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रक्षा उत्पादन में तेजी से आत्मनिर्भर होता भारत

रक्षा उत्पादन में तेजी से आत्मनिर्भर होता भारत

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड को  भारतीय वायुसेना का हिस्सा बना दिया गया। इसका निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने किया है। यह भारतीय सशस्त्र सेवाओं के स्वदेशीकरण की प्रक्रिया की दिशा में एक बड़ा कदम है। जो कि यह संदेश देता है कि भारत अब विमानों के निर्माण में बहुत तेजी से सफलता की सीढिय़ां चढ़ रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वदेशीकरण का मतलब यह नहीं है कि हम बाकी दुनिया से कट जाएंगे, बल्कि इसका अर्थ है कि दुनिया भर में हो रहे शोध कार्यों का प्रयोग हम भारत की जमीन पर करेंगे। इसी साल अप्रैल 2022 में रक्षा मंत्रालय ने आत्मनिर्भर भारत अभियान को आगे बढ़ाने के लिए  तीसरी सूची जारी की है। पिछली तीन सूचियों में 309 उत्पादों के भारतीयकरण का कार्य पूरा हो चुका है। जिसमें आर्टिलरी गन, कम दूरी की सतह से वायु मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें, गश्ती जलपोत, नई पीढ़ी के कॉर्वेट, हवाई चेतावनी प्रणाली, टैंक इंजन, रड़ार, रॉकेट, नौसेना के लिए हेलीकॉप्टर, सेंसर, हथियार और गोला बारूद, एंटी-शिप मिसाइल, विकिरण विरोधी मिसाइलें समेत कई रक्षा उत्पाद शामिल हैं। लेकिन एयरक्राफ्ट बनाने के लिए बहुत उच्च तकनीक की जरुरत होती है। यहां तक कि इसके लिए स्पेस शिप बनाने से ज्यादा उच्च श्रेणी की तकनीक की जरुरत पड़ती है। इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हायपरसोनिक, डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस जैसी उच्च श्रेणी की तकनीक की समझ विकसित करनी पड़ती है। दुनिया के ज्यातर देश विमानन तकनीकों को आसानी से शेयर नहीं करते हैं। इन सब कारणों से विमानन तकनीक विकसित करना किसी भी देश के लिए सर्वोत्तम निवेश साबित होता है। आइए आपको बताते हैं कि इसमें हम फिलहाल कहां तक पहुंचे हैं।

 

सरकारी नीति और रक्षा बजट

साल 2022-23 के लिए भारत का कुल रक्षा बजट 1.03 लाख करोड़ यानी 13.7 बिलियन डॉलर था। इसका विशाल रक्षा बजट का 68 फीसदी हथियार और रक्षा प्रणालियों के स्थानीय रुप से उत्पादन के लिए खर्च किया जा रहा है। जिसकी वजह से आप रक्षा उत्पादों के भारतीयकरण में तेजी देख रहे हैं। द्रुत गति से विकास के लिए आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा उत्पादों का भारतीयकरण आवश्यक है।  रक्षा उत्पादन में प्राइवेड इंडस्ट्री को भी भागीदारी देने और शोध को बढ़ावा देने के लिए रक्षा बजट का एक चौथाई हिस्सा यानी 25 फीसदी अकादमिक, स्टार्ट अप और निजी क्षेत्र के लिए रखा गया। हाल ही  में सात नए सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रमों (DPSUs) का गठन किया गया।  पुराने आयुध कारखानों के आधुनिकीकरण के लिए 1310 करोड़ यानी 175 मिलियन डॉलर रखे गए। 2500 करोड़ रुपए यानी 334 मिलियन डॉलर का फंड आकस्मिक आवश्यकताओं के लिए रखा गया। रक्षा क्षेत्र में नए अविष्कार यानी इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस के लिए 60 करोड़ रुपए रखे गए।

