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गुजरात ने पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन और संरक्षण के लिए अपनाया : प्रकृति प्रेम

गुजरात ने पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन और संरक्षण के लिए अपनाया : प्रकृति प्रेम

हम सभी इस बात से अवगत हैं कि पर्यावरण में हर चीज के सुचारू संचालन के लिए एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र (श्वष्शह्य4ह्यह्लद्गद्व)की आवश्यकता होती है। यदि हम जैव विविधता में के साथ जानबूझकर या अनजाने में कोई छेडख़ानी करते हैं तो पारिस्थितिकी तंत्र में अंसुतलन पैदा होता है जिससे पूरे फूड चेन पर असर पड़ता है। पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन बनाए रखना कई कारणों से आवश्यक है। प्राकृतिक आपदा, किसी विशेष प्रजाति के अप्रत्याशित विलुप्त होने, पारिस्थितिकी तंत्र में नई प्रजातियों या मानव निर्मित आपदाओं से जन्मी कोई भी अप्रत्याशित गड़बड़ी पूरी व्यवस्था को हिला सकती है।

बढ़ते औद्योगिकीकरण के कारण दुनिया भर के पारिस्थितिकी तंत्र बर्बाद हो रहे हैं जिसका असर इंसानों पर भी हो रहा है। इसी वजह से तकनीकी विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बरकरार रखना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। इन दुष्प्रभावों की संवेदनशीलता को समझते हुए विभिन्न सरकारों ने अपनी-अपनी भूमि की जैव विविधता की रक्षा के लिए कई नीतियां तैयार की हैं। ऐसी ही एक अनुकरणीय नीति बनाकर गुजरात सरकार ने जैव विविधिता के संरक्षण में सफलता हासिल की है।गुजरात, भारत के उन राज्यों में शामिल है जो अपनी समृद्ध जैव विविधिता के कारण जाना जाता है। यहां पाई जाने वाली वनस्पतियां और जीवों की 7500 प्रजातियां इस बात का प्रमाण है। इन प्रजातियों में 2,550 एंजियोस्पर्म  (ड्डठ्ठद्दद्बशह्यश्चद्गह्म्द्वह्य)और 1366 वर्टिब्रेट (1द्गह्म्ह्लद्गड्ढह्म्ड्डह्लद्ग) प्रजातियां हैं। (जिनमें से 574 पक्षी प्रजातियां और बाकी स्तनधारी, सरीसृप, उभयचर और मछली अदि शामिल हैं)।

गुजरात में जैव विविधता वाले कई हॉटस्पॉट हैं जैसे कच्छ का छोटा रण, कच्छ का ग्रेटर रण, समुद्री राष्ट्रीय उद्यान, जामनगर, बर्दा अभयारण्य के आद्र्रभूमि और जंगल, पोरबंदर, वेलावदर के घास के मैदान, थोल झील और नालसरोवर, दक्षिण गुजरात में पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग आदि। ये इलाके कई प्रवासी पक्षियों, वनस्पतियों और जीवों की कई दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियों का निवास स्थान हैं। इस क्षेत्र की वनस्पति प्रकृति अद्वितीय है क्योंकि पशु-पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों ने शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों में स्वयं के संरक्षण के लिए कई अनुकूलन विकसित किए हैं।

गुजरात विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों से समृद्ध है जहां कई तरह के वन्यजीव पाए जाते हैं। इसीलिए गुजरात विपरीत वातावरण में पाए जाने वाली वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की विविधिता को बढ़ावा देकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायता कर सकता है। गुजरात में वन्यजीवों की ऐसी समृद्ध और विविध प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए 4 राष्ट्रीय उद्यान, 23 अभयारण्य और 1 संरक्षण रिजर्व स्थापित किए गए हैं। गुजरात में औद्योगीकरण के बावजूद, राज्य सरकार न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में, बल्कि आम जनता के बीच जागरूकता फैलाने में भी सफल रही है। गुजरात के राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य तमाम जीव-जंतुओं और पौधों की अनूठीप्रजातियों का घर हैं। यहां की समृद्ध प्राकृतिक संपदा प्रकृति प्रेमियों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है। गुजरात का सबसे अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है गिर का जंगल जो दुनिया में एशियाई शेरों की अंतिम जीवित आबादी का घर है।

विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों के अलावा गुजरात ने सन् 1971 में ईरान के रामसर शहर में हुए कन्वेंशन के अनुसार, खिजा दिया बर्ड सैंचुरी के संरक्षण के लिए भी सराहनीय काम किया है। खिजादिया जो मध्य एशियाई फ्लाईवे का हिस्सा है, रामसर टैग पाने वाली गुजरात की चौथी आद्रभूमि बन गयी है। यह गुजरात के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गौरवशाली उपलब्धि है। इसके अलावा नालसरोवर पक्षी अभयारण्य, थोल वन्यजीव अभयारण्य और वाधवाना आद्र्रभूमि राज्य के अन्य रामसर स्थल हैं।

