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डॉ. राम मनोहर लोहिया : समावेशी राष्ट्रीयता के पुरोधा

डॉ. राम मनोहर लोहिया : समावेशी राष्ट्रीयता के पुरोधा

भारतीय राजनीति में ऐसे बहुत बिरले व्यक्ति हुए हैं जिनके आगे लगने वाले विशेषणों और उनकी गणना पर किसी अन्य के द्वारा कभी कोई विरोध दर्ज नहीं किया गया। 20वीं शताब्दी के चौथे से छठे दशक के दौरान एक ऐसी शख्सियत का तेज समूचे विश्व पर पड़ा जिसका नाम था डॉ. राम  मनोहर लोहिया। हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है का विचार रखने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजवादी बिरादरी का नामी गिरामी चेहरा, मौलिक बुद्धिमत्ता, बहुआयामी, दार्शनिक, प्रखर राष्ट्रवादी, दलितों, शोषितों के प्रवक्ता, उद्भट विद्वान सरीखे असंख्य विशेषणों को अपने साथ रखने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने राष्ट्र को वैचारिक तौर पर समृद्ध करने के साथ नये प्रतिमानों का गढ़ा है। डॉ. लोहिया ने भारत के विभाजन को परिस्थितियोंवश स्वीकार किया गया विभाजन माना था। अंग्रेजों ने बंदूक की गोली और अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारत पर राज किया है, हमें अंग्रेजियत से बाहर निकलकर राष्ट्र और उसकी भाषा हिंदी पर गौरव करना सीखना होगा। वे मानते थे कि भारत प्रकृति से एक है अत: खण्डित हो जाने के बाद भी वह एक दिन पुन: अवश्य ही एक हो जाएगा। आत्म प्रशंसा, सत्ता के प्रति आसक्ति, स्वयं के महिमामंडन के सांसारिक आडंबरों से दूर लोहिया का विश्वास था कि ‘सत्यम् शिवम् सुंदरमÓ के प्राचीन आदर्श और आधुनिक विश्व के समाजवाद, स्वतंत्रता और अहिंसा के तीन सूत्री आदर्श को इस रूप में रखना होगा कि वे एक-दूसरे के पूरक होने के साथ ही उनकी जगह ले सकें।

लोकतांत्रिक व्यवस्था का पुरजोर समर्थन करने वाले डॉ. लोहिया का मानना था कि राज सत्ता का नियंत्रण तथा मार्गदर्शन जनशक्ति द्वारा किया जाना चाहिए। उन्होंने देश के पुर्निनिर्माण में युवाओं को स्वैच्छिक रुप से श्रमदान करने के लिए भी प्रेरित किया। शोषितों, वंचितों एवं उस अंतिम व्यक्ति के उत्थान के प्रयास ने नित नये प्रयोग, सिद्धांत और विचारों को जन्म दिया जो सदैव से समावेशी राष्ट्रीयता का मूल आधार रहा है। सामाजिक और आर्थिक विकास का ऐसा प्रादर्श प्रस्तुत किया जिसमें गरीबों, किसानों, भूमिहीनों, खेतीहर मजदूरों, युवाओं, महिलाओं के साथ आम जनमानस की आकांक्षाओं को संपूर्ण स्वरूप में पूरा किया जा सकता है। मानवीय मूल्यों की वकालत करने वाले डॉ. लोहिया सही मायने में सच्चे राष्ट्रवादी थे जिन्होंने युवाओं से पाश्चात्य जीवनशैली को त्यागने और भारत की गरिमामय, वैभवशाली ज्ञानपरंपरा को जीवन में आत्मसात करने पर बल दिया।

केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलगुरु और वाणिज्य व प्रबंध अध्ययन विषय के शिक्षक के रूप में जब डॉ. लौहिया जी के सिद्धांतों, विचारों और प्रयोगों को देखता हूं तो पाता हूं कि वे उस दौर से पचास साल आगे का विचार रखते थे। उनके विचारों में संकुचित या संकीर्ण राष्ट्रवाद की मानसिकता का लेषमात्र भी नहीं है। वे स्वतंत्रता, समानता, आर्थिक-सामाजिक समरसता और वैश्विक एकता के महान लक्ष्य को हासिल करने के लिए गांधीवादी और माक्र्सवादी विचारों के बीच तादातम्य स्थापित करते हुए प्रतीत होते हैं।

इतिहास और गणित को विशेष रूप से तरजीह देने वाले डॉ लोहिया जी कई दफे अपने भाषणों कहा कि इतिहासकारों ने हमारे इतिहास को बर्बाद कर दिया है। इतिहास से हमारे सांस्कृतिक गौरव का भाव गायब है। उनका मानना था कि इतिहास में समन्वय दो तरह का होता है जिसमें एक दास का समन्वय है और दूसरा स्वामी का। पिछले एक हजार साल के इतिहास से हमने स्वामी का समन्वय नहीं बल्कि दास का समन्वय सीखा है। डॉ. लोहिया का मानना था कि भारत का भविष्य दो विषयों पर निर्भर करता है इतिहास और गणित। इतिहास अतीत का बोध है। हमें आने वाली पीढ़ी के लिए अपने इतिहास को भली प्रकार जानना होगा अगर हम ऐसा करने में सफल नहीं हुए तो ये देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वहीं गणित, विज्ञान का आधार है। दोनों का मेल हमें आसमान में ले जाता है, विकसित देश इसका उदाहरण है।

डॉ. लोहिया ने हमेशा भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में अंग्रेजी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी। उनका विश्वास था कि अंग्रेजी, शिक्षित और अशिक्षित जनता के बीच दूरी पैदा करती है। हिन्दी के उपयोग से एकता की भावना और नए राष्ट्र के निर्माण से सम्बन्धित विचारों को बढ़ावा मिलेगा। चाणक्य शैली में उनकी जड़ पर हमला करने का उपक्रम करते लोहिया ने अपना प्रसिद्ध आंदोलन शुरू किया जिसका ऐलान था ‘अंग्रेजी हटाÓ  ‘जब अंग्रेजी हट जाएगी तो अंग्रेज और अंग्रेजियत अपने आप हटेंगेÓ यही तो गांधी जी की भी अवधारणा था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि जाओ दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है।

हम अपने राष्ट्र को विकसित करने के लिए किसी दूसरी भाषा या संस्कृति के गुलाम नहीं हैं हमारा अपना वैभवशाली ज्ञानपरंपरा का इतिहास है जिसका हमें संधारण और संवर्धन करना है।

प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय तक की शिक्षा मुफ्त एवं अनिवार्य रूप से प्रदान किये जाने के पक्षधर तथा उच्च स्तर पर शैक्षिक, शोध एवं अनुसंधान की सुविधाएं मुफ्त या सस्ते में उपलब्ध कराई जानी चाहिए, खासतौर से अनुशुचित जाति, जनजाति और समाज के अन्य गरीब वर्गों को सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए ताकि वे न्यूनतम स्पर्धा स्तर को प्राप्त कर सकें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 डॉ. राम मनोहर लोहिया के इन सभी विचारों को साकार करती हुई प्रतीत होती है। जिसमें सभी के लिए शिक्षा, सारगर्भित शिक्षा, मूल्य आधारित शिक्षा, कौशल विकास, प्रशिक्षण और रोजगार व उद्यमिता के लिए विद्यार्थियों को मानसिक रूप से तैयार करना शामिल हैं                  जात-पात के घोर विरोधी रहे डॉ. लोहिया ने जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए सुझाव दिया कि ‘रोटी और बेटीÓ के माध्यम से इसे समाप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार सभी जाति के लोग एक साथ मिल-जुलकर खाना खाएं और उच्च एवं निम्न जाति के परिवारों में शादी हो तो उसे दूरी को समाप्त किया जा सकता है।