इस तरह के बजट प्रावधानों ने रक्षा क्षेत्र में तकनीकी विकास, नए तरह के शोध का माहौल तैयार किया। शोध संस्थानों, अकादमिक संस्थानों, अविष्कारकर्ताओं, स्टार्टअप को मदद मिली। डिफेन्स टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (DTIS) को 23 करोड़ रुपए दिए गए। जिससे कि निजी संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के बुनियादी परीक्षण ढांचों की स्थापना की जा सके। स्पेशल पर्पज व्हिकल यानी (SPV) बनाने के लिए रक्षा अनुसंधान विकास केन्द्र (DPSUs) और निजी कंपनियों के बीच सहमति बनी। निजी क्षेत्र द्वारा किए जा रहे शोध और जांच को मान्य बनाने के लिए एक नोडल छतरी गठित की गई। मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए ड्यूटी की दरों को फिर से संशोधित किया गया। हेलीकॉप्टर और विमानों के कुछ खास तरह के पुर्जों के आयात के लिए सीमा शुल्क की दरों को आसान बनाया गया। यह सभी नए नियम 1 मई 2022 से प्रभावी कर दिए गए। इसी कड़ी में कुछ रक्षा उत्पादों पर जारी आयात शुल्क की रियायतों को 31 मार्च 2023 तक बंद करने की घोषणा भी कर दी गई है। स्थानीय स्तर पर उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए जीएसटी के नियमों में भी बदलाव किए गए। रक्षा उत्पादों को बढ़ावा देने से उनके निर्यात का रास्ता भी साफ होगा और लागत में कमी आएगी। इसकी वजह से नई नौकरियों के अवसर प्राप्त होंगे और देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और साल 2025 तक 175000 करोड़ यानी 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। वहीं उच्च तकनीक के क्षेत्र में विदेशी निर्माताओं को संयुक्त उद्यम और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें से कुछ संयुक्त उद्यम रक्षा उत्पादों के निर्यात के लिए मददगार साबित होंगे। रक्षा निर्माण गलियारे का कार्य पहले से ही जारी है, जिससे यह संदेश पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि हमारा रक्षा बजट भारत को रक्षा उत्पादों का केन्द्र बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। रक्षा उत्पादों के घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए डिफेन्स एक्विजिशन प्रोसिजर (DAP 2000) को लगातार परिष्कृत किया जा रहा है।

 

लड़ाकू विमान उत्पादन के लिए तैयार किया जा रहा माहौल

स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस के दो सक्वैड्रन देश की सुरक्षा में तैनात हो चुके हैं। 83 हल्के MK1A लड़ाकू विमानों का आर्डर दिया जा चुका है। इसकी पहली फ्लाइट इस साल के आखिर मे उम्मीद की जा रही है और इसकी तैनाती साल 2024 तक पूरी हो जाएगी।  इस हल्के विमान का दो सीटों वाला मॉडल भी ट्रेनिंग के लिए तैयार किया जा रहा है। मध्यम भार वाले लड़ाकू विमान MK2  का डिजाइन भी तैयार किया जा चुका है। इसका पहला परीक्षण साल 2023 के आखिर तक संभावित है। यह मध्यम भार वाला विमान साल 2028 तक सेना का हिस्सा बन जाएगा। तब तक MKvA की सप्लाई पूरी हो चुकी होगी। भारत का यह एयरक्राफ्ट राफेल की तरह तक 4.5 पीढ़ी का विमान है। भारतीय वायुसेना को जगुआर और मिराज 2000 को पूरी तरह रिप्लेस करने के लिए 200 की संख्या में MK2 लाइट कांबेट एयरक्राफ्ट की आवश्यकता है। हल्के लड़ाकू विमानों की दो इंजन वाली एक दूसरी किस्म भारतीय नौसेना के लिए तैयार की जा रही है। इसके कई महत्वपूर्ण हिस्से प्राइवेट सेक्टर ने तैयार किए हैं। जिसे बाद में एक साथ एसेंबल किया जाएगा। वायुसेना को पूरी तरह सुसज्जित करने के लिए हमें प्रतिवर्ष 24 विमान बनाने की जरुरत है।

