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राहुल गांधी की यात्रा : विपक्षी पार्टियों पर धावा

राहुल गांधी की यात्रा : विपक्षी पार्टियों पर धावा

एक के बाद एक प्रदेश में लगातार सत्ता खोती जा रही कांग्रेस पार्टी के नेता अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के आगे मुंह की खाने वाली है। वे इस बात से अभी तक आश्वस्त थे कि मुख्य विरोधी पार्टी तो कांग्रेस ही रहेगी। जब कभी भाजपा कमजोर पड़ी और मिली जुली सरकार बनी तो कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में ही बनेगी। उत्तर प्रदेश में रामपुर और आजमगढ़ की खाली हुई सीटों पर लोकसभा के चुनाव हुये और उसमें भाजपा के प्रत्याशी जीते तो कांग्रेस को लगा कि अब तो सपा का मुस्लिम यादव कार्ड भी फेल हो चला है। उनकी चिन्ता ये हुयी कि विधान सभा के चुनाव में इसी साल सपा ने 100 से अधिक सीटें जीत कर अपनी दम खम तो दिखा दी थी। यानि उत्तर प्रदेश में अब कांग्रेस का डिब्बा सदा के लिये गोल हो गया।

सपा का उत्तर प्रदेश में कमजोर होना, महाराष्ट्र में गठबंधन में दरार पडऩा और कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के तेवर ढीले पडऩा आदि राजनैतिक घटनाओं के कारण कांग्रेस पार्टी अपने को विपक्ष का नेतृत्व संभालने में असुरक्षित समझ रही थी। जब नितिश कुमार भाजपा से अलग होकर लालू यादव की पार्टी राजद के साथ गठबंधन करके बिहार के मुख्यमंत्री बने और राजद ने उन्हें प्रधानमंत्री बननें के सब्जबाग दिखाये। फिर क्या था, नितिश कुमार प्रधानमंत्री बननें की होड़ में शामिल हो गये। कांग्रेस को लगा कि अब उसको विपक्ष का नेता बननें का खतरा बड़ चला है। भविष्य में कभी विपक्ष की गठबंधन से केन्द्र में सरकार बनती भी है तो राहुल गांधी पिछड़ जायेंगे। प्रधानमंत्री की दौड़ में नितिश कुमार और ममता बनर्जी में ही होड़ होगी।

कांग्रेस को कुछ नया करके अपनी तस्वीर सुधारने और विपक्षी दलों पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिये राहुल गांधी की पदयात्रा का कायक्रम बना ताकि दिन पर दिन क्षीण होती जा रही कांग्रेस को नष्ट होने से रोका जाये। बड़े बड़े पार्टी के समर्पित नेताओं के लगातार पार्टी छोडऩे से भी पार्टी घबरायी हुयी थी। ऐसे नेता पार्टी छोड़ रहे थे जिनकी पीढिय़ां कांग्रेस में रही हों और पार्टी में उच्च पदों पर रहे, मंत्री भी बने रहे। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में हाईकमान के हिस्सा रहे जितेन्द्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद का पार्टी छोड़कर जाना आश्चर्य जनक था। उसके बाद उत्तर प्रदेश में ही पार्टी के कद्दावर नेता रहे सी.पी.एन. सिंह के पुत्र आर.पी.एन. सिंह जो खुद भी पार्टी हाईकमान के नजदीकी लोगों में थे, ने भी पार्टी छोड़ कर भा.ज.पा. का दामन थाम लिया। मध्य प्रदेश में पार्टी हाईकमान का हिस्सा रहे शक्तिशाली नेता माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्यातिरादित्य सिंधिया ने जब पार्टी छोड़ कर भाजपा का दामन थाम कर मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार गिरा दी। उनके साथ दो दर्जन से अधिक विधायक भी कांग्रेस छोङकर भाजपा में आ गये। लगभग सभी पुन: हुये चुनाव में विजयी हुये। उसके पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय मंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री रीता बहुगुणा ने पार्टी छोड़ी और उनके पुत्र जो उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रह चुके, विजय बहुगुणा ने भी पार्टी छोड़ी। दोनों ने भाजपा की सदस्यता ली तब भी पार्टी के कानों पर जूं नहीं रेंगी। केन्द्रीय मंत्री रहे कपिल सिब्बल भी सपा में चले गये। उस पर ध्यान न देना तो सतझ आता है क्योंकि न वे सफल लोकप्रिय नेता या प्रवक्ता रहे न ही उनके पास कोई वोट बैंक है। अब पूर्व केन्द्रीय मंत्री, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे और कांग्रेस में लगातार कई दसकों से शक्तिशाली नेता रहे, सदा कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे गुलाम नवी आजाद ने पार्टी छोड़ी तो खतरे की घंटी नहीं खतरे का घंटा बज गया। पार्टी को जम्मू कश्मीर में सत्ता में पुन: नहीं लौट पाने की चिंता नहीं थी। चिंता थी कि एक सूझ बूझ वाला नेता चला गया। प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बना कर और अर्जुन सिंह जैसे नेता से दूरी बना कर जो गलती कांग्रेस ने की थी वो वही गलती फिर दोहरा दी। अब कांग्रेस पार्टी के पास समस्या कुचल (ट्रवल शूटर) नेता नहीं बचा। लगातार तीन चुनाव हारनें वाले सुरजेवाला, सब तरह से बुरी तरह फेल दिग्विजय सिंह और भ्रष्टता के आरोपों से सराबोर पी. चिदम्बरम की सलाह से चल रही कांग्रेस को विपक्ष का नेता बननें का खतरा लगने लगा। ये खतरा दिग्गज नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ कर जानें की चिंता से बड़ता जा रहा था।

कांग्रेस पार्टी अच्छी तरह जानती है कि 2024 में भाजपा को हराना असंभव है। भाजपा के पास मजबूत नेता और मजबूत संगठन है। कांग्रेस के पास ये दोनों चीजें सपाप्त होने पर हैं। नेतृत्व और संगठन दोनों का पार्टी में भट्टा बैठ चुका है। ऐसे में विपक्ष में बढते जा़ रहे प्रधानमंत्री के दावेदारों को कैसे पीछे छोड़ा जाये ताकि विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस ही संभाले रहे। विचार विमर्श हुआ, राहुल गांधी की पदयात्रा शुरू हो गयी। ये पदयात्रा विपक्ष पर दबदबा बनाये रखने के लिये, राहुल गांधी को गठबंधन का मुखिया बनाने के लिये की गयी है न कि भाजपा से मोर्चा लेने के लिये। भाजपा के मजबूत किले को तोड़ पाना तो दूर, उसकी कल्पना भी कांग्रेस या विपक्षी दल फिलहाल तो नहीं कर सकते। इस पद यात्रा का उद्देश्य विपक्ष में पनप रहे प्रधानमंत्री के दावेदारों के लिये पगबाधा बनाना है।

केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का कद यकायक कम किया गया उन्हें केन्द्रीय चुनाव समिति और पार्लियामेंट बोर्ड से भाजपा पार्टी ने हटाया तो अवश्य कांग्रेस और खास तौर से विपक्षी पार्टियों के मन में एक आस जगी। यदि गडकरी भाजपा छोड़ दें और एक जमानें में जिस तरह वीपी सिंह कांग्रेस छोड़ कर विपक्ष में आये और राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बननें से रोक दिया था। वही खेल गङकरी को वी पी सिंह बनाकर खेला जाये, तो शायद नरेन्द्र मोदी जी की सरकार को दुबारा सत्ता में आने से 2024 के चुनाव में रोका जा सकता है। किसी भी कीमत पर मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देने पर कांग्रेस तो तुरन्त गङकरी को नेता मान लेगी और पूरा विपक्ष भी तैयार हो जायेगा। सोनिया गांधी और विपक्ष के कद्दावर नेता गाहे बगाहे गङकरी के  कार्यों की और उनके व्यवहार की प्रशंसा करते रहते हैं। ये सपना ही लगता है, कि गङकरी कभी भाजपा छोङेंगे । प्रधानमंत्री का पद मिलने पर भी नहीं जायेंगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सिपाही होने के नाते अनुशासन उनमें भरा हुआ है। वे मोदी के नेतृत्व को सदा स्वीकार भी करते हैं।

ये बात कांग्रेस जानती है कि ये ख्याली पुलाव नहीं पकने वाला इसलिये विपक्ष में अपने नेतृत्व संभाले रहने के लिये राहुल गांधी यात्रा कर रहे न कि भाजपा को चैलेंज देने के लिये। राहुल गाँधी की यात्रा शरद पवार, ममता बनर्जी, नितिश कुमार जैसे प्रधानमंत्री के दावेदारों के लिये चिन्ता का विषय हो सकता है। राहुल गाँधी के सक्रिय होने से पुन: उन्हें ही विपक्ष की कमान देनी पड़ेगी और कभी गठबंधन की सरकार बनी भी तो वही प्रधानमंत्री के दावेदार होंगे।

 

 

डॉ. विजय खैरा

 

 

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