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गज़वा-ए-हिन्द पर प्रहार

गज़वा-ए-हिन्द पर प्रहार

केंद्र सरकार ने कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उससे जुड़े कई संगठनों पर अनलॉफुल ऐक्टिविटिज (प्रिवेंशन) ऐक्ट यानी UAPA के तहत 5 साल का बैन लगा दिया है। बैन से जुड़ी अधिसूचना 27 सितंबर को जारी हुई और उसके अगले दिन 28 सितंबर को तड़के गजट में पब्लिश हुई। बैन के बाद पीएफआई के दफ्तरों से उसके होर्डिंग, पोस्टर का उतरवाना शुरू हो चुका है। महाराष्ट्र के नवी मुंबई में भारी पुलिस बल की मौजूदगी में पीएफआई का होर्डिंग हटाया गया।

दरअसल सरकार के पास यूएपीए के तहत किसी संगठन को आतंकी संगठन घोषित करने का अधिकार होता है। यूएपीए की धारा 35 के तहत, केंद्र सरकार किसी संगठन के आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर उसे आतंकी संगठन घोषित कर सकता है। कोई भी संगठन जो आतंकी वारदात में शामिल हो, आतंकवाद को बढ़ावा देता हो या लोगों को आतंकवाद के लिए उकसाता हो तो उसे प्रतिबंधित किया जाता है। पीएफआई को इसी के तहत प्रतिबंधित किया गया है।

इतना ही नहीं, पीएफआई के 8 सहयोगी सगठनों पर भी  5 साल के लिए प्रतिबंध लगाया गया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, पीएफआई और उसके सहयोगी संगठनों का संबंध इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से है। इतना ही नहीं ये संगठन देश में एक विशेष समुदाय में कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहा है। साथ ही पीएफआई और इसके सदस्य बार-बार देश में हिंसक और आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं।

आतंकी संगठन घोषित होने के बाद केंद्रीय एजेंसियों और राज्यों की पुलिस को संबंधित संगठन के सदस्यों की गिरफ्तारी, खातों को फ्रीज करने और यहां तक कि संपत्तियों को जब्त करने का अधिकार होता है। यानी एजेंसियां अब पीएफआई और उसके नेताओं की संपत्तियों को जब्त भी कर सकती है। 2016 में जब केंद्र सरकार ने जाकिर नाइक के संगठन इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (IRF)  को प्रतिबंधित किया था तब नाइक के बैंक अकाउंट और अचल संपत्तियों को भी जब्त कर लिया था।

सियासत क्यों ?

पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया या पीएफआई एक चरमपंथी इस्लामिक संगठन है जो अपने को पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के हक में आवाज उठाने वाला सगठन बताता है।  बताया ये भी जाता है कि संगठन की स्थापना 2006 में नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट (NDF) के उत्तराधिकारी के रूप में हुई। संगठन की जड़े केरल के कालीकट से हुई और इसका मुख्यालय दिल्ली के शाहीन बाग में स्थित है।

एक मुस्लिम संगठन होने के कारण इस संगठन की ज्यादातर गतिविधियां मुस्लिमों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं और पूर्व में तमाम मौके ऐसे भी आए हैं जब ये मुस्लिम आरक्षण के लिए सड़कों पर आए हैं।  संगठन 2006 में उस वक्त सुखिऱ्यों में आया था जब दिल्ली के राम लीला मैदान में इनकी तरफ से नेशनल पॉलिटिकल कांफ्रेंस का आयोजन किया गया था।  तब लोगों की एक बड़ी संख्या ने इस कांफ्रेंस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। बात वर्तमान की हो तो आज देश में 23 राज्य ऐसे हैं जहां पीएफआई पहुंच चुका थी और अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा थी।  बात अगर इनकी कार्यप्रणाली के सन्दर्भ में हो तो ये बताना हमारे लिए भी खासा दिलचस्प है कि संगठन खुद को न्याय, स्वतंत्रता और सुरक्षा का पैरोकार बताता है और मुस्लिमों के अलावा देश भर के दलितों, आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार के लिए समय समय पर मोर्चा खोलता है।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पीएफआई में सब अच्छा ही अच्छा है।  तमाम विवाद हैं जिन्होंने समय समय पर पीएफआई के दरवाजे पर दस्तक दी है।  बात अगर एक संगठन के तौर पर पीएफआई की हो तो इसे सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) का बी विंग कहा जाता है। माना जाता है कि अप्रैल 1977 में निर्मित संगठन सिमी पर जब 2006 में बैन लगा उसके फ़ौरन बाद ही शोषित मुसलमानों, आदिवासियों और दलितों के अधिकार के नाम पर पीएफआई का निर्माण कर लिया गया था।  संगठन की कार्यप्रणाली सिमी से मिलती जुलती थी।  संगठन को बैन किये जाने की मांग 2012 में भी हुई थी।  दिलचस्प बात ये है कि तब खुद केरल की सरकार ने पीएफआई का बचाव करते हुए अजीबो गरीब दलील  दी थी।  केरल हाई कोर्ट को बताया था कि ये सिमी से अलग हुए सदस्यों का संगठन है जो कुछ मुद्दों पर सरकार का विरोध करता है।  ध्यान रहे कि ये सवाल जवाब केरल की सरकार से तब हुए थे जब उसके पास संगठन द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर आजादी मार्च किये जाने की शिकायतें आई थीं।