पांचवी पीढ़ी के एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयक्राफ्ट (AMCA) का शुरुआती डिजाइन रिव्यू (PDR) पूरा हो गया है। डिजाइन का दूसरा कठिन हिस्सा यानी क्रिटिकल डिजाइन रिव्यू (CDR) इस साल यानी 2022 के आखिर तक पूरा होने की संभावना है। इस एयरक्राफ्ट के निर्माण का काम साल 2024 तक पूरा हो जाएगा और साल 2025 में इसकी पहली फ्लाइट हो सकती है। इन सभी के लिए सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी की सहमति प्राप्त करने के लिए मार्च 2022 में ही कदम उठा लिए गए हैं। इन प्रोजेक्ट्स के मार्ग में किसी तरह की औपचारिकता बाधा नहीं बनने दी जाएगी। इन विमानों के लिए धातु काटने का काम इसके बाद शुरु हो जाएगा। विमानन ढांचे का ज्यादातर हिस्सा भारत में ही तैयार किया जा रहा है। हालांकि एरो-इंजन जैसे कुछ सिस्टम अभी भी आयातक करने की जरुरत पड़ रही है। एवियोनिक्स और एयरबॉर्न रडार जैसे सिस्टम दोस्ताना रिश्ते वाले देशों की कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर में तैयार किया जा रहा है। ज्यादातर हथियार भारत में तैयार किए गए हैं। छठी पीढ़ी की तकनीक पर तेजी से काम किया जा रहा है। इस प्रकार हमारे सामने यह परिदृश्य यह लगभग स्पष्ट होता जा रहा है कि देश में लड़ाकू जहाजों के निर्माण का माहौल पूरी तरह तैयार हो गया है। हमने साल 1960 से अब तक एक लंबी यात्रा तय की है, जब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने एचएफ-24 नाम का जहाज तैयार किया था।

 

हेलीकॉप्टर निर्माण में भारत की कामयाबी

पिछले कई दशकों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने कई तरह के हेलीकॉप्टरों का निर्माण किया है। 300 एसए 315बी और एसएस 316बी Alouette III  जैसे हेलीकॉप्टरों का निर्माण किया गया। जिन्हें हम चीता, लांसर, चीतल, चेतल और चेतन के नाम से जानते हैं। इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल हमारी तीनो सैन्य बल, तटरक्षक बल और कई निजी संस्थाएं कर रही हैं। इस दिशा में HAL द्वारा 340 एडवांस लाइट हेलीकॉप्टरों (ALH) ध्रुव का निर्माण एक बड़ी सफलता थी। इसमें से कुछ हेलीकॉप्टरों का निर्यात भी किया गया। इसके अलावा 90 की संख्या में रूद्र नाम के एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर बनाए गए, साथ ही 75 और रूद्र हेलीकॉप्टरों के निर्माण का आदेश दिया जा चुका है। इसी महीने लांच हुए भारतीय वायुसेना के पहले लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड का पूरा स्क्वैैड्रन जोधपुर में तैयार किया गया। भारतीय सेना को भी जल्दी ही एलसीएच दिया जाएगा। वायुसेना और थलसेना के लिए 200 एलसीएच की आवश्यकता है।

इसके साथ ही स्वदेशी लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर भी सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं। इसे भी भारी संख्या में तीनों सेनाओं को दिया गया है। एचएएल की योजना के मुताबिक आने वाले कुछ वर्षों में 1000 सैन्य हेलीकॉप्टर बनाए जाएंगे। एचएएल जल्दी ही IMRH यानी इंडियन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर तैयार कर रहा है, जो कि मीडियम लिफ्ट हेलीकॉप्टर हैं। इनका उपयोग हवाई हमला, पनडुब्बी विरोधी, सैन्य बलों को यहां से वहां ले जाने, थलसेना के विरुद्ध, महत्वपूर्ण लोगों की यात्रा जैसे कई कार्यों में किया जा सकता है। IMRH यानी इंडियन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर तैयार हो जाने के बाद यह  Mi-17 और Mi-18 हेलीकॉप्टरों का स्थान लेगा। जिसके बाद भारत को विदेश के हेलीकॉप्टर खरीदने की जरुरत नहीं पड़ेगी।

 

ट्रांसपोर्ट विमानों के उत्पादन में तेजी से बढ़ोत्तरी

EADS-CASA के बीच 3 बिलियन डॉलर कीमत की डील साइन की गई है। जिसके तहत भारतीय वायुसेना के लिए 56 की संख्या में C-295MW ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट तैयार किए जाएंगे। जिन्हें  कि Avro 748 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की जगह तैनात किया जाएगा। तटरक्षक बलों को भी ऐसे 6 विमानों की जरुरत है। इसमें से 16 एयरक्राफ्ट पूरी तरह तैयार करके मंगाए जाएंगे, जबकि बाकी 40 का निर्माण भारत में ही टाटा कंपनी के द्वारा अगले 10 सालों में किया जाएगा। ऐसा पहली बार होगा कि भारत में ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट किसी निजी कंपनी के द्वारा तैयार किया जाएगा। इसके पहले भारत ने HS-748 और Dornier 228 का निर्माण लाइसेंस प्रक्रिया के तहत किया गया था। डॉर्नियर का भारतीय स्वरुप हिंदुस्तान-228 का इस्तेमाल नागरिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। इस बीच सीएसआईआर नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेट्रीज (NAL) ने सारस नाम का 14 सीट का एयरक्राफ्ट बनाया है। इसी श्रृंखला में आगे 19 सीटों वाला सारस एमके-2 के निर्माण की प्रक्रिया अभी जारी है।

भारत की क्षेत्रीय नागरिक हवाई सेवाओं के लिए इंडियन रिजनल जेट (IRJ) की महत्वाकांक्षी नागरिक एयक्राफ्ट परिजोयना को पूरा करने में भी नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेट्रीज (NAL) लगा हुआ है। इस विमान में 80 से 100 यात्रियों को बिठाने की क्षमता होगी। भारत में इसके निर्माण की लागत अंतरराष्ट्रीय कीमतों से बीस फीसदी सस्ती है। इस प्रकार भारत में ट्रांसपोर्ट विमानों के निर्माण के लिए माहौल तैयार किया जा रहा है।

 

ज्यादा ताकत झोंकने से काम हुआ तेज

रक्षा अनुसंधान और शोध संस्थान यानी DRDO ने नेत्र नाम का एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम विकसित किया है। इसको Embraer ERJ 145 विमानों पर स्थापित किया गया है। इसमें से तीन सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं।  जबकि 6 को एयर इंडिया से लिए गए  Airbus A320 विमान पर लगाया जा रहा है। यह काम फ्रांस में चल रहा है। इन छह वार्निंग सिस्टम की निर्माण का लागत 1100 करोड़ रुपए आ रही है। यह छह एयरबस भारत के लिए शक्तिशाली indigenous Active Electronically Scanned
Array (AESA) रडार का रुप धारण कर लेंगे।  इस परियोजना के पूरा होने में 6 से 8 साल का वक्त लगने वाला है। इस बीच डीआरडीओ को नेत्र के एक स्थायी रडार सिस्टम के निर्माण का काम भी पूरा करना है।  इसके पहले डीआरडीओ ने  Airbus A330 पर नेत्र रडार लगाने की योजना बनाई थी। लेकिन बाद में इसे स्थगित कर दिया गया। दिलचस्प यह है कि पाकिस्ता ने चार Saab 2000 Erieye रडार और चार Shaanxi Y-8 ZDK-03 का इस्तेमाल करता है। जिसे पाकिस्तानियों ने काराकोरम ईगल का नाम दिया है। वहीं भारतीय वायुसेना तीन EL/W-2090 फाल्कन रडारों को Beriev A-50 पर लगाया है। उसे दो और ऐसे सिस्टम की जरुरत है। भारत में बना यह अत्याधुनिक रडार मेक इन इंडिया कार्यक्रम की बड़ी सफलता है। आने वाले भविष्य में भारत की चुनौतियों को देखते हुए इस तरह के  10 अलग अलग तरह के एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम की जरुरत पडऩे वाली है।

भारतीय वायुसेना के पास अभी छह Ilyushin-78 फ्लाइट रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट हैं। जबकि इस तरह के छह और रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट की तलाश साल 2006 से की जा रही है। इस दिशा में पहले की दो कोशिशें असफल साबित हुई हैं, क्योंकि उसमें लाइफ सायकिल और प्रक्रिया की बाधाएं सामने आ रही थीं। इस के लिए Airbus A-330 MRTT, IL-78 और Boeing KC-64A के बीच प्रतियोगिता है। डीआरडीओ ने पहले स्थानीय स्तर पर Airbus A-330 को बदलकर रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट बनाने की योजना तैयार की थी। लेकिन अब पैसेंजर एयक्राफ्ट को रिफ्यूलिंग के उद्देश्य से बदलने की योजना तैयार की गई है। जिसमें कार्गो और ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी शामिल होगी। इसके लिए एचएएल और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्री के बीच एक डील हुई है। जिसके तहत यह दोनों मिल कर पैसेंजर एयरक्राफ्ट को कार्गो और रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट का रुप देंगी।  इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्री यानी IAI इस तरह के विमानों की रिमॉडलिंग के काम में माहिर है और वह पहले भी इस तरह के प्रोजेक्ट कर चुकी है। इस काम के लिए  Il-78 विमानों का इस्तेमाल किया जा सकता है। रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट दरअसल कम से कम समय में लड़ाकू विमानों में ईंधन भर देने के लिए जाना जाता है।

 

एयरक्राफ्ट उत्पादन में भारत के निजी क्षेत्र का बड़ा कदम

भारत में कुछ बड़े निजी औद्योगिक संस्थान रक्षा विमानन तकनीक के काम में महारत हासिल कर चुके हैं। टाटा एयरोस्पेस एंड डिफेन्स AH-64 अपाचे कॉम्बैट हेलीकॉप्टर के लिए फ्यूज बना रहा है। यह संस्थान बोइंट के CH-47 चिनूक हेलीकॉप्टर के लिए एयरोस्ट्रक्चर भी बना रहा है। हैदराबाद स्थित टाटा एडवांस्ड सिस्टम लिमिटेड अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन कंपनी के S-92 हेलीकॉप्टरों के लिए केबिन बना रहा है और पूरी दुनिया में सप्लाई कर रहा है। यही नहीं दुनिया भर में जाने माने अमेरिका के एफ-16 विमानों के लिए पंख भी यही भारतीय कंपनी तैयार कर रही है।  निजी क्षेत्र की कई भारतीय कंपनियां डिफेन्स इलेक्ट्रोनिक्स, विशाल एयरो कॉम्पोनेन्ट, उच्च तकनीकी पुर्जे और सब सिस्टम तैयार कर रही हैं। डायनामेटिक टेक्नोलॉजी ने सुखोई-30 एमकेआई विमानों के पंख तैयार करता है। हैदराबाद की वीईएम टेक्नोलॉजी ने एलसीए तेजस के लिए सेन्ट्रल फ्यूज तैयार किया है। भारत में कई मध्यम दर्जे की कंपनियां और स्टार्टअप रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में कदम रख रहे हैं।

 

चालक रहित विमानन क्षेत्र में भी हुआ है बहुत काम

चालक रहित विमान आज पूरी दुनिया में सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं। अब तो ज्यादातर हवाई कार्य चालकरहित विमानों के जरिए ही संपन्न किए जाते हैं। चालक वाले विमान तो कभी कभी ही उड़ान भरते हैं। चालकरहित विमान तो हिचकोले खाकर चलते हुए समुद्री जहाजों पर भी अब लैंड होने लगे हैं। चालकरहित विमानों के जरिए रिफ्यूलिंग भी करा के भी देखा जा चुका है। चालकरहित बमवर्षकों का विकसित किया जा रहा है। भारत समेत दुनिया के कई देश धड़ल्ले से ड्रोन विमानों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चालक रहित और चालक सहित विमानों के बीच के तालमेल (MUMT) की भी टेस्टिंग हो चुकी है।

भारत में एचएएल और बेंगलुरु की एक नई कंपनी न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी के बीच ड्रोन तकनीक को लेकर समझौता हुआ है। वह दोनों मिलकर 350 किलोमीटर तक के क्षेत्र को कवर करने वाला युद्धक ड्रोन तकनीक पर काम कर रहे हैं। आगे चलकर इसका अटैक एरिया 800 कि.मी तक भी बढ़ाया जा सकता है। इसे कैट्स वारियर और कैट्स हंटर और कैट्स एयर लांच्ड फ्लेक्सिबल एस्सेट और कैट्स इंफिनिटी का नाम दिया गया है। इसमें से कैट्स वारियर (CW) ड्रोन को धरती पर समुद्र में एयरक्राफ्ट करियर से उड़ाया जा सकता है।  यह भारतीय वायुसेना के तेजस, सुखाई और जगुआर जैसे विमानों के साथ तालमेल बनाकर दुश्मन पर कहर बरसा सरता है। कैट्स वारियर पर वायु से सतह और हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस होता है। इसमें अंदर भी शस्त्रागार मौजूद होता है। एचएएल ने इसमें टर्बोफैन इंजन लगाया है। जिसकी वजह से इसकी गति और ताकत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।  इसके अलावा भारत ने सोलर पावर से चलने वाला कैट्स इनफिनिटी नामक ड्रोन तैयार किया है जो कि तीन महीने तक हवा में रह सकता है और 65 हजार फुट की ऊंचाई तक पहुंच सकता है। यह सभी चालकरहित विमान दुश्मनों पर हमला और निगरानी दोनों कर सकते हैं।

 

 ड्रोन निर्माण के लिए बनाया देश में सुचारु माहौल

पिछले काफी सालों से एयरोनॉटिकल डेवलममेन्ट इस्टैबलिशमेन्ट ने देश में चालकरहित विमान तैयार किए। जिसमें लक्ष्य और निशांत प्रमुख थे। तापस और घातक ने भी अच्छा काम किया। डीआरडीओ ने कुछ निजी कंपनियों को चालकरहित विमान बनाने के लिए तैयार किया। हैदराबाद में अडानी एंटरप्राइजेज और इजरायल के एल्बिट एडवांस सिस्टम के बीच एक ज्वाइंट वेंचर बनाया गया है। जो कि देश में नई नई रक्षा तकनीकों के लिए डिजाइन और डेवलपमेन्ट सेन्टर तैयार कर रहा है। हैदराबाद में दोनों ने मिलकर देश के पहले निजी चालकरहित विमान उत्पादन केन्द्र का निर्माण कर रहे हैं। जिसमें इजरायल से बाहर पहली बार Hermes 900 ड्रोन्स का उत्पादन किया जाएगा।

इसके अलावा भी कई  निजी संस्थान सैन्य बलों के लिए ड्रोन उत्पादन के काम में लगे हुए हैं। जिसमें न्यूस्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी, पारस एयरोस्पेस, थानोस टेक्नोलॉजी और ऑटो माइक्रो यूएएस जैसी कई कंपनियां शामिल हैं।

देश में कई जगहों पर ड्रोन तकनीक के प्रदर्शन के लिए कार्यक्रम हुए हैं। जिसमें पीएम मोदी ने भी शिरकत की है। जिससे पता चलता है कि ड्रोन तकनीक में उनकी निजी दिलचस्पी है। इस बीच निजी क्षेत्र बिल्कुल सही समय पर मध्यम आकार के ड्रोन तैयार करने की कोशिश में लगा हुआ है। ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया ने जानकारी दी है कि भारत में ड्रोन का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन अभी भी बैटरी, मोटर, सेंसर, सेमीकंडक्टर, जीपीएस, कैमरा जैसी चीजें बाहर से मंगानी पड़ रही हैं। देश में जैसे जैसे ड्रोन उत्पादन तेज होता जा रहा है, उसे देखते हुए भारत में इन सभी चीजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरु करना पड़ेगा। भारतीय वायुसेना के मेहर बाबा-1 प्रतियोगिता में ड्रोन बनाने वाले स्टार्टअप्स की पहचान की गई और अब मेहर बाबा-2 जारी है।

 

माइक्रोचिप तकनीक

विमानन के लिए माइक्रोचिप तकनीक सबसे कठिन होती है। इलेक्ट्रो ऑप्टिकल सिस्टम, वायुयान के हथियार, डीईडब्ल्यू, कम्युनिकेशन यंत्र जैसे कई तरह के सिस्टमों के स्वदेशीकरण की राह में माइक्रोचिप तैयार करना सबसे बड़ी मुश्किल के रुप में सामने आता है। जिसकी कमी पूरी दुनिया में देखी जाती है। इसलिए भारत ने माइक्रोचिप के उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करने का फैसला किया है। ड्रोन बनाने के लिए जाम-प्रूफ, डाटा लिंक्ड माइक्रोचिप की जरुरत होती है। जिसके बिना विमानन के क्षेत्र में काम कर पाना संभव ही नहीं होता।

 

स्वदेशी एयरो इंजन का काम कठिन

डीआरडीओ का गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेन्ट पिछले कई दशकों से एक टर्बो जेट इंजन बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है। दुनिया में ऐसे बेहद कम एयरो इंजिन उत्पादनकर्ता हैं, जिनके पास यह तकनीक उपलब्ध है।  दुनिया भर में ज्यादातर इंजन ज्वाइंट वेंचर या कन्सोर्टियम में  बनाए जाते हैं। मूल रुप से यह इंजन फास्ट फाइटर जेट और बड़ी एयरलाइन इंजिन के जैसे होते हैं। भारत में इन दोनों के लिए एक बड़ा बाजार उपलब्ध है। इसके निर्माण के लिए ज्वाइंट वेंचर ही इकलौता तरीका है। जिसमें दोनों पक्षों को फायदा होता है। इसके लिए भारत और फ्रांस की एयरो इंजिन कंपनी सफ्रान के बीच बात चल रही है। जिसकी कीमत और तकनीक ट्रांसफर के मामले पर अभी पेंच फंसा हुआ है। भारत को चालकरहित वायुयानों और क्रूज मिसाइलों के लिए छोटे इंजनों की भी जरुरत है। बैंगलुरु की कुछ कंपनियां इन छोटे इंजनों के निर्माण में लगी हुई हैं। जिसमें भविष्य इलेक्ट्रोनिक या हायब्रिड इंजनों का ही है। जिसमें रिसर्च के लिए भारत को निवेश करना होगा।

 

 उच्च तकनीक वाले हथियारों की जरुरत

सटीक और ज्यादा से ज्यादा दूरी, यह हवा से हवा और हवा से सतह में मार करने वाले हथियारों की पहली जरुरत होती है। भारत ने सफलतापूर्वक मिसाइल और हथियारों को कार्यक्रम चलाया है। जिसके तहत अस्त्र, आकाश, ब्रह्मोस जैसे हथियार बनाए गए। जिसमें से आकश और ब्रह्मोस के निर्माण में इजरायल और रुस ने सहयोग दिया। इसमें संयुक्त उद्यम सफलतापूर्वक चला। भविष्य में पूरी दुनिया में हायपरसोनिक और डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस हथियार ही इस्तेमाल किए जाएंगे। लेजर और माइक्रोवेब तकनीक से संचालित फिर से इस्तेमाल किए जा सकने वाले डीईडब्ल्यू, छठी पीढ़ी की लंबी दूरी की मिसाइलें किसी भी देश की प्रमुख रक्षा जरुरत होगी। हवा से हवा और हवा से सतह में मार करने वाले हथियारों को और उन्नत बनाना जरुरी होगा।

 

