ब्रेकिंग न्यूज़ 

नौसेना के पास अब ‘विक्रांत नाम का नगर’

नौसेना के पास अब ‘विक्रांत नाम का नगर’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विक्रांत नाम के पहले स्वदेश निर्मित 4500 टन के विमानवाहक पोत को देश को समर्पित किया और उसे कमीशन किया। नौसेना के पोत नष्ट नहीं हो जाते, बल्कि उनका पुनर्जन्म होता है, इसलिए इस पोत का नाम भी अपने पूर्व अवतार विक्रांत के नाम पर ही है, जिसे भारत ने अपने पहले विमानवाहक पोत के बतौर 1960 में ब्रिटेन से खरीदा था।

मौजूदा पोत की डिजाइन भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो ने किया है और उसे कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड ने बनाया है, जो जहाजरानी और बंदरगाह जहाजनिर्माण यार्ड मंत्रालय के तहत आता है। इसके करीब 75 प्रतिशत कल-पुर्जे स्वदेशी हैं। भारत में पहली दफा बने सबसे बड़े जहाज के निर्माण में सरकारी और निजी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियों और सैकड़ों एमएसएम ने अपनी भूमिका निभाई। बड़ी कंपनियों में भेल, बेल, सेल, एलऐंडटी, महिंद्रा समूह और टाटा घराने की कंपनियां थीं। इस तरह भारत विमानवाहक पोत बनाने वाले 6/7 देशों के क्लब में शामिल हो गया। इस पोत पर 30 विमानों, लड़ाकू विमानों- केए 31, एमएच 60आर और अत्याधुनिक हेलिकॉप्टरों का अड्डा होगा।

पोत पर कुल 1700 क्रू सदस्य 14 डेक पर स्थित करीब 2700 कंपार्टमेंट में रहेंगे। 2500 किमी. से ज्यादा लंबे केबल बिछाए गए हैं और बिजली उत्पादन इतना है कि समूचा कोच्चि शहर रोशन हो जाए। बेशक, यह इंजीनियरिंग का अनोखा नमूना है। प्रोजेक्ट मैनेजमेंट, स्वचालित निर्माण, मोड्यूलर डिजाइन चार एलएम 2500 गैस टर्बाइन इंजन से संचालित हैं। इससे इस पोत को ‘टाउनशिप या नगर’ कहना उचित है।

स्वदेशी मोर्चे पर यह बड़ी छलांग है। भारतीय उद्योग जगत ने इस पोत को मोटे तौर पर स्वदेशी बनाए रखने में अपना कंधा लगा दिया। पोत निर्माण की इस गतिविधि और उसके हजारों उपकरणों के उत्पादन में भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 19,000 करोड़ रुपए का निवेश हुआ। शिपयार्ड में भविष्य में इससे भी भारी युद्धपोत और वाणिज्यिक पोत के निर्माण का भरोसा बन गया है। भविष्य में कंटेनर और भारी वाहकों के निर्माण की अच्छी संभावना है। समझा जा सकता है कि बड़े सूखे डेक/शिपवे पहले ही निर्माणाधीन हैं। यह निकट भविष्य में भारत की अर्थव्यवस्था को 50 खरब डॉलर की बनाने के मामले में अच्छा शकुन है। भारत को समुद्री महाशक्ति बनने के लिए वाणिज्यिक शिप-निर्माण पर बड़ा जोर देने की दरकार है। सागरमाला परियोजना इस दिशा में कई मसलों को छूता है।

हालांकि एक वक्त शिप निर्माण फंड की कमी से धीमा पड़ गया था, लेकिन पीएम मोदी की मौजूदा सरकार ने देश में रक्षा तैयारी पर बहुत जरूरी जोर मुहैया कराया। लंबित परियोजनाओं को फंड मुहैया कराया गया, जिसके नतीजे दिख रहे हैं। ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत युद्ध प्लेटफॉर्म और उपकरणों के स्वदेशी निर्माण की दिशा में उनके पिछले पांच साल में काफी प्रगति हुई है। इसलिए विक्रांत को उनके द्वारा कमीशन किया जाना देश, सशस्त्र बलों और खुद उनके लिए काफी खास है। सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) ने देश में अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तैनाती की मंजूरी दे दी है।

विमान वाहक पोत के निर्माण में हासिल विशेषज्ञता और उस प्रक्रिया में रोजगार सृजन को कायम रखने की दरकार है और दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत आइएसी-2 के निर्माण का फैसला जल्दी लिए जाने की जरूरत है। इसी तरह, सशस्त्र बलों की जरूरत करने के बाद स्वदेश निर्मित हथियारों और प्लेटफॉर्म को विदेशी मुद्रा की कमाई के लिए निर्यात किया जा सकता है जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आ सकती है।

