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ऋषि सुनक की विलायती धरती पर ताजपोशी : भारतीयता और हिंदुत्व को नई संजीवनी

ऋषि सुनक की विलायती धरती पर ताजपोशी : भारतीयता और हिंदुत्व को नई संजीवनी

1932 के दौरान भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के चरम पर पहुंचने के बाद ऐसा महसूस किया जा रहा था, कि भारत को गुलाम बनाने वाली ब्रिटिश सरकार को भारतीय स्वाधीनता सेनानियों से समझौता करना पड़ेगा। तब ब्रिटिश संसद में एक समिति गठित की गई थी, जिसे भारत में संवैधानिक सुधारों को लागू किया जाना था। उसके सम्मुख प्रस्तुति के लिए तब के एक ब्रिटिश सांसद ने छह पृष्ठों का एक दस्तावेज तैयार किया था, जिसमें उन्होंने भारत और भारतीयों के बारे में लिखा था, “वे जानवर जैसे लोग हैं और उनका धर्म भी पशुओं जैसा है।” उन्होंने तब भारत के बारे में कहा था कि भारत न एक देश है या राष्ट्र है; यह एक महाद्वीप है, जिसमें कई देश बसे हुए हैं। अपने इन तर्कों के जरिए भारत के प्रति अपनी घृणा को जाहिर करने वाले नेता थे सर विंस्टल चर्चिल, जो बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भी बने।

भारत और भारतीयों पर जाहिर इन विचारों ने 90 साल की यात्रा पूरी कर ली है। इस बीच समय चक्र तकरीबन पूरी तरह घूम चुका है। चर्चिल के इन विचारों का जवाब कहेंगे या फिर संयोग, उनकी ही टोरी पार्टी को अपनी अगुआई के लिए उसी भारतीय लहू पर भरोसा करना पड़ा है, जिसे लेकर उसके ही एक पूर्वज अगुआ के में गहरे तक घृणा बैठी हुई थी। आर्थिक बवंडर की दरिया में हिचकोले खा रही ब्रिटिश नौका को खाेने और उसे पूरी हिफाजत के साथ किनारे लगाने को लेकर जिस शख्स पर ब्रिटिश टोरी पार्टी को भरोसा जताना पड़ा है, उसकी रगों में वही भारतीय लहू स्पंदित हो रहा है, जिसे विंस्टन चर्चिल देखना तक पसंद नहीं करते थे।

ऋषि सुनक के दादा अविभाजित भारत के गुजरांवाला के निवासी थे। जिस समय विंस्टन चर्चिल भारत के बारे में अपनी कुख्यात राय जाहिर कर रहे थे, उसके ठीक तीन साल बाद ऋषि के दादा बदहाल भारतीय धरती को छोड़ रोजी-रोटी की तलाश में अफ्रीकी महाद्वीप के देश कीनिया पहुंच गए थे। बाद में वे ब्रिटेन आए और यहां के साउथम्टन शहर में डेरा जमाया और गृहस्थी खड़ी की। गुलाम भारत से दरबदर हुए इस परिवार ने शायद ही सोचा होगा कि उसके चिराग से रोशनी की उम्मीद वह ब्रिटेन लगा बैठेगा, जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था। ऋषि सुनक आधिकारिक रूप से 28 अक्टूबर को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन जाएंगे। इस बीच 25 अक्टूबर को ब्रिटेन के राजा चार्ल्स ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी है।

मध्यकालीन इतिहास में भारत से बाहर अपना राज फैलाने वाले कुछ चरित्रों की जानकारी मिलती है। कनिष्क और फुआन नाम के राजाओं ने विदेशी धरती तक अपना साम्राज्य फैलाया था। इन्होंने अपना राजकाज ईरान, उजबेकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान और दक्षिणी पूर्वी एशिया तक पहुंचा दिया था। तब का दौर तलवारों के दम पर राज स्थापित करना था। लेकिन आज का दौर लोकतंत्र का है। लोकतांत्रिक समाज में जिसे जनता चुनती है, वही उनका भाग्यविधाता बनता है। ऋषि सुनक इन अर्थों में अतीत के राजाओं की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