भारत में तकनीक का भविष्य

उच्च बैंडविड्थ, हाई स्पीड नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटर, रोबोटिक्स जैसी तकनीकों से भविष्य में युद्ध लडऩे का तरीका बदल जाएगा। भविष्य में युद्ध जीतने के लिए तकनीक की जानकारी आवश्यक होगी। हवाई तकनीकों का विकास ऐसे होना चाहिए, जिससे उन्हें बार बार अपग्रेड करने की जरुरत नहीं पड़े। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्मार्ट स्ट्रक्चर, हायब्रिड सिस्टम हमारे भविष्य को निर्देशित करने वाले हैं। उच्च स्तरीय डाटा को भेजने के लिए बड़े बैंडविड्थ की आवश्यकता होने वाली है। जिसके लिए सेंसर सिस्टम में और अविष्कार किए जाने की जरुरत है। नेटवर्क-केंद्रित पेलोड प्रोसेसिंग इकाइयां डिजिटल लिंक पर भेजने से पहले ऑन-बोर्ड डेटा फ्यूजन को सक्षम बनाती हैं। गैलियम नाइट्राइड (GaN) एक अर्धचालक पदार्थ है जो अच्छा सुचालक, ठंडा करने में आसान और रडार की क्षमता में सुधार के लिए जरुरी होता है। पैसिव एयरो-इलास्टिक टेलर्ड (PAT), एक विशिष्ट रूप से डिज़ाइन किया गया मिश्रित विंग हल्का, अधिक संरचनात्मक रूप से कुशल होगा। इसके इस्तेमाल से वजन कम होगा और ईंधन की बचत होती है। हाइपरसोनिक क्रूज, फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी, हाइब्रिड सेंसर, डेटा एनालिटिक्स और बायो-मिमिक्री का उपयोग करते हुए बेहतर मानव-मशीन इंटरफेस, सामग्री का संयोजन, एपर्चर और रेडियो फ्रीक्वेंसी जो दुश्मन के इलाके में हमारी फौज की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। इसपर हमारे वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करते हुए 3डी प्रिंटिंग का उपयोग करके चीजें तेजी से, बेहतर और अधिक किफायती तरीके से बनाई जा रही हैं। Additive xD निर्माण मांग पर स्पेयर पाट्र्स, तेज रखरखाव और मरम्मत, अधिक प्रभावी इलेक्ट्रॉनिक्स और अनुकूलित हथियारों के साथ एक सिस्टम बनाता है। एक हाइपरसोनिक विमान के विकास से युद्ध की परिस्थितियों में दुश्मन को जवाब देने की क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। नैनो-सामग्रियों का उत्पादन हमारे हथियारों के आकार, और संरचना को नियंत्रित करती है और उनका वजन कम करती है। इनका इस्तेमाल अंतरिक्ष तकनीक के लिए भी किया जाना है।

 

हथियार निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा भारत 

देश तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है, भारत में रक्षा उत्पादन को एक बड़ा बढ़ावा मिल चुका है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, एलसीए-तेजस में स्वदेशी सामग्री अब 75.5 फीसदी हो चुकी है। जो कि 2016 में विमान के मूल्य से देखा जाए तो महज  59.7 फीसदी थी। इसने एलसीए एमके 2 में मूल्य के हिसाब से 70 प्रतिशत तक पहुंचने की योजना बनाई और 2030 तक 80 प्रतिशत होने का लक्ष्य रखा है। AMCA का निर्माण, मध्यम आकार का क्षेत्रीय जेट, बड़ा UAV और मध्यम हेलीकॉप्टर आगे के महत्वपूर्ण चरण हैं।

लगभग आठ साल पहले, हमारा रक्षा निर्यात लगभग ₹800 करोड़ से ₹900 करोड़ था और आज हमने अन्य देशों को रक्षा वस्तुओं और प्रौद्योगिकी का निर्यात करके ₹13,000 करोड़ का लक्ष्य हासिल कर लिया है। पीएम की मेक इन इंडिया योजना पर जोर देने के कारण, 2025 तक यह ₹13,000 करोड़ का निर्यात लगभग ₹40,000 करोड़ से ₹50,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा। जैसा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘अमृत कालÓ अब और 2047 के बीच है, जब भारत स्वतंत्रता के 100 वर्ष मनाता है, इस अवधि में देश न केवल दो शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा, बल्कि शीर्ष रक्षा निर्यातक भी बन जाएगा।

 


अनिल चोपड़ा

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