दुनिया में भू-राजनैतिक परिदृश्य और करीब के भारत-प्रशांत क्षेत्र पर नजर डालने से यह समझा जा सकेगा कि स्वदेशी पर भारत का जोर और विक्रांत का कमीशन किया जाना कितना प्रासंगिक है। आर्थिक ओर सामरिक ताकत के तौर पर चीन का उभार, उसका हमारे पश्चिमी पड़ोसी पाकिस्तान के साथ करीबी गठजोड़ दो फौरी चिंताएं हैं।

इन दोनों देशों के जमीनी सीमा विवाद के कारण दुश्मनी वाले रिश्ते हैं, जो जल्दी खत्म होते नहीं लगते। चीन ने पाकिस्तान को काफी हद तक हथियारों से लैश किया है। वह 8 पनडुब्बियों और 3/4 युद्धपोत के निर्माण और आपूर्ति की प्रक्रिया में है। चीन/उत्तरी कोरिया में न्यूक्लीयर अस्त्रों के जखीरे और मदद से पहले ही पाकिस्तान एटमी देश बन गया है। पिछले दशक में चीन ने भारत के पड़ोस में आर्थिक दबाव पैदा किया है और बंदरगाहों, जमीनी अड्डों और हवाई अड्डों पर कर्ज का जाल बिछाकर काबिज हो गया है ओर अपने पांव मजबूती से जमा लिए हैं। इन सभी जायदाद का आर्थिक और सामरिक तौर पर दोहरा इस्तेमाल है।

श्रीलंका हंबनटोटा, पाकिस्तान में ग्वादर, मयांमार में क्यूक फिउ, मालदीव में कई द्वीप के अलावा मॉरीशस, सिचल्स, मेडागास्कर, अफ्रीका के पूर्वी तट के देशों में बढ़ते असर कुछ मिसालें हैं हिंद महासागर क्षेत्र की, जिससे भारत की घेराबंदी और भारतीय नौसेना की गतिविधियों के दायरे सिकुडऩे का अंदेशा है। समुद्री लुटेरों के खिलाफ अभियान के बहाने चीन के पोत और पनडुब्बियां हिंद महासागर में हर जगह मौजूद हैं और अदन की खाड़ी में दजिबौती में बाकायदा लंबा-चौड़ा अड्डा है। ये भारत की गतिविधियों के लिए चुनौतियां हैं, जो संचार और व्यापार की समुद्री राहों में बिछी हैं।

इसके अलावा, हिंदमहासागर क्षेत्र में नशीले पदार्थों और मानव तस्करी, समुद्री डकैती, आतंकवाद, प्राकृतिक तथा मानव निर्मित आपदाएं, अवैध-बिन बताए मछली मारने जैसी दूसरी गैर-पारंपरिक खतरे हैं। हर वक्त हिंद महासागर क्षेत्र में तकरीबन 34 देशों के युद्धपोत और सालाना करीब 1,30000 वाणिज्य पोत होते हैं, जो भारत के व्यापार रूटों से गुजरते हैं।

अमेरिका और चीन के बीच राष्ट्रीय ताकत के व्यापक फर्क और चीन के अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी पडऩे से देखा गया है कि चीन का रुख आक्रामक हुआ है। ताइवान के पास सैन्य ताकत के इजहार और हाल के दौर में प्रशांत क्षेत्र में उसकी जबरदस्ती से उसके आक्रामक रुख में इजाफा ही दिख रहा है। उसने पहले ही तीन विमानवाहक पोत और हाइपरसोनिक मिसाइल बना ली हैं। हाल के रूस-यूक्रेन संघर्ष और रूस के साथ उसके गठजोड़ से भी उसकी दादागीरी में इजाफा हुआ है। अमेरिका की एक-ध्रुवी दबदबा खत्म होता लगता है और चीन ही दुनिया को दो-ध्रुवीय बनाने का ख्वाब देख रहा है, जो छोटे देशों को इधर या उधर रहने पर मजबूर कर रहा है।

बदलती विश्व व्यवस्था के ऐसे परिदृश्य में अराजकता के बढऩे की आशंका है। इसलिए यह जरूरी है कि भारत इस संघर्ष से अलग रहकर अपने आर्थिक हितों की रक्षा करे। यह सिर्फ अर्थव्यवस्था को मजबूत करके संभव नहीं है, बल्कि खासकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसे अपनी ताकत दिखानी होगी।

इसी संदर्भ में भारत को मजबूत सैन्य ताकत बनाना हमारे अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि उन देशों की भी, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हैं। विक्रांत ऐसा ही नौसेना के बेड़े में इजाफा है, जिससे भारत को इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में मदद मिलेगी। भारत के प्रतिकूल व्यापार संतुलन के मद्देनजर उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की दरकार है और इसलिए उसकी सुरक्षा की भी जरूरत है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दुश्मनों की गतिविधियों पर भी अंकुश लगेगा, जो इस क्षेत्र की आकांक्षाओं में दखल दे रहे हैं।

 

 

वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा
(लेखक इंडिया फाउंडेशन के ट्रस्टी और पश्चिमी नौसेना कमांड के कमांडर इन चीफ रहे हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published.