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पांच खरब की अर्थ व्यवस्था का सपना

पांच खरब की अर्थ व्यवस्था का सपना

साल 2015 के आम बजट पेश होने के पहले परंपरा के मुताबिक जो आर्थिक सर्वेक्षण सरकार ने प्रस्तुत किया था, उसमें एक विशेष शब्द का प्रयोग किया गया था,  ‘जैम’ अंग्रेजी के तीन वर्णों J, A और M से मिलकर बने इस शब्द की बुनियाद में ही दरअसल नरेंद्र मोदी सरकार का आर्थिक सपना छुपा था। जे यानी जन-धन खाते, ए यानी आधार और एम यानी मोबाइल फोन कनेक्शन। इन तीनों के जरिए मोदी सरकार ने अपनी भावी आर्थिक नीति और नवाचार का रोडमैप प्रस्तुत किया था। इसके जरिए ही वह पांच खरब डॉलर के साथ भारत को दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का सपना देखा था। साल 2019 में जब मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल को पूरा कर रही थी, उसी समय उसने तय किया था कि अगले पांच साल में भारत को दुनिया की ना सिर्फ चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना है, बल्कि पांच खरब डॉलर तक उसे पहुंचाना है।

लेकिन इसी बीच कोरोना की महामारी सामने आ गई। इसने भारत समेत पूरी दुनिया को पूरी तरह ठप्प कर दिया। चूंकि अपना देश उलटबांसियों का देश है, जहां लगातार अमीरी भी बढ़ी है तो गरीबी पर ठोस रूप से काबू नहीं पाया जा सका है। जहां अब भी करीब साठ फीसद जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। जहां करीब एक प्रतिशत लोगों का देश की तेरह प्रतिशत से ज्यादा जीडीपी पर कब्जा है, वहां पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य हासिल कर पाना उपर से देखने पर आसान नहीं लगता। लेकिन मोदी इस दिशा में सधे कदमों से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने सत्ता संभालते ही बैंकिंग व्यवस्था को आम लोगों तक व्यापक रूप से पहुंचाने का लक्ष्य रखा। इसके लिए उन्होंने जन-धन खाते की कल्पना की। यहां याद रखना चाहिए कि इस सिलसिले में उन्होंने बैंकों और वित्त मंत्रालय की बैठक बुलाई और उसमें पूछा कि एक साल में कितने बैंक खाते खोले जा सकते हैं। तब बैंकों का कहना था कि खूब कोशिश करें तो दो करोड़। प्रधानमंत्री इससे सहमत नहीं हुए तो वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने तीन करोड़ तक खाते खोलने तक का वादा किया। लेकिन प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को 31 मार्च 2015 तक साढ़े सात करोड़ बैंक खाते खोलने का लक्ष्य दिया। उन्होंने जन-धन खातों को खोले जाने की प्रक्रिया पर खुद निगरानी रखी और आज स्थिति यह है कि देशभर में करीब 44 करोड़ से ज्यादा जनधन खाते खोले जा चुके हैं। दिसंबर 2021 तक के आंकड़ों के मुताबिक, इन खातों में डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा की रकम जमा है। मजबूत इच्छा शक्ति के जरिए प्रधानमंत्री ने वह कर दिखाया, जो आजादी के इतने वर्षों तक सपना था।

आज लगभग पूरी आबादी को आधार नंबर जारी किए जा चुके हैं। इसके तहत पूरी आबादी को रिकॉर्ड पर लाया जा चुका है। इसी तरह देश में करीब एक अरब 51 करोड़ से ज्यादा मोबाइल फोन यूजर हैं। जाहिर है कि भारत में जनधन खाते, आधार नंबर और मोबाइल कनेक्शनों के जरिए नई आर्थिक क्रांति गाथा लिखी जा रही है। डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना के तहत भारत सरकार अरबों रूपए आम लोगों के खातों में डाल चुकी है। अकेले किसान सम्मान निधि के ही तहत एक लाख नब्बे हजार करोड़ रूपए से ज्यादा लोगों के खाते में दिए जा चुके हैं। कोरोना की महामारी से ही करीब 84 करोड़ लोगों को हर महीने सस्ती, तकरीबन मुफ्त दरों पर अनाज मुहैया कराया जा रहा है। इस बीच पिछले कई महीनों से जीएसटी संग्रह करीब एक लाख करोड़ से ज्यादा पहुंच चुका है। जाहिर है कि ये पूरी आर्थिक प्रक्रिया मिलकर नई आर्थिक कहानी लिख रही हैं। जिसमें लगातार बनती सड़कें, तेज गति से चलने वाली ट्रेन, मसलन वंदेभारत और तेजस के जरिए देश में विश्वास का नया माहौल बना है। पिछले साल तक रोजाना करीब 23 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए जा रहे थे, जो इन दिनों घटकर रोजाना करीब 22 किलोमीटर हो गया है। कुल मिलाकर भारत में आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। सड़क निर्माण का काम तो कोरोना महामारी के दौर में भी नहीं थमा था।

भारत की आर्थिक गति तेज करने में भारतीय वैज्ञानिकों की उस सोच और मेहनत ने भी बड़ी भूमिका निभाई है, जिसके तहत उन्होंने रिकॉर्ड अवधि में अपना देसी कोरोनारोधी टीका विकसित कर लिया। इसकी वजह से भारत की दो अरब आबादी को टीका लगा और दुनिया के कई देशों को भारत ने अपने विकसित टीकों को सद्भावनावश टीकों का निर्यात किया। इससे दुनिया में भारत की नई छवि बनी।

कोरोना के चलते पूरी दुनिया की आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा है। अमेरिका और यूरोप की अग्रणी अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रही हैं। पिछले करीब एक दशक में तेजी से उभरी चीनी अर्थव्यवस्था भी डगमग नजर आ रही है। वहीं भारत में आर्थिक तेजी बनी हुई है। महंगाई से पूरी दुनिया के साथ भारत भी जूझ रहा है। हालांकि भारत में हालात थोड़े काबू में हैं। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज ट्रस की नाव महज 44 दिनों में ही आर्थिक हिचकोले से मात खा गई और आर्थिक बदहाली की उमड़ती नदी में उनकी नाव डूब गई। लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के आकलन के मुताबिक साल 2022-23 में भारत के जीडीपी की विकास दर 7.6 रहने वाली है। हालांकि यह दर उम्मीद से कम है। लेकिन इससे साफ है कि भारत जिस आर्थिक राह पर चल रहