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भगत सिंह की क्रांतिकारी साथी

भगत सिंह की क्रांतिकारी साथी

पौष की  काली अंधेरी रात। आधी रात का समय। किसी ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी। पति भी घर पर ना था। वह सोचने लगी,’इस वक्त कौन हो सकता है ?Ó उसने दृढ़ता से पूछा-

‘कौन?Ó

‘मैं हूं….।Ó

यह आवाज उसकी जानी पहचानी थी। झट से दरवाजा खोला। दो नौजवान अंदर आ

गये। उसने जल्दी से दरवाजा बंद करते हुए पूछा-

‘इस वक्त ….?Ó

Óहां! आपको किसी क्रांतिकारी को पंजाब से कहीं बाहर ले जाना हैÓ,उनमें से एक बोला। ‘किसे?Ó

‘बलवंत को ।Ó

‘कहां है?Ó

‘वह मेरे साथ कौन है?Ó

‘मैं नहीं जानती।Ó

‘यही तो बलवंत है। इसे इस रूप में आप नहीं पहचान पायी तो कोई भी नहीं पहचान पाएगा। कल सुबह बलवंत एक हिंदुस्तानी अंग्रेज की वेशभूषा में होगा।आप बेटे सचिन को गोदी में उठाए इसकी पत्नी के रूप में रहेंगी। नौकरकी भूमिका में रहेगा राजगुरु। सब ईतज़ाम हो चुके हैं।

इस प्रस्ताव को सुनकर वह सकपकाई और फिर दल के लक्ष्य और आदेश की पूर्ति के लिए उसने दृढ़ता से कहा, इस नाटक के लिए मैं तैयार हूं।Ó

सांडरस, ब्र्रिटिश पुलिस अफसर, की हत्या के 2 दिन बाद की अगली सवेर कोलकाता के लिए कलकत्ता मेल से निकल पड़े। चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी। पंछी भी पंख नहीं मार सकता था। भगत सिंह अपने नए रूप में सूट-बूट और हैट पहने, पत्नी और बच्चे के साथ, फस्र्ट क्लास के डब्बे में बैठते हैं और राजगुरु तीसरे दर्जे के डब्बे में। रास्ते में कई मुसीबतें आई पर सब निकल गयी। आखिर वे सुरक्षित कोलकाता पहुंच गए।

उस जमाने में जब समाज को यह भी मान्य नहीं था कि औरत पर किसी पराए मर्द का साया तक भी  पड़े, किसी और की पत्नी बन कर इतना लंबा सफर तय करना, एक साहसिक कार्य था जो क्रांतिकारी दुर्गा भाभी ने अंजाम दिया। सामाजिक बंधनों को तोडऩे के साथ-साथ इस  कार्य में तो जान जाने का भी पूरा जोखिम था। वह कोलकाता में भगत सिंह के साथ अपने पति के पास पहुंची। उसे भगत सिंह के साथ देखकर उसका पति बेहद खुश हुआ। और जब उसे लाहौर से कोलकाता पहुंचने का पूरा  मनोरथ समझ आया तो उसने पत्नी को अपने आलिंगन में लेते हुए कहा,  ‘तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को तो मैंने आज जाना हैÓ।

दुर्गा भाभी के पति, भगवती चरण बोहरा, ने भगत सिंह और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर पंजाब में नौजवान भारत सभा 1926 में स्थापित की थी। तब से पत्नी भी इसकी सक्रिय सदस्य थी। जब इसी नौजवान भारत सभा से नई संस्था हिंदुस्तान सोशलिस्टरिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना हुई तब भी बोहरा दंपत्ति इस के सक्रिय सदस्य रहे। दुर्गा इन दलों में स्वतंत्र  रूपेण सक्रिय योगदान रहा है। इन दोनों संस्थाओं में भी आयु और सदस्यता की वरिष्ठता के नाते अन्य सभी क्रांतिकारी साथी भगवती चरण बोहरा को अपना  बड़ा भाई मानते थे।इसी नाते दुर्गावती सभी क्रांतिकारी साथियों की ‘दुर्गा भाभीÓ हो गई। अपने क्रांतिकारी  कार्यों की बदौलत शीघ्र ही वह समस्त देश में दुर्गा भाभी के नाम से जानी जाने लगी।

पंजाब क्रांतिकारी दल की वह पहली महिला सदस्य थी जिन्होंने स्वतंत्र रूप से अनेक क्रांतिकारी कार्यों को अंजाम दिया।वह अत्यंत कोमल थी। प्रदेश में वह  ‘लौह नारीÓ प्रसिद्ध  हुई। वह महत्व से ओतप्रोत थी मगर उनके हृदय में देश को आजाद करवाने की बेचैनी मचलती रहती। वह गुलामी के बंधनों को जला देना चाहती थी। वह तो अग्नि थी। वह दुर्गा थी। भवानी थी। रणचंडी थी।

दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्टूबर1907 को कौशांबी जिले के गांव शहजादपुर में हुआ। उनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजऱि और पुश्तैनी जमीदारथे।उनका विवाह  लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ संपन्न हुआ।  बोहरा के पिता शिव चरण रेलवे में उच्च पदाधिकारी थे।अंग्रेजों ने उन्हें ‘राय साहब’ का खिताब भी दे रखा था।

दुर्गावती के ससुर  राय साहब थे भी पति क्रांतिकारी जो हर पल देश को दास्तां की जंजीरों से मुक्त करवाने के लिए  विह्वल रहते थे। 1920 में अपने पिता की मृत्यु के पश्चात वह खुलकर क्रांतिकारी नौजवानों को जुटाने में जुट गये। दुर्गवती भी अपने पति के कार्यों में सहायता करने लगी। उनका घर क्रांतिकारियों का आश्रय स्थल था। वह सभी की आवभगत करती। उनका आदर सत्कार करती ।अपनी मृदुल और मधुर वाणी से उन्होंने सभी विप्लवियो का मन जीत लिया था।विवाह के अवसर पर अपने ससुर से मिले 40000 रुपए और मायके से प्राप्त 5000 रुपए दुर्गावती ने क्रांतिकारियों के कार्यों  में ही लगा दिए।

शहीद करतार सिंह सराभा की 11 वीं पुण्यतिथि पर 16 नवंबर 1926 को लाहौर में एक भव्य सभा का आयोजन किया गया। दुर्गावती ने इस मौके पर अपने ओजस्वी भाषण में नौजवानों को शहीद सराभा की भांति देश के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए आगे का आह्वान किया। यहीं से क्रांतिकारी दल में उनका धड़ल्लेदार प्रवेश होता है।

साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में दो तरफ से जुलूस निकाले गए।एक का नेतृत्व  महामना मदन मोहन मालवीय कर रहे थे और दूसरे जुलूस का लाला लाजपत राय। जनरल  स्कॉट के आदेश पर ब्रिटिश पुलिस अफसर जोह्न् पी सांडरस ने लाला लाजपत राय पर ताबड़तोड़ लाठियां बरसाईं जिसके परिणाम स्वरूप लाला जी शहीद हो गये। लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या और इस प्रकार समूचे भारत के अपमान के प्रति देशभर में व्यापक रोष व्याप्त हुआ। जगह-जगह जलसे जुलूस हुए। हड़तालें और प्रदर्शन किए गए।

क्रांतिकारी दल ने भी अपने सदस्यों की एक आपदा बैठक बुलाई। इसमें इस अपमान का प्रतिशोध लेने का प्रस्ताव पास किया गया। यह महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता दुर्गावती ने की थी। उन्होंने इस प्रस्ताव के उद्देश्य को पूरा करने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी जाए ऐसा अनुरोध उन्होंने सभा के समक्ष दृढ़ता से रखा था। परंतु उन्हें यह मौका नहीं दिया गया। भगत सिंह और राजगुरु ने इस अभियान को चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में पूरा किया।

20 दिसंबर 1928 को दुर्गावती ने जिस बहादुरी से भगत सिंह और राजगुरु को सुरक्षित कोलकाता पहुंचाया वह उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि  ठहरायी गयी। उस दिन वह करोड़ों भारतीयों की दुर्गा भाभी हो गई । उनका नाम शहीद भगत सिंह, राजगुरु के साथ जुड़कर सदा सदा के लिए अमर हो गया ।अब क्रांति की बातें घर-घर होने लगी । दुर्गावती ने अपने पति के साथ मिलकर विमल प्रसाद जैन नामक क्रांतिकारी को कुतुब रोड दिल्ली में हिमालयनटॉयलेट्स की दुकान खोलने में वित्तीय सहायता की थी। अच्छा। यह एक छद्म नाम था । वास्तव में इस दुकान के पिछवाड़े बम बनाने का कारखाना था जहां से विप्लवियों को बम सप्लाई किए जाते थे। इसी दौरान क्रांतिकारी दल के एक वरिष्ठ सदस्य जतिनदा का सेंट्रल जेल लाहौर में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद निधन हो गया। वह अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध जेल में हड़ताल पर थे। लोग सड़कों पर निकल पड़े।अंग्रेजों के विरुद्ध रोष बढऩे लगा।पंजाब में ही नहीं देशभर में हड़ताल हुई। जलसे हुए। जुलूस निकाले गए।  लाहौर में उनके शव को लेकर एक विराट जुलूस निकाला गया। इस जुलूस का नेतृत्व दुर्गा भाभी ने किया। वह ही उनके शव को लेकर लाहौर से कोलकाता पहुंची। कोलकाता में भी निकाले गए जुलूस की अगुवाई दुर्गा भाभी  ने ही की थी । इन दिनों क्रांतिकारी दल ने एक निर्णय लिया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अंग्रेजों के बहरे कानों को खोलने के लिए दिल्ली के सेंट्रल असेंबली में  बम फेंकेगे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त केमाथे पर  दुर्गा भाभी ने खून से टीका लगाया।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंकने के बाद अपने आप को  पुलिस के समक्ष गिरफ्तार होने के लिए पेश कर दिया। उन पर मुकदमा चला। दुर्गा भाभी ने उसके लिए वकील की फीस को अदा करने के लिए अपने जेवर बेच दिए और इस प्रकार जुटाई तीन हजार रुपए की रकम वकील को अदा कर दी।

इन क्रांतिकारियों को जब लाहौर लाया गया तो बोहरा दंपति ने उन्हें पुलिस की गिरफ्त से आजाद करवाने के लिए एक योजना तैयार की थी। मगर वह सफल ना हो सकी। क्रांतिकारियों की धरपकड़ जोरों पर थी।  सुखदेव भी उसी घर में बमों सहित पकड़े गए जिसे बोहरा दंपत्ति ने उन्हें किराए पर ले कर दिया था। बहुत से क्रांतिकारी पकड़े जा चुके थे। कुछ अंडरग्राउंड हो गये। ऐसे समय में यह जरूरी था कि क्रांतिकारी कोई धमाका करें जिससे हुकूमत को यह पता चले कि क्रांतिकारी अभी सक्रिय हैं । पंजाब के पूर्व गवर्नर  लॉर्ड हेली पर दुर्गा भाभी ने बम लॉर्ड। लॉर्ड हेली तो बच निकला परंतु उसके कई साथी जिनमें टेलर भी था मारे गए। इस कांड में उन्हें गिरफ्तार करने के भरसक प्रयत्न किए गए। पर पुलिस कामयाब ना हो सकी। दुर्गा भाभी मुंबई निकल गई।

कुछ दिनों के पश्चात वह लाहौर वापस आ गई। 7 अक्टूबर1930 को एक दुखद घटना हुई। दुर्गा भाभी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके पति भगवतीचरण इस दुनिया में नहीं रहे। वह रावी तट पर एक घने जंगल में बम का परीक्षण कर रहे थे। बम उनके हाथों में ही फट गया जब उनके प्राण पखेरू उड़ गये। देश का महान क्रांतिकारी चल बसा। क्रांतिकारी वीरांगना पर वैधव्य जीवन का दारुण आन पड़ा ।परंतु इस दुख की घड़ी में भी वह  अडिग खड़ी रही। अपने पति के लक्ष्य की प्राप्ति केलिए वह  क्रांतिकारी कार्यों में और भी सक्रिय  हो गई।  पति का बलिदान उनका संबल बन गया। क्रांतिकारी गतिविधियों को और तेज करने का निश्चय कर लिया और दुर्गा भाभी ने अब पंजाब के गवर्नर की हत्या करने की योजना बनाई। मगर गवर्नर तो मुंबई मं  छुट्टी मना रहा था।  वह भी मुंबई पहुंच गई। कई दिन उसके बंगले की रेकी की। गवर्नर की कड़ी सुरक्षा थी। इसलिए अपनी योजना को कार्यान्वित करने में सफल न हो सकी। परंतु  दक्षिणी मुंबई में मेन रोड पर दुर्गा भाभी और उनके साथियों ने एक अंग्रेज दंपति को मौत के घाट उतार दिया और वहां से बच कर  लाहौर पहुंच गयी। इस हत्याकांड में पहली बार अंग्रेज सरकार के संज्ञान में यह आया के इस केस में एक महिला क्रांतिकारी भी शामिल थी। 7 अक्टूबर1930 को भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुना दी गई। देश में हाहाकार मच गया। भगतसिंह बचाओ आंदोलन चला। दुर्गा भाभी इसी इसकी सक्रिय सदस्य थी। उन्हें छुड़वाने के लिए बनी कमेटी ने अनेकों जलसे किए जुलूस निकाले और सरकार के पास करोड़ो हस्ताक्षर करवाकर पृवी काउंसिल में अपील भी दायर की गई। परंतु ब्रिटिश सरकार ने किसी की एक न सुनी। अंतत: इन 3 क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

क्रांतिकारियों पर दमन चक्र और भी तेज हो गया। कुछ क्रांतिकारी फांसी पर लटका दिए गए। कुछ को जेल में ठूंस दिया गया। चंद्रशेखर आजाद भी इलाहाबाद के पुलिस के घेरे में आ गए। उन्होंने जिस  माउजर से अपने प्राणों की आहुति दी, वह माउजर उन्हें दुर्गा भाभी ने ही भेंट किया था। फरारी, गिरफ्तारी और रिहाई के इस दौर में दुर्गा भाभी ने स्वयं पुलिस को सूचित किया कि उन्हें अमुक पते से गिरफ्तार किया जाए । उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।उन पर गवर्नरलॉर्ड हेली और मुंबई में अंग्रेज दंपति के घर के घर हमला और हत्या का मुकदमा चला जिसमें उन्हें 3 वर्ष की कारावास की सजा हुई। तत्पश्चात वह गाजियाबाद आ गई। भी पढ़ी-लिखी थी। बी ए  और प्रभाकर किया हुआ था। वहां वह प्यारेलालगल्र्स स्कूल में अध्यापिका हो गई।  1940 से 1982 तक लखनऊ में अपना स्कूल भी चलाया। मगर उनका दिल वहां नहीं लगा और फिर गुमनामी की चादर ओढ़ कर दोबारा गाजियाबाद  आ बसी।

एक छोटी सी अंधेरी कोठरी में 92 साल की एक वृद्धा की मृत्यु हुई। नगर वासियों को वृद्धा की मृत्यु के बाद पता लगा कि 15 अक्टूबर1999 को दम तोडऩे वाली यह वृद्धा कोई और नहीं प्रसिद्ध क्रांतिकारी दुर्गा भाभी थी। वह ऐसी वीरांगना थी जिन्होंने देश की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।  आज जब देश आजादी की 75 वीं वर्षगांठ पर आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है इस निस्वार्थ क्रांतिकारी वीरांगना के बलिदान को भी स्मरण किया जाए। उनके जन्म और पुण्यतिथि को अब से भव्य स्तर पर देश में मनाया जाना चाहिए।  उनके प्रति यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

 

डॉ. प्रतिभा गोयल

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