ब्रिटिश शासन व्यवस्था के चलते पूरी दुनिया में एक और बात हुई। शासन की छत्रछाया के तले शासित इलाकों में ईसाइयत का भरपूर प्रसार हुआ। दुनियाभर में ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म का विस्तार खूब किया। अब भी भारत में धर्मांतरण की घटनाएं सामने आती हैं तो उनके पीछे ज्यादातर ईसाई मिशनरियों की ही भूमिका नजर आती है। ईसाइयत का प्रमुख केंद्र ब्रिटेन है। उसी ब्रिटेन की अगुआई अब एक हिंदू कर रहा है। ऋषि सुनक का परिवार तीन पीढ़ियों से भारतीय धरा से दूर है। लेकिन उसने अपना धर्म नहीं बदला। सुनक परिवार अब भी आस्थावान हिंदू है। अपने बचपन से ऋषि सुनक साउथम्पटन के मंदिर की सेवा करते रहे हैं। उनके पिता अब भी वहां के एक मंदिर के ट्रस्ट में हैं। करीब डेढ़ महीने पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के इस्तीफे के बाद जब कंजरवेटिव पार्टी अपने नेता की खोज में लगी थी, तब भी ऋषि सुनक ने अपनी दावेदारी प्रस्तुत की थी। तब उन्होंने लंदन के मंदिरों का भी दौरा किया था। 25अक्टूबर को जब प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास दस डाउनिंग स्ट्रीट में उन्होंने प्रवेश किया, तब पुजारी वहां मौजूद रहे। घर में प्रवेश करने से पहले सुनक ने बाकायदा आस्थावान हिंदू की तरह पुजारी के पैरों में झुके और उनका आशीर्वाद लिया।

आधुनिक दौर में शासन व्यवस्था के लिए लोकतंत्र को बेहतरीन माना जा रहा है। लोकतंत्र की जरूरी शर्त व्यवस्था का सेकुलर होना है। पश्चिम से आयातित इस व्यवस्था को भारत ने भी अपनाया है। कुछ साल पहले तक शासक का यहां मंदिर में जाना सांप्रदायिक माना जाता था। सांप्रदायिक का ठप्पा लगने के डर से शासन व्यवस्था से जुड़े लोग मंदिरों में जाने से परहेज करते थे। हां,उन्हें अल्पसंख्यक समर्थन के नाम पर मस्जिद आदि स्थानों पर जाने एवं टोपी आदि पहनने से एतराज नहीं होता था। हिंदू और हिंदुत्व की बात करना यहां पिछड़ेपन की निशानी रहा है। यह बात और है कि लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था के उत्स देश ब्रिटेन या अमेरिका में जो सेकुलर लोकतांत्रिक व्यवस्था है, उसके बारे में कह सकते हैं कि वह बाइबिल हाथ में लेकर आगे बढ़ने वाला सेकुलर लोकतंत्र है। लेकिन वहीं से भारत आये सेकुलर लोकतंत्र को हिंदुत्व से परहेज रहा है। ऐसे ब्रिटेन में अगर ऐसे नेता को शासन की कमान मिलती है, जो हिंदुत्व के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हो, जिसे पूजा-पाठ से परहेज ना हो, निश्चित तौर पर यह क्रांतिकारी घटना ही मानी जाएगी।

कुछ पश्चिमी विचारकों का मानना है कि इक्कीसवीं सदी में ईसाइयत और इस्लाम के बीच संघर्ष है। इसमें सच्चाई तो है, लेकिन एक तथ्य और है। आज दोनों ही धर्मों के कट्टरवादियों से हिंदुत्व पर सबसे ज्यादा खतरा है। हैरत की बात यह है कि ऐसा खतरा हिंदुत्व की मूल धरती भारत पर भी है। वैसे एक तथ्य यह भी है कि भारत पर ब्रिटेन या अमेरिका की घटनाओं का असर कहीं ज्यादा पड़ता है। ऐसी स्थिति में विलायती सरजमीं पर आस्थावान हिंदू का प्रधानमंत्री बनना हिंदुत्ववादी धारा को नई संजीवनी प्रदान करेगा। ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की घटना को लेकर इन्हीं वजहों से भारत ही नहीं, भारतीयता और हिंदुत्व भी प्रसन्न है। इससे भारतीयता को नई संजीवनी मिलने की उम्मीद इसी वजह से ज्यादा है।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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