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मां कात्यायनी की महिमा

मां कात्यायनी की महिमा

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन । कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥ मां कात्यायनी चतुर्भुज रुप धारण करके शेर पर सवारी करती हैं । माता के एक हाथ में खड्ग होता है। दूसरे में कमल पुष्प धारण करती हैं। वह अपने तीसरे हाथ से भक्तों को अभय देती हैं। और चौथे हाथ से उन्हें मनचाहा वर प्रदान करती हैं.माता रानी की खास बात ये है कि वह अपने सच्चे साधकों को कभी निराश नहीं करती हैं। उनका कात्यायनी स्वरुप इस बात का प्रबल प्रमाण हैं। उन्होंने यह स्वरुप अपने महान भक्त ऋषि कात्यायन को संतुष्ट करने के लिए धारण किया था। जो कि देवी माता के परम भक्त थे। ऋषि कात्यायन जगदंबा को पुत्री के रुप में प्राप्त करने के लिए बरसों से तपस्या कर रहे थे। उसी दौरान दुनिया में महिषासुर राक्षस का उत्पात बढ़ गया था। जिससे देवतागण समेत पूरी सृष्टि त्रस्त हो चुकी थी। सभी माता से प्रार्थना कर रहे थे, कि वह आएं और महिषासुर के उत्पात से मुक्ति दिलाएं। तब देवी ने एक पंथ दो काज किया। उन्होंने कात्यायन ऋषि की पुत्री के रुप में जन्म लेकर उनकी मनोकामना पूरी की, और फिर उसी स्वरुप में देवताओं से उनके अस्त्र-शस्त्र लेकर महिषासुर का वध कर डाला। मां जगदंबा ने कात्यायनी का नाम धारण करके अपने पिता कात्यायन ऋषि का नाम पूरे संसार में अमर कर दिया। देवी के इस रुप की उपासना नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। इसलिए देश के कई हिस्सों में माता कात्यायनी को छठी माता भी कहते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में छठ परमेश्वरी के रुप में देवी कात्यायनी की ही पूजा की जाती है। यह तीन दिनों का बेहद कठिन व्रत है। जिसे करने से सभी तरह की मनोकामना पूरी होती है। भगवान कृष्ण के ब्रज क्षेत्र में भी माता कात्यायनी मुख्य देवी के रुप में प्रतिष्ठित हैं। राधा समेत समस्त गोपियों ने भी भगवान कृष्ण को पति के रुप में पाने के लिए माता कात्यायनी का पूजन किया था। जिन लड़कियों के जीवन में विवाह का योग नहीं बन पाता है। तो उन्हें देवी कात्यायनी माता की पूजा करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा माता कात्यायनी की उपासना गृहस्थों के लिए बेहद आवश्यक है। क्योंकि वह पारिवारिक सुख और शांति प्रदान करती हैं। माता के इस स्वरुप की पूजा करने से वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है। माता कात्यायनी को शहद और पान का भोग अर्पित किए जाने की परंपरा है। नवदुर्गा के सभी रुप एक आम स्त्री के जीवन के सभी चरणों को बताया गया हैं। माता रानी के पिछले पांच स्वरुप..यानी शैलपुत्री से लेकर स्कंदमाता तक के स्वरुपों में..एक नन्ही बालिका से लेकर बच्चे की माता होने की यात्रा तय करती हैं। इसी सिलसिले में आगे कात्यायनी माता रानी का वह स्वरुप है। जिसमें एक स्त्री अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर समाज का काम करने के लिए आगे बढ़ती है। पिछले सभी स्वरुपों में उसने एक पिता से लेकर परिवार तक की अपनी समस्त जिम्मेदारियों को पूरा कर दिया। और अब उसे समाज को महिषासुर जैसे दुष्टों से बचाना है। इसलिए वह अब घर से निकलती है, और देवताओं से अस्त्र शस्त्र प्राप्त करके राक्षसों से संघर्ष करती है। जय माता दी…

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