भविष्य की अपेक्षाओँ, आशंकाओँ और अवसरों के अनुरूप सिद्धांत और विचारों का परिमार्जन कर पथ प्रदर्शन का पूरा खाका तैयार करने वाले डॉ. लोहिया ने देशज भाषाओँ के विकास, जाति और लैंगिक भेदभाव का विरोध, आरक्षण व्यवस्था को बेहतर बनाने पर जोर, नारी असामनता का विरोध जैसे युग निर्माण करने वाले गंभीर विषयों पर बेबाक राय रखी। भाषा के विकास उसकी प्रासंगिकता को प्राथमिकता देने वाले डॉ. लोहिया ने भारत के भविष्य को संवारने के लिए एक ठोस खाका तैयार किया था। इस व्यापक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने आधुनिक और परंपरागत उपायों का बेहतर उपयोग करने का प्रयास किया ताकि लोग सामाजिक सशक्तीकरण और आथिक विकास के लिए गोलबंद हों।

चौखंबा राज्य की परिकल्पना करने वाले डॉ. लोहिया ने गाँव, मण्डल, प्रान्त तथा केन्द्र सभी के महत्व को स्वीकार करते हुए केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण की परस्पर धुर विरोधी विचारों का समन्वय किया। सरकार की योजनाओं के संपूर्ण व्यय का पच्चीस फीसदी ग्रामीण परिवेश के विकास हेतु विभिन्न सरकारी एवं अन्य माध्यमों से खर्च किये जाने के पक्षधर डॉ. लोहिया ने कृषि  और उद्योग जैसे प्रकल्पों को सरकार द्वारा शासित किये जाने का मुखर समर्थन किया। प्रशासन का प्रजातंत्रीकरण करके, कम पूंजी से लगने वाली छोटी मशीनों को लगाकर, सम्पति का समाजीकरण करके एवं आर्थिक तथा राजनीतिक समाजीकरण करके एशियाई समाजवाद के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

डॉ. लोहिया ने समाजवाद के सार्वभौम सात सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप देने पर बल दिया जिनमें स्त्री-पुरूष समानता को स्वीकृति, जाति सम्बन्धी तथा जन्म सम्बन्धी असमानता की समाप्ति, रंगभेद पर आधारित असमानता की   समाप्ति, विदेशियों द्वारा दमन की समाप्ति तथा विश्व सरकार का निर्माण, व्यक्तिगत सम्पति पर आधारित आर्थिक असमानताओं का विरोध तथा उत्पादन में योजनाबद्ध वृद्धि, व्यक्तिगत अधिकारों के अतिक्रमण का विरोध और युद्ध   के शस्त्रों का विरोध तथा सविनय अवज्ञा सिद्धांत को स्वीकृति।

ऐसा कहना अतियुक्ति नहीं होगा कि वर्तमान केन्द्र सरकार डॉ. राम मनोहर लोहिया के भारत के स्वप्न को हकीकत में तब्दील कर रही है। अंत्योदय योजना, आयुष्मान भारत, जनधन योजना, नारी समानता, कौशल विकास, रोजगार उन्मुखी शिक्षा हेतु नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, मातृभाषा में शिक्षा, परंपराओं और इतिहास पर गौरव, हिंदी को तरजीह, युवाओं को उद्यमी बनाने प्रशिक्षण, किसानों के विकास के लिए किसान सम्मान निधि, गतिशील अर्थव्यवस्था और राष्ट्र के स्वाभिमान के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना का प्रतिस्थापन जैसे कार्य डॉ. लोहिया के तीन दशक के सैद्धांतिक और वैचारिक संघर्ष को सार्थक स्वरूप में जमीन पर उतरते हुए देखने जैसा अनुभव है।

सही मायनों में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने वर्तमान कालखंड की आवश्यकताओँ एवं अपेक्षाओं का अंदाजा 70 साल पहले ही लगा लिया था। लोहिया के विचारों और सिद्धांतों के अनुरूप शिक्षा, भाषा, अंतरराष्ट्रीय पटल पर राष्ट्र की छवि, आर्थिक एवं सामाजिक बदलाव को जमीनी हकीकत में बदलने के लिए सक्रिय एवं समर्पित प्रयास किये जा रहे हैं। जिसके सकारात्मक परिणाम लोहिया के विचारों की सफलता, सार्थकता एवं समग्रता को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त हैं।

 

आलोक चक्रवाल

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