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सिर्फ भारत में ईश्वर को माता के रुप में देखा जाता है

सिर्फ भारत में ईश्वर को माता के रुप में देखा जाता है

या देवी सर्वभूतेषू शक्तिरुपेण संस्थिता..नमस्तस्यै..नमस्तस्यै..नमस्तस्यै नमो नम:…नमस्कार.. मां देवी भगवती का धरती पर आगमन हो चुका है। आगमन से कुछ ही दिन पहले से ही जगदंबा हमारे हृदय पर विराजमान हो जाती हैं। मन जगदंबा को बार बार याद करने लगता है। माता रानी के अनेक रुप हमारे मन में अंकित होने लग जाते हैं। इसलिए हमने तय किया कि आज आज हम मातृ शक्ति और इसके महत्व पर चर्चा करेंगे। मातृशक्ति को जानने से पहले हमें उनकी शक्ति के बारे में जानना जरुरी है। दरअसल इस अखिल ब्रह्मांड में प्रत्येक वस्तु को क्रियाशील रखने की क्षमता ही शक्ति का स्वरुप है। सूर्य का प्रकाशमान होना, या समुंदर की लहरों का उछलना, या फिर फूलों में सुगंध का बिखरना हो, या हवा का प्रवाहमान होना, ये सब हमको बेहद सामान्य बातें लगती हैं। क्योंकि हम जन्म के साथ ही इसे देखते आए हैं। लेकिन यह स्वयं नहीं होता। प्रकृति में जहां भी गति है। वहां शक्ति काम कर रही होती है। प्रत्येक कार्य के पीछे एक शक्ति होती है। यह बात भौतिक विज्ञान भी कहता है। उसी समस्त शक्ति को सृजन करने वाली को हम मातृ शक्ति कहते हैं। पूरे विश्व में भारत एक ऐसा देश है। जहां पर मातृशक्ति की उपासना की परंपरा बनाई गई है। यह बेहद प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। भारत इकलौता देश है। जहां स्त्री में ईश्वर को देखा गया। ऋगवेद के दसवें मंडल में स्थित नासदीय सूक्त इस बात का सबूत हैं। जिसमें सबसे पहले यह घोषणा की गई, कि ईश्वर में स्त्री और पुरुष दोनों ही तत्व विराजमान हैं। इसी आधार पर परमेश्वर के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप की परिकल्पना सामने आई है। भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के भग्नावशेषों में पृथ्वी माता की उपासना का संकेत मिला है। और हमारी भारत माता के बारे में तो पूरा विश्व जानता है। कि हम भारतीय हमने राष्ट्र की भी माता के रुप में पूजा करते हैं। शक्ति के बिना सत्ता असंभव है। मातृशक्ति का पूजन हम भारतीयों के अंदर समग्र नारी जाति के लिए सम्मान को दर्शाता है। मातृशक्ति के पूजन को स्वयं भगवान श्रीराम ने भी बेहद जरुरी माना था। इसलिए परम प्रतापी रावण से युद्ध से पहले उन्होंने मां भगवती की उपासना की थी। देवताओं ने भी महिषासुर और शुंभ निशुंभ जैसे राक्षसों से मुक्ति के लिए शक्ति रुप में देवी दुर्गा की शरण ली थी। नारी के अनेक रुप हैं, लेकिन उनमें से मां का रुप ही सर्वश्रेष्ठ है। इस में कोई संदेह नहीं है। मां अपने बच्चों को विपत्ति से बचाने के लिए प्रबल शक्ति को अपने अंदर ला सकती है। क्योंकि एक मां से बड़ा योद्धा कोई नहीं होता। वैसे ही देवी जगद्जननी मां के रुप में आकर समस्त विश्व का उद्धार करती हैं। मातृशक्ति की उपासना हमारे विश्वास के उपर निर्भर करता है। माता के प्रति रहने वाला विश्वास ही शक्ति का रुप ले लेता है। हमारे विश्वास जितना अधिक घनीभूत होता है। शक्ति उतना ही क्रियाशील होती है। तो आइए इस नवरात्रि के लिए संकल्प धारण करें, कि हम अपने विश्वास को इतना मजबूत बनाएंगे, कि मां हर कदम पर हमारा सहारा बनेंगी।

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