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प्रेम और प्राण अभिन्न हैं

प्रेम और प्राण अभिन्न हैं

जीवन का परम आधार है प्रेम। प्रेम ऐसा तत्व है जिसके बिना जीवन ऐसा होता है जैसे शीतलता के बिना जल, ऊष्णता के बिना अग्नि और सुगंध के बिना पुष्प। आप जल पीते हैं और उस जल में यदि शीतलता नहीं है तो वह जल आपकी प्यास को नहीं बुझा पाएगा। समुद्र की तरफ भी जाइए आप, शीतलता के बिना प्यास नहीं बुझेगी। क्योंकि शीतलता ही जल का वह प्राण तत्व है जो प्यास को शांत करता है।

जीवन में प्रेम का वही स्थान है जो जल में शीतलता का है। कितना ही सुदीर्घ जीवन आप जिए, यदि उसमें प्रेम नहीं है तो वह जीवन, जीवन नहीं होगा। प्रेमशून्य हृदय के लिए दो उपमाएं दी हैं। प्रथम श्मशान के समान। श्मशान अर्थात् एक ऐसा स्थान जहां जीवन का अंतिम आश्रय स्थल शरीर भी विलीन हो जाता है, जहां जीवन का कोई चिन्ह शेष नहीं रहता। जहां सब कुछ जल के राख हो जाता है, जहां सब वीरान सा है, जहां भय है, जहां नि:स्तब्धता है।

प्रेम शून्य हृदय ऐसे है जैसे लोहार की खाल। उस हृदय में श्वासों का स्पंदन होने पर भी प्राण-रस नहीं होता, श्वास-नि:श्वास का सत्य होने पर भी जीवन का अभाव होता है।

प्रेम ऐसे है जैसे भोजन में नमक। नमक से ही भोजन में रस उतरता है। एक हजार तरह के व्यंजन आपके समक्ष रख दिए जाएं और यदि उनमें नमक की मात्रा न हो तो सब व्यंजन व्यर्थ और नीरस प्रतीत होंगे।

प्रेम जीवन को सरस बनाता है, प्रेम से जीवन में प्राण उतरते हैं, प्रेम से जीवन मधुर बनता है। प्रेम से छोटी-छोटी बातें विशिष्ट बन जाती हैं। प्रेम के अभाव में बड़ी-बड़ी बातें भी अपना अर्थ खो देती हैं।

भगवान महावीर कहते हैं- पिति सुन्नो पिसुण्णो।

प्रेम से शून्य मानव पशु के तुल्य है। वह जीवन तो जीता है, पर उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता। जीवन मिला है, इसलिए मनुष्य उसे भोगता है। उससे अधिक उसके लिए जीवन का औचित्य नहीं होता।

प्रेम का अर्थ है देना, विनम्रता पूर्वक देना। अहंकार यदि हृदय में दबा रहा तो देकर भी देने का अर्थ नहीं पूरा हो पाएगा। अहंकार मौजूद रहा तो प्रेम नहीं रहेगा। प्रेम के बिना लेन-देन अपनी गरिमा खो देंगे। आपके हृदय में जिस क्षण प्रेम जगता है, उस क्षण आप सब लुटा देने को उत्सुक हो जाते हैं, फिर आप यह नहीं देखते कि वस्तु मूल्यवान है या अल्प मूल्य। प्रेम प्रधान बन जाता है, लुटाना, देना, बांटना, बंट जाना आपके मन का मोद बन जाता है।

प्रेम के साथ जीवन में खुशी उतर आती है। हृदय जब प्रेम से पूर्ण बनता है तो मनुष्य की गति बदल जाती है, उठने-बैठने का ढंग बदल जाता है। जीवन सरस बन जाता है, जीवन की प्रत्येक क्रिया में, प्रत्येक व्यवहार में रस उतर आता है।

जहां प्रेम है, वहां प्रसन्नता है। जहां प्रेम है, वहीं प्रगति है, लक्ष्मी है। वहां अभाव में भी अभाव नहीं होता, विपन्नता में भी संपन्नता होती है। प्रेम समस्त गणितों को बदल देता है, समस्त क्रियाओं, व्यवहारों, व्यापारों के अर्थ बदल देता है।

प्रेम परम चमत्कारिक है। वह प्राकृति के विधि-विधानों को बदल देता है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। बस जरूरत है इस बात की कि हम उसे अपने भीतर खिला सकें और उसके खिलाने की पूरी-पूरी पात्राता हमारे पास है।

गणि राजेन्द्र विजय

प्रस्तुति: ललित गर्ग

 

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