प्रकृति का संरक्षण गुजरात के इतिहास से चला आया है। वर्ष 1977 में, बेहतर पर्यावरण संरक्षण के लिए गुजरात के प्रयासों को बढ़ावा देने की दिशा में गुजरात सरकार और ‘गुजरात प्रकृति मंडलÓ ने गांधीनगर में प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय की स्थापना की थी।

आज यह क्षेत्र इन्ड्रोडा नेचर पार्क (ढ्ढहृक्क) के नाम से जाना जाता है। कुछ समय बाद इसे गुजरात पारिस्थितिक शिक्षा और अनुसंधान (जीईईआर) फाउंडेशन में शामिल कर लिया गया, जिसकी स्थापना जून 1982 में गुजरात सरकार के वन और पर्यावरण विभाग द्वारा इकोलॉजिकल शिक्षा, इकोलॉजिकल रिसर्च, नैचुरल हिस्ट्री, क्लाइमेट चेंज रिसर्च, वेटलैंड मॉनिटरिंग,  अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों की जैव विविधता निगरानी जैसी कई गतिविधियों के लिए की गई थी। ढ्ढहृक्क अब त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है।

त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन की रिसर्च कैपेसिटी को बढ़ाने के लिए वर्ष 2015 के दौरान ढ्ढठ्ठह्लद्गद्दह्म्ड्डह्लद्गस्र ष्टशड्डह्यह्लड्डद्र्य ंशठ्ठद्ग रूड्डठ्ठड्डद्दद्गद्वद्गठ्ठह्ल (ढ्ढष्र्टंरू) परियोजना के तहत एक अत्याधुनिक पारिस्थितिक और मॉनिटरिंग रिसर्च लेबोरेट्री (श्वरूक्ररु) की स्थापना की गई थी। यह प्रयोगशाला इकोलॉजिकल स्टडी और मॉनिटरिंग के उद्देश्य से स्थापित की गई है। केंद्रीय प्रयोगशाला के अलावा ढ्ढ ष्र्टंरू  प्रोजेक्ट के पांच फील्ड स्टेशन जामनगर, मांडवी, सूरत, मंगरोल और भावनगर में पांच फील्ड स्टेशन भी स्थापित किए गए हैं जो वल्र्ड बैंक द्वारा फंडेड हैं। इन पांच स्टेशनों का उपयोग कच्छ/खंभात की खाड़ी के विभिन्न स्थलों से इक_े किए गए नमूनों के विश्लेषण और रिसर्च के लिए डेटा तैयार करने के लिए किया गया है। वर्ष 2016-17 के दौरान, फाउंडेशन ने प्रयोगशाला को अपग्रेड करने के लिए कई आधुनिक उपकरण खरीदे।

इन उपकरणों में, स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (स्श्वरू), फ्लोरोसेंट माइक्रोस्कोप, पीसीआर और इलेक्ट्रोफोरोसिस, हाई परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी, टोटल कार्बन एनालाइजऱ, मरक्यूरी एनालाइजऱ,वॉटर फ्यूरिपिकेशन सिस्टम, अल्ट्रा-माइक्रो-बैलेंस, गैस क्रोमैटोग्राफ, एटॉमिक अब्जॉर्पशन स्पेक्ट्रोस्कोपी, और हेवी-मेटल एनालाइजऱ शामिल हैं।

गुजरात सरकार के वन और पर्यावरण विभाग ने प्रकृति की रक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए कई पहलें की हैं। गुजरात के विभिन्न संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन/जैव विविधता संरक्षण योजनाओं को तैयार करने में कुछ अनुसंधान परियोजनाएं/अध्ययन बहुत उपयोगी थे। त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन को वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संगठन (स्ढ्ढक्रह्रह्य), गुजरात राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र के रूप में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा गुजरात राज्य आद्र्रभूमि प्राधिकरण की नोडल एजेंसी के रूप में मान्यता दी गई थी।

त्रश्वश्वक्र की विशेषज्ञता को देखते हुए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (रूशश्वस्न&ष्टष्ट), भारत सरकार ने संस्थान को क्लाइमेट चेंज एक्शन प्रोग्राम के तहत लॉन्ग टर्म इकोलॉजिकल ऑब्जर्वेटरीज (रुञ्जश्वह्र) प्रोजेक्ट का काम सौंपा है। रुञ्जश्वह्र की यह परियोजना दिसंबर 2015 में पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क सम्मेलन के 21वें सम्मेलन (सीओपी) के दौरान शुरू की गई थी। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य चुने गए बायोम में पारिस्थितिकी तंत्र के बायोफिज़िकल और एंथ्रोपोजेनिक ड्राइवर्स को जानना और सोशल-इकोलॉजिकल परिदृष्य पर उनके प्रभाव को समझना  है। भारतीय विज्ञान संस्थान (ढ्ढढ्ढस्ष्), बैंगलुरु के साथ मिलकर त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन ने एशियाई शेर क्षेत्र में तीन फील्ड स्टेशन स्थापित किए हैं। इनमें वन और मृदा थीम के तहत उत्तर पश्चिमी शुष्क क्षेत्र के लिए सासन गिर, बजाना और हिंगोलगढ़ और जेसोर शामिल है। इन स्थलों पर किए गए अध्ययनों को स्वचालित मौसम स्टेशनों (्रङ्खस्ह्य) से एकत्र किए गए विभिन्न क्लाइमेटिक पैरामीटर के साथ को-रिलेट किया जाएगा। इन ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन्स को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को जानने के लिए विश्व मौसम विज्ञान संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुसार स्थापित किया गया है।

इकोलॉजिकल एजुकेशन के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन, रूशश्वस्न&ष्टष्ट, भारत सरकार के राष्ट्रीय हरित कोर कार्यक्रम के तहत राज्य में 16,500 स्कूल और 162 कॉलेजों में स्थापित इको-क्लब के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के बारे में युवाओं को जागरूक कर रहा है। राज्य सरकार की प्रकृति शिक्षा योजना के तहत, त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन ने राज्य के विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों के लिए कुल 3,950 नेचर कैम्प/इकोलॉजिकल कैम्प आयोजित किए हैं।

इंड्रोडा नेचर पार्क/अरण्य उद्यान, गांधीनगर और हिंगोलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य, राजकोट को त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन द्वारा प्रकृति शिक्षा प्रदान करने के लिए नेचर एजुकेशन सेंटर के रूप में मान्यता दी गई है, जिसके माध्यम से अब तक 2,20,292 छात्रों को शिक्षित किया जा

चुका है।

इकोलॉजिकल रिसर्च, मॉनिटरिंग और शिक्षा के अलावा त्रश्वश्वक्र फाउंडेशन ने केवडिय़ा में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटीÓ परिसर में विश्व प्रसिद्ध ‘कैक्टस गार्डनÓ के निर्माण कार्य में भी अपना योगदान दिया है। माननीय प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें तो यह एक ‘ग्रैंड आर्किटेक्चर ग्रीनहाउसÓ है जिसमें भारत और 17 अन्य देशों के कैक्टस और रसीले की 450 प्रजातियां मौजूद हैं। इसके 25 एकड़ में फैले क्षेत्र में 1.9 लाख कैक्टस के पौधों सहित लगभग 6 लाख पौधे हैं। प्रकृति प्रेमियों के लिए गुजरात का यह उद्यान मुख्य आकर्षण केन्द्र है।

मानव समाज के कल्याण के लिए संरक्षण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और आधुनिक गुजरात इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (ष्ठक्कढ्ढढ्ढञ्ज) की रिपोर्ट के अनुसार नये उद्यमियों के लिए स्टार्टअप परिवेशविक सितकर ने में गुजरात सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की फेहरिस्त में सबसे आगे हैं।

हमें अपने भले के लिए पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए उचित उपाय करने की आवश्यकता है। यह सम्पूर्ण संसार और हमारी अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने की मूल नींव हैं। इस दिशा मेंगुजरात सरकार के प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं और हम सभी इस मॉडल से सीख सकते हैं। हमें जीवित रहने के लिए प्रकृति की ज़रूरत है लेकिन उन्हें जीवित रहने के लिए हमारी आवश्यकता नहीं है या यूं कहें कि हमें जीवित रहने के लिए चींटियों की जरूरत है, लेकिन उन्हें हमारी नहीं है। यह बात हम जितनी जल्दी समझ लेंगे, हमारा भविष्य उतना ही बेहतर होगा।

माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, ‘यह हमारे लिए गर्व की बात है कि भारतीय साइट्स को रामसर मान्यता मिलती हैÓ। यह उपलब्धि प्राकृतिक आवासों, वनस्पतियों और जीवों के संरक्षण की दिशा में काम करने और धरती की प्रकृति को सहेजने के भारत के सदियों पुराने लोकाचार को प्रकट करता है।

 

नीलेश शुक्ला
(नीलेश शुक्ला गुजरात भवन में संयुक्त निदेशक हैं और वे कई प्रकाशनों में लिखते हैं)

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