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माँ चंद्रघंटा की महिमा

माँ चंद्रघंटा की महिमा

चंद्रमुखी इष्टदात्रि इष्टमंत्र स्वरुपिणि..धनदात्री..आनंददात्री चंद्रघंटे प्रणाम्यहं… आज नवरात्रि का तीसरा दिन है। आज माता चंद्रघंटा की उपासना का दिन है। इस रुप में मां जगदंबा भगवान शिव की पत्नी के रुप में होती हैं। यह माता का नवविवाहिता का रुप होता है। इस रुप में माता आध्यात्मिक और आंतरिक शक्ति दोनों एक साथ धारण करती हैं। उनके माथे पर आधा चंद्र विराजमान होता है। इसके पीछे भी एक विशेष कथा है। दरअसल विवाह के बाद माता पार्वती ने भगवान शिव से मुंहदिखाई में उपहार मांगा, लेकिन भोलेनाथ के पास तो कुछ भी नहीं था।इसलिए उन्होंने अपने माथे से चंद्रमा उतारकर माता को दे दिया। माता ने उस आधे चंद्र को धारण कर लिया। यह चंद्रमा मंदिर के घंटे के रुप में होता है। इसलिए उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। इस स्वरुप में माता की तीसरी आंख हमेशा खुली होती है। चंद्रघंटा स्वरुप में माता की दस भुजाएं होती हैं। उनका वाहन सिंह होता है। चंद्रघंटा देवी दुर्गा के बेहद शक्तिशाली स्वरुपों में से एक हैं। वह श्रद्धालु भक्तों के लिए अत्यंत दयाशील और प्रेममयी होती हैं। वहीं दुष्टों के लिए भयंकर रुप धारण करती हैं। मातारानी का चंद्रघंटा रुप समग्र जगत को एक महान संदेश देता है, कि नारी जितनी भी कोमल, सुशील और निष्ठापरायण हो. लेकिन दुष्ट और अत्याचारियों का सामना करने के लिए उसके अंदर प्रचंड शक्ति होती है। लेकिन नारी को अपनी शक्ति का आभास होना जरुरी है। अपने अंदर की उसी शक्ति का जागृत करके नारी स्वयं ही दुष्टों से अपनी रक्षा कर सकती है। और उनको सबक सिखा सकती है। नारी का यह रूप ना केवल नारी जाति के लिए ही नहीं बल्कि समाज में रहने वाले उन पापी, दुष्कर्मियों को भी संदेश देता है, जो सदैव नारी के शोषण की फिराक में रहते हैं। उन्हें यह ज्ञान होना चाहिए, कि कोमल नारी भी जरुरत पड़ने पर महाप्रचंड रुप धारण कर सकती है। मातारानी का चंद्रघंटा स्वरुप वास्तव में अत्यंत मनोहारी होता है। चंद्रघंटा स्वरुप में माता का तीसरा नेत्र हमेशा खुला होना भी एक खास संदेश देता है,कि नारियों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। तीसरी आंख दरअसल हमारी छठी इंद्रिय का प्रतीक होता है। जो कि महिलाओं को किसी की भी बुरी निगाहों को पहले से भांप लेने की क्षमता देता है। तीसरी आंख का हमेशा खुला होना यह संदेश देता है, कि किसी भी परिस्थिति को समझने के लिए सिर्फ दो आंखें ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी आंतरिक चेतना का भी प्रयोग करना चाहिए। मां चंद्रघंटा को गाय के दूध की बनी खीर का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा उन्हें दूध से बनी मिठाई भी चढ़ाने की परंपरा है। माता की आराधना करने से साधकों के अंदर का अहंकार नष्ट होता है। उन्हें सौभाग्य, मानसिक शांति और वैभव की प्राप्ति होती है। जय माता की.

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