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ऋषि सुनक का प्रधानमंत्री बनना भारतीय संस्कृति और मूल्यों के लिए अहम उपलब्धि

ऋषि सुनक का प्रधानमंत्री बनना भारतीय संस्कृति और मूल्यों के लिए अहम उपलब्धि

दीपावली के दीपों के प्रकाश से आलोकित भारत में एक और शुभ समाचार आया। कुछ माह पूर्व प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह गए श्री ऋषि सुनक का अचानक ब्रिटेन का प्रधान मंत्री बन जाना एक महत्वपूर्ण घटना है।

व्यक्ति आते हैं और जाते हैं किंतु संस्कृति और मूल्य, विश्व को दिशा देते रहते हैं । सुनक की विजय पर एक परम मित्र ने कहा,” अब ब्रिटेन में नए ‘राजा” चार्ल्स  और नए प्रधानमंत्री ‘ऋषि” मिलकर कार्य करेंगे।

हर्ष का विषय है कि वे प्रधान मंत्री बने हैं।

उससे भी अधिक हर्ष का विषय है कि विदेशों में बसे सभी भारतीय ऐसा ही कर रहे हैं। इंटरनेट पर की गयी खोज बताती है कि फ़िजी ,सूरीनाम ,मॉरीशस, सिंगापुर ,सेशेल्स ,त्रिनिदाद टोबेगो,गुयाना और पुर्तगाल में पहले ही भारतीय मूल के लोग शीर्ष  पद सुशोभित कर चुके है ! इतना  ही नहीं कुछ देशों में तो यह अनेक बार हो चुका है ।

संसद अथवा विधायिका में देखें तो विश्व के पच्चीस से अधिक देशों में 300 अधिक भारतीय इस प्रकार के पदों को सुशोभित कर रहे हैं। अमेरिका , ऑस्ट्रेल्या , कनाडा ,स्विट्ज़रलैंड, दक्षिण अफ्रीका,जापान, मलेशिया और स्पेन जैसे बड़े देश प्रमुख हैं। इसके लिए वे कोई नकारात्मक कार्य   नहीं करते हैं ,उनकी निष्ठा और योग्यता ही इन्हें यहाँ तक लाती है ।

यही विशेषता भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से श्रेष्ठ और कालजयी बनाती है।

हमसे अलग हुए देशों के नागरिक, अंतरराष्ट्रीय आतंक, तस्करी और अस्थिरता के पर्याय बने हैं। उनके व्यवसायी अपनी पहचान छुपाते हैं अपने रेस्टोरेंट आदि के भारतीय नाम रखते हैं । हमसे  सांस्कृतिक रूप से अलग हुए  अफगानिस्तान , पाकिस्तान, बांग्लादेश  विभाजन और अनेक  तख्ता पलट के शिकार हो चुके हैं। हमें लूटने वाले आक्रमणकारी, लूटा  हुआ धन खोकर कबीलों का जीवन जी रहे हैं या फिर उस ओर बढ़ रहे हैं। शताब्दियों पूर्व तक्षशिला का शिक्षा केंद्र आज अपनी दुर्दशा देख रहा है ।

इसके विपरीत जब भारत से बौद्ध धर्म विश्व में  फैला तो कोई युद्ध नहीं हुआ कोई क्रांति नहीं हुई । एक कथा के अनुसार चीन के सम्राट मिंग स्वप्न में बुद्ध की ध्यान मग्न मुद्रा देखकर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने दूत भारत भेजे। कठिन हिमालय और भाषा की चुनौती पार कर वे भारत आए यहाँ शिक्षा ग्रहण की और फिर बौद्ध धर्म चीन से जापान तक पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में फैल गया। तलवार और प्रलोभन से अलग, शांति दया और बंधुत्व के  गुणों के आधार पर आगे बढ़ने वाली सनातन संस्कृति विश्व को प्रभावित कर रही है। इसके उपनिषद, पुराण और अन्य ग्रंथ आज विश्व के सभी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे हैं।

ऋषि सुनक का व्यक्तित्व

आइए ऋषि सुनक की अब तक की उपलब्धियों की चर्चा करें ! ऋषि सुनक के पूर्वज भारत से विदेश गए थे ।

12 मई 1980 को  ब्रिटेन के साउथैम्प्टन नामक शहर में जन्मे सुनक के माता-पिता भारतीय मूल के हिन्दू हैं।  वे पूर्व अफ्रीका में रहते थे। 60 के दशक में इनके माता-पिता पूर्व अफ्रीका से ब्रिटेन आए थे। ऋषि ने अपनी पढ़ाई विनचेस्टर कॉलेज में की थी। इन्होंने दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई लिंकन कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में पूरी की। इसके बाद फूलब्राइट प्रोग्राम के तहत छात्रवृत्ति प्राप्त कर स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से इन्होंने एमबीए की डिग्री प्राप्त की। पहले वे इन्वेस्टमेंट बैंकर थे, 2015 से सक्रिय राजनीति में आए सुनक भारतीय कम्पनी  के संस्थापक नारायण मूर्ति के दामाद हैं और ब्रिटेन के सबसे अमीर सांसदों में गिने जाते हैं।

योग्यता के कारण वे अपने से वरिष्ठ राजनीतिज्ञों को पीछे छोड़  कर आगे बढ़ते हुए मात्र सात वर्षों में प्रधानमंत्री के पद तक पहुँचे हैं। ब्रेग्जिट का समर्थन करना इसका मूल कारण है। इसके चलते  ही पार्टी में उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती चली गयी। इन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे की सरकार के संसदीय अवर सचिव के रूप में कार्य किया। थेरेसा मे के बाद, सुनक बोरिस जॉनसन के कंजरवेटिव नेता बनने के अभियान के समर्थन में जुट गए। जॉनसन के प्रधान मंत्री बन जाने पर सुनक को ट्रेजरी का मुख्य सचिव नियुक्त किया। सुनक ने ब्रिटेन में COVID-19 महामारी के आर्थिक प्रभाव के मद्देनजर आर्थिक नीति को मजबूत करने  पर प्रमुखता से काम किया।

5 जुलाई 2022 को जॉनसन के साथ अपनी आर्थिक नीति के मतभेदों का हवाला देते हुए सुनक ने चांसलर के महत्वपूर्ण पद से इस्तीफा दे दिया। सुनक का इस्तीफा,अनेक अन्य इस्तीफ़ों की प्रेरणा बन गया। यही  महामारी के संकट के बीच जूझती अर्थव्यवस्था को संभालने में असफल  जॉनसन के इस्तीफे का कारण बना। यहाँ हम देखते है कि सुनक और उनके श्वसुर नारायण मूर्ति में एक समानता है। दोनो अपने मतभेद छिपाते नहीं है। विरोध के कारण पद से इस्तीफ़ा देने के बाद  जब प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का प्रश्न आया तो सुनक ने अन्य प्रतिद्वंदियों की तरह  कर कम करने के लुभावने वादे नहीं किए। इसके कारण प्रथम दौर में वे पीछे रह गये।

इस समय उनके विरोधियों ने उन्हें विभीषण और जयचंद कहा। भारतीय अख़बार भी इसमें पीछे नहीं रहे। ‘द प्रिंट”  के हिंदी संस्करण में 8 सितम्बर २०२२ को श्रुति कपिला जी का लेख “ऋषि सुनक  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में कई वजहों से पिछड़े, नस्ल मुख्य वजह नहीं” इससे भी आगे चला गया था। गीता पर हाथ रख शपथ लेने के बाद अपने पहले सम्बोधन में सुनक ने अपने देशवासियों को कठिन चुनौतियों के लिए तैय्यार करते समय करों में कमी करने का कोई आश्वासन नहीं दिया है उनके मुख्य वादे नीचे दिए गए हैं।

  • सरकार की देनदारियाँ कम की जाएँगी, अगली पीढ़ी के लिए कोई कर्ज नहीं शेष रहेगा।
  • ब्रेग्जिट के अवसरों का अधिकतम लाभ उठाएंगे।
  • मजबूत एनएचएस, बेहतर स्कूल, सुरक्षित सड़कें, सीमाओं पर नियंत्रण, पर्यावरण की रक्षा, सशस्त्र बलों का समर्थन , और अमीर-गरीब के बीच के खाई को कम करना।
  • देश को एकजुट रखना।
  • सरकार में हर स्तर पर ईमानदारी, प्रोफेशनलिज्म और जवाबदेही ।
  • विश्वास कमाने का ईमानदारी भरा प्रयास किया जाएगा ।

यही है वह सनातन संस्कृति जहां नेता अपने अनुयायियों को झूठा आश्वासन देने के बजाय उन्हें सच से अवगत कराता है । नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” वहीं शास्त्री जी ने देश वासियों को एक समय उपवास रखने का आह्वान किया था। क्या श्री सुनक भी  ऐसा  ही कोई चमत्कार कर पाएँगे?

श्रीमद् भागवत सुनीति को ही  सुरुचि (रुचिकर नीति ) पर महत्व देती है। श्री सुनक का मार्ग कठिन है मुद्रा स्फीति अपने शीर्ष पर है। जनता अपनी क्रय शक्ति खो रही है। कर्मचारी हड़ताल का रुख़ कर रहे हैं। विदेश नीति हो या उद्योग धंधों को आगे बढ़ाना, पड़ोसी देशों से व्यापारिक सम्बन्ध में सुधार आदि  की चुनौती ललकार रही है।  विश्व कौतूहल से देख रहा है कि ब्रेक्ज़िट के समर्थक सुनक इन सब समस्याओं को कैसे हल करेंगे ?

पाश्चात्य जगत तो   अभी तक तो भारतीय मूल्यों का उपहास करता आया है। इन परिस्थितियों में यदि सुनक अपने देश की जनता को मितव्यतिता सिखा पाए तो यह एक महान उपलब्धि होगी।

इस लेख का उद्देश्य ऋषि सुनक को महिमा मंडित करना नहीं है अपितु भारतीय नागरिकों को प्रवासी भारतीयों के उन गुणों से अवगत कराना है जो उन्हें भारत के बाहर के देशों में सफल बनाते हैं। लेखक अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं और वहाँ के सफ़ल भारतीयों  से बातचीत  करने का सौभाग्य पाया है।

कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

  • भारत के बाहर जाते ही प्रतियोगिता तुलनात्मक रूप से कम हो जाती है और हमारी अधिक परिश्रम करने की आदत एक ताक़त बन जाती है ।
  • भारत में हम एक दूसरे की मदद करें या नहीं किंतु विदेश में बसे भारतीय प्रयास करते हैं कि वे किसी अन्य परिचित को मदद करें ।
  • बचत करने की हमारी शक्ति बहुत मदद करती है।
  • जिस देश में गए हैं उसके नियम क़ानून का पालन करने की आदत हमें स्वीकार्य बनाती है।
  • भारत में रहने पर जो ‘चलता है ‘ का भाव है वह हमारी प्रगति का बड़ा रोड़ा है ,विदेश में यह छूट जाता है और हम आगे बढ़ते हैं।
  • n अपनी संस्कृति को खोए बिना स्थानीय संस्कृति को आत्मसात करने का  प्रयास करना। भारतियों को क्रिसमस ,थैंक्स गिविंग  आदि उत्सव में हिस्सा लेने में कोई असुविधा नहीं होती है

इन सभी गुणों के कारण स्थानीय लोग उन्हें पसंद करते हैं। हिंदू मंदिर और इसके उत्सव जीवन में एक नया रंग भरते हैं। मंदिर के कार्यक्रमों में स्थानीय लोग शामिल होते हैं।

रंगभेद के कट्टर समर्थक अवश्य भारतीय मूल के लोगों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं। यदि भारत में रहते हुए हम इन गुणों को आत्मसात कर सकें तो विदेश जाना ही न पड़ेगा। अब सवाल यह है कि यह गुण हमें कौन देता है ? गीता का तीसरा अध्याय समत्व की बात करता है अर्थात सुख-दुःख में सम रहना। दूसरी ओर समदर्शी (सभी में एक ही  प्रकार की आत्मा है)  यह हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की ओर ले जाता है  और अंतिम बात है वहाँ की बेहतर क़ानून व्यवस्था हमारे अंदर विश्वास पैदा करती  है और वहाँ हम अपना मत अधिक खुल कर कह पाते हैं । कल्पना करें कि यदि  सुनक भारत की सबसे प्राचीन पार्टी में प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बग़ावत करते तो क्या परिणाम होता। सुनक के अनुभव से भारतीय राजनीतिक दलों को भी सबक़ मिलता है कि प्रजातंत्र देश के लिए ही नहीं राजनीतिक दलों के विकास के लिए भी जरुरी है। प्रजा से पहले नेताओं का आचरण निर्मल होना आवश्यक है।

मीडिया का चरित्र

मीडिया ने ब्रिटेन के इन विवादों पर बहुत चटखारे ले ले कर टिप्पणी की। उन्होंने सुनक के बीफ़ उत्पादक किसानो के समर्थक बयान को भी काफ़ी उछाला है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि निजी जीवन में  सनातनी होना तो उनके बस में है किंतु राष्ट्रीय नीतियों को पालन करना भी उनका दायित्व है। यहाँ भारत में भी केरल, बंगाल और उत्तरपूर्व में कोई भी पार्टी इस विषय को छेड़ने से बचती है। हमारे मीडिया का दायित्व है कि प्रायोजित लेखन से बच कर ही ऋषि सुनक का मूल्यांकन करें।

भारत ब्रिटेन सम्बंध

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विटर पर अपने बधाई संदेश में कहा, “ऋषि सुनक ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने पर आपको हार्दिक बधाई। मैं विभिन्न वैश्विक मुद्दों और 2030 की वृहद योजना को लागू करने के लिए आपके साथ मिलकर काम करने की प्रतीक्षा करता हूं। ऐसे समय में जबकि हम अपने दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को एक आधुनिक भागीदारी में परिवर्तित कर रहे हैं। ब्रिटेन में रह रहे भारतीय ‘सजीव सेतु’ को दीपावली  की शुभकामनाएँ।”

वहीं सुनक ने कुछ समय पूर्व कहा था,”हम जानते हैं कि यूके-भारत संबंध महत्वपूर्ण हैं। हम दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध की वकालत करते हैं। हम सभी यूके के लोगों के लिए भारत में चीजें बेचने और काम करने के अवसर के बारे में बहुत जागरूक हैं। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि हमारे छात्रों के लिए भी भारत की यात्रा करना और वहां जाकर सीखना आसान हो, हमारी कंपनियों और भारतीय कंपनियों के लिए एक साथ काम करना भी आसान हो क्योंकि यह केवल एकतरफा संबंध नहीं है, यह दो-तरफ़ा संबंध है। इस तरह का बदलाव मैं दोनों देशों के रिश्ते में लाना चाहता हूं।” (सीएफआईएन की सह-अध्यक्ष रीना रेंजर के द्विपक्षीय संबंधों के बारे में एक सवाल के जवाब में)।

राजनीति की भूलभुलैया में अटके भारत – ब्रिटेन के  ‘मुक्त  व्यापार समझौते’ के आगे बढ़ने पर दोनो देशों की आशाएँ साकार हो सकती हैं । उनका दूसरा  महत्वपूर्ण योगदान होगा – चीन के प्रति उनका कठोर  नज़रिया। देखना यह है कि अपने चयन हेतु के प्रचार के समय दिए गए वक्तव्य को वे किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं । कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि आंतरिक चुनौतियों और यूरोपीय यूनियन से अपने सम्बन्ध सुधारने की मुहिम में उलझे  सुनक भारत के लिए अधिक समय नहीं निकाल पाएँगे । मेरा निजी मत है कि भारत से सम्बंध सुधारने में किया गया परिश्रम ही उनकी आंतरिक समस्याओं के निदान के लिए एक सकारात्मक बाज़ार देगा ।

समय तय करेगा कि विशेषज्ञ सही सिद्ध होते हैं या आम भारतीय की आशा रंग लाती है। कुछ भी क्यों न हो किंतु यह निश्चित है कि सुनक  भारत के लिए चीन व अन्य भारत विरोधी देशों के मोहरे बने हुए अनेक भारतीय नेताओं से बेहतर सिद्ध होंगे ।

उपसंहार

यदि ऋषि सुनक ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को बचा पाते हैं तो यह भारतीय संस्कृति का ब्रिटेन पर एक और उपकार होगा। तब इतिहास कहेगा कि ब्रिटेन की प्रथम औद्योगिक क्रांति भारत की लूट के बल पर आगे बढ़ी थी और वर्तमान आर्थिक चुनौती भारतीय मूल के प्रधानमंत्री की बुद्धि कौशल से हल हुई है। किंतु अभी के लिए लक्ष्य बहुत  कठिन है और यात्रा लम्बी है। ऋषि सुनक 42 वर्षीय युवा हैं और उनके पास उनके श्वसुर नारायण मूर्ति सास सुधा मूर्ति और पत्नी अक्षतामूर्ति के रूप में  एक सशक्त समर्थन है। मूर्ति परिवार भारत में सम्मानित है और श्रीमती सुधा मूर्ति  ‘प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थिति निधि’ सलाहकार समिति की सदस्य हैं। लेखक यह भी याद दिलाना चाहेगा कि भारत की डिजिटल  क्रांति की नींव ‘ आधार कार्ड ‘इनफ़ोसिस के ही  नंदन नीलेकणि की देन है। देखना यह है कि सुनक उपलब्ध संसाधनों का ब्रिटेन के डिजिटल विकास हेतु  कितना बेहतर उपयोग कर पाते हैं? क्या उनके भारत से सम्बंध दोनो देश के बीच सहयोग को नयी ऊँचाई दे सकता है?

हम सनातनी हर चुनौती के समय, गीता के संदेश द्वारा रक्षित हैं :

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।।2.37।।

युद्ध में मरकर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे या जीतकर पृथ्वी को भोगोगे इसलिये? हे कौन्तेय (अर्जुन) युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।

ऋषि सुनक को गीता की भूमि ‘भारत’ की जनता की शुभकामनाएँ।

 

राकेश कुमार

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