हाई कोर्ट ने सरकार के दावों को खारिज कर दिया था मगर बैन को बरकऱार रखा था। बात विवादों की चल रही है तो बता दें कि केरल पुलिस ने पीएफआई कार्यकर्ताओं के पास से बम, हथियार, सीडी और तमाम ऐसे दस्तावेज बरामद किये थे जिनमें पीएफआई अल कायदा और तालिबान का समर्थन करती नजर आ रही थी।  पीएफआई कितना खतरनाक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लव जिहाद से लेकर दंगा भड़काने, शांति को प्रभावित करने, लूटपाट करने और हत्या में इसके कार्यकर्ताओं का नाम आ चुका है।  इसमें कोई शक़ नहीं है की  संगठन एक आतंकवादी संगठन है जिसके तार कई अलग अलग संगठनों से जुड़े हैं।

ईडी और एनआईए को कार्यालय से जो दस्तावेज मिले हैं उसमें पता चला है कि यह संगठन 2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के सपने देख रहा था। केंद्रीय जांच एजेंसी को रेड के दौरान इंडिया 2047 नाम के दस्तावेज मिले हैं। इसमें क्या कैसे कब वाली सारी डिटेल मौजूद थी। इसके अलावा एजेंसी और राज्य पुलिस की रेड में बम, नेविगेटर और बड़ी मात्रा में कैश भी मिला था। एनबीटी के पास मौजूद एजेंसी के एक नोट से पता चलता है कि महाराष्ट्र के पीएफआई उपाध्यक्ष के कब्जे से सैकड़ों आपत्तिजनक दस्तावेजों के साथ-साथ ‘मिशन 2047’ से जुड़ा ब्रॉशर और सीडी भी बरामद हई है। इसमें भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने से जुड़ा कंटेंट है। यूपी के एक पीएफआई नेता से पेन ड्राइव मिला है, जिसमें आईएसआईएस, गजवा-ए-हिंद के वीडियो पाए गए हैं। इसके अलावा पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उसकी विंग के कार्यकर्ताओं के खिलाफ 1300 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। यही नहीं इसके सदस्य हिंसा, अपराध, गैरकानूनी गतिविधियों और आतंकवाद जैसे मामलों में लिप्त थे। केंद्र सरकार की ओर से की गई इस कार्रवाई पर दबी जबान में विरोध तो किया गया लेकिन ऐसा कोई बड़ा तबका इसके समर्थन में नहीं आया जो कह सके कि मोदी सरकार का यह कदम ठीक नहीं है। PFI के चेयरमैन ओ.एम. सलाम ने इसे राजनीति से प्रेरित जरूर बताया लेकिन वहीं कई मुस्लिम संगठनों ने इस  बैन का समर्थन ही किया। यहां तक की मोदी सरकार के हर फैसले का विरोध करने वाला विपक्ष भी इस फैसले के खिलाफ नहीं दिखा। हालांकि उसने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया की तुलना RSS से कर उसे भी बैन करने की मांग कर फजीहत जरूर मोल ले ली है।

 

निलाभ कृष्ण

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