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नवदुर्गा के पहले स्वरुप की वैज्ञानिक व्याख्या

नवदुर्गा के पहले स्वरुप की वैज्ञानिक व्याख्या

प्रथमं शैलपुत्री..च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी..तृतीयं चंद्रघंटेति..कुष्मांडेति चतुर्थकम्..पंचमं स्कंदमातेति..षष्ठमं कात्यायनीति..सप्तमं कालरात्रि..महागौरीति चा अष्टमं..नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता…
आज नवरात्रि का पहला दिन है। आप सभी को इस पावन पर्व की शुभकामनाएं। सनातन धर्म पूर्ण रुप से वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। नवरात्रि का यह पवित्र त्योहार भी इसी सत्य को दर्शाता है। शुरुआत में मैने जिस श्लोक का उच्चारण किया। वह देवी कवच का पहला श्लोक है। जिसमें मां जगदंबा के नौ स्वरुपों का वर्णन किया गया है। देवी जगदंबा के यह नौ स्वरुप एक स्त्री के जीवन के नौ चरणों के बारे में बताता है। जिसमें से प्रथम शैलपुत्री स्वरुप की उपासना हम आज कर रहे हैं। माता का यह स्वरुप छोटी बच्ची का है। वह शैल यानी गिरिराज हिमालय की पुत्री है। उसकी पहचान अपने पिता की बेटी के रुप में है। इसलिए उसे शैलपुत्री कहा जाता है। अपने इस स्वरुप में जगदंबा श्वेत वस्त्र पहनती हैं और छोटा सा त्रिशूल और कमल पुष्प धारण करती हैं। नन्ही बालिका के रुप में मां भगवती का यह स्वरुप बहुत मनोहर होता है। उनकी सवारी वृषभ होता है, जो कि धर्म का प्रतीक है। शैलपुत्री के रुप में माता एक भोली बालिका के रुप में होती हैं, जो कि बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं। वह फूलों से खेलना पसंद करती है। इसलिए उसे कमल का पुष्प अर्पित करने की परंपरा है। देवी शैलपुत्री को शुद्ध देशी गाय का घी भोग के रुप में अर्पित किया जाता है। आज नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापित करके देवी का आह्वान किया जाता है। आज कलश स्थापना का शुभ मुहुर्त सुबह 6 बजकर 11 मिनट से 7 बजकर 51 मिनट तक है।अगर आप इतनी सुबह कलश स्थापित नहीं सकते हैं। तो चिंता की कोई बात नहीं, क्योंकि कलश स्थापना का दूसरा मुहुर्त दोपहर 11 बजकर 49 मिनट से 12 बजकर 37 मिनट तक का रहेगा। इन दो मुहर्तों में कलश स्थापित किया जा सकता है। कलश स्थापना और देवी पूजन का विस्तृत विधि विधान शास्त्रों में बताया गया है। लेकिन मैं आपको बता दूं, कि मां भगवती को सबसे प्रिय है। शुद्ध मन से की गई भक्ति, आपको देवी के सामने बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह बन जाना है। अगर आप निश्छल हृदय से उसे पुकारेंगे, तो वह जरुर आएगी। क्योंकि वह पूरे संसार की माता है। जिसने संपूर्ण सृष्टि को जन्म दिया है। उसे आप शुद्ध भाव से ही प्रसन्न कर सकते हैं।

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