि भले ही हमारे परिवेश भिन्न-भिन्न हों, परन्तु  मूलत: हम सभी एक हैं । हमारे ग्रंथों, पुराणों में समग्र मानवता को एक माना गया है और हम ने विश्व के सभी प्राणियों के कल्याण की कामना की है – ‘

सर्वे भवन्तु सुखिन:।

सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।

मा कश्चित् दु:ख भाग्भवेत्॥

इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के एक अन्य मंत्र में भी मानव मात्र की समता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है – अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधु: सौभगाय । युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्नि: सुदिना मरुद्भ्य: ।। इसमें वर्णित मनुष्य मात्र में समानता, सहृदयता, एक मन, भ्रातृभाव, न कोई बड़ा न कोई छोटा और स्नेह का आदर्श सम्पूर्ण  मानव जाति के संदर्भ में प्रतिष्ठित हुआ है । यही भावना आगे चलकर उपनिषद और गीता में प्रमुख हुई है । परम एकत्व के आदर्श के अंतर्गत समस्त प्राणियों और वनस्पतियों तक के प्रति एक समान एकत्वभाव आदि काल  से हमारी संस्कृति का आधार रहा है। ऋग्वेद का यह श्लोक  ‘समानी व आकूति-समाना ह्रदयानि व। समानमस्तु वो मनो यथा व सुसहासति॥’,                                   दर्शाता है कि एक हमारा उद्देश्य हो, सुसंगत हमारी भावना हो,  एकत्रित हमारे विचार हों, जैसे सब कुछ इस विश्व में एकता पर ही निर्भर है। यही भारतीय संस्कृति का आधार है जो एकता और एकजुटता के मूल में है।

राष्ट्रीय एकता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार राष्ट्र के समस्त निवासी एक दूसरे के प्रति सद्भावना रखते हुए राष्ट्र की उन्नति हेतु परस्पर मिलकर कार्य करते हैं । अगर एकता के मूल अर्थ में जाएं तो स्पष्ट है कि परस्पर सद्भाव, प्रेम और दूसरों का आदर करना ही एकता के आवश्यक कारक हैं । एकता में लोग अपने स्वयं के व्यक्तिगत उद्देश्यों को भूलकर  बड़े लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में काम करते हैं। वैचारिक, सांस्कृतिक  आदि  तमाम  विभिन्नताओं  के  बावजूद  राष्ट्र  सर्वोपरि  की भावना के  साथ आगे बढ़ते हैं । हमारी विविधताओं  के बावजूद ‘अयं निज: परो वेति, गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु, वसुधैव कुटुम्बकम्Ó,  के भाव से ओतप्रोत हर भारतीय के लिए राष्ट्र सदा सर्वोपरि रहा है ।  हमारे लिए भारत केवल देश या राष्ट्र ही नहीं बल्कि ‘भारत मांÓ है। हमारे पूर्वजों ने, वीर योद्धाओं ने, बलिदानियों ने मातृत्व भाव से ओत-प्रोत रहकर ही  भारत-भूमि का सदैव पूजन एवं रक्षण किया है । ‘वंदे मातरमÓ  हमारे लिए मात्र दो शब्द नहीं हैं बल्कि यह मंत्र है जो भारत मां के हर सपूत में अपनी मातृभूमि के प्रति मर-मिटने की प्रेरणा देता है । जब भारत अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए आजादी की लड़ाई लड़ रहा था उस समय पवित्र  ‘वंदे मातरमÓ के मंत्र के द्वारा ही भारत माँ के बलिदानी सपूतों को देश के लिए सर्वोच्च त्याग करने और हंसते- हंसते फांसी के फंदों पर झूल जाने की प्रेरणा मिली । आज आवश्यकता है कि समाज के हर व्यक्ति में राष्ट्रीय चरित्र का भाव जागृत हो, हम राष्ट्रीयता के प्रति सजग हों, राष्ट्र की उपासना में हमारी प्रबल आस्था हो और राष्ट्रहित हमारे लिए सर्वोपरि हो । राष्ट्र के विकास के लिए  उत्सर्ग और समर्पण के साथ-साथ  हर व्यक्ति में राष्ट्रभक्ति की आतंरिक चेतना का भाव ही हमें उत्तर से दक्षिण और  पूरब से पश्चिम तक एकता के सूत्र में बांध सकता है ।

आपसी बंधुत्व, सामाजिक सद्भाव, हर व्यक्ति का सम्मान और सामाजिक समरसता के माध्यम से ही राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित की जा सकती है । स्वतंत्रता  प्राप्ति के समय जब पूरे भारत राष्ट्र के समक्ष एकता और अखंडता की चुनौती थी उस समय लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने सामथ्र्य और सूझबूझ से 562 रियासतों का एकीकरण करके ‘एक भारत श्रेष्ठ भारतÓ के महान स्वप्न को साकार किया । उनका मानना था कि ‘एकता के बिना जनशक्ति, शक्ति नहीं है ।’ वे सदैव भारतीय समाज की एकजुटता पर बल देते रहे । आज हमें अमृत काल में आगामी 25 वर्षों के भारत का भविष्य तय करने के लिए इसी एकता और एकजुटता को प्रगाढ़ बनाते हुए आगे बढऩे की आवश्यकता है ।

लैंगिक समानता की नींव पर ही राष्ट्र का सर्वांगीण एवं उत्तरोत्तर विकास संभव है । हमें हर क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण को गति देते हुए, लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करते हुए, भारतीय संस्कृति के अनुरूप नारी को पूजनीय एवं वंदनीय मानते हुए, समतामूलक समाज स्थापित करना होगा जो एकजुटता का मूल आधार बन सकेगा और राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभा सकेगा । ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:Ó- मनुस्मृति का यह श्लोक भारतीय संस्कृति में नारी की महत्ता को प्रतिपादित करता है। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। भारतीय लोकतंत्र में नारी की शक्ति, सम्मान, यश और गौरव को हमें राष्ट्र के विकास और गौरव से जोडऩा होगा । इसी प्रकार ‘श्रमेव जयतेÓ की भावना के अनुरुप हमें सामाजिक जीवन में श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए एक श्रमिक के प्रति ‘श्रमयोगीÓ का भाव लाना होगा, उसे संवेदना और गौरव के भाव के साथ देखना होगा क्योंकि आज के बदलते परिवेश में कौशल और उद्यमशीलता के बल पर राष्ट्र निर्माण में ‘श्रमयोगीÓ की अति महत्वपूर्ण भूमिका है ।

इस सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा घोषित ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020Ó समाज के हर वर्ग में, सुदूर क्षेत्रों में, शिक्षा की पहुंच बनाकर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर, समग्र रूप से विकसित, कौशलयुक्त एवं उद्यमी युवाओं के सृजन का मार्ग प्रशस्त करती है, जिनकी सोंच वैश्विक हो, लेकिन जड़ें भारतीयता में हो । भारत केन्द्रित यह शिक्षा नीति युवाओं में मातृभाषा और मातृभूमि के प्रति अटूट स्नेह का भाव जगाती  है । यह शिक्षा नीति समाज के हर युवा में एकजुटता के भाव को प्रबल करते हुए राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को प्रश्रय देती है।

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र तथा दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला वृहद राष्ट्र भारत विगत वर्षों में अपने नागरिकों की एकता, एकजुटता, परिश्रम, प्रभावी केंद्रीय नेतृत्व तथा सरकारी नीतियों के सही कार्यान्वयन के बल पर ही तेजी से आगे बढ़ रहा है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हो रहा है । साक्षरता के दर में निरंतर बढ़ोतरी, खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, अंतरिक्ष में मंगल यान और चंद्र यान का प्रक्षेपण, दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान की सफलता, रक्षा के क्षेत्र में अत्याधुनिक मिसाइल, आईटी के क्षेत्र में बढ़ता हुआ प्रभुत्व तथा निरंतर तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था, भारत को पूरे विश्व में अलग पहचान दिलाते हैं । सामाजिक, आर्थिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की रफ्तार को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है कि हम देश के आंतरिक मोर्चों पर एकजुटता दिखाते हुए राष्ट्रीय हित को सदा सर्वोपरि रखें ।

माननीय प्रधानमंत्री जी की विकास की अवधारणा ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयासÓ इसी समावेशी नीति को पुष्ट करती है कि हम एकता और एकजुटता  के बल पर अपनी विविधताओं  को अपनी शक्ति मानकर, आंतरिक भेदभाव को समाप्त कर, सबका सम्मान करते हुए विशेषकर श्रमिक एवं नारी सम्मान को प्रतिष्ठित करते हुए, राष्ट्र की प्रगति को अपना लक्ष्य मानकर एक समर्थ, सशक्त, आत्म निर्भर एवं विकसित भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं।

 


रमाशंकर दूबे

(लेखक कुलपति, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर, हैं।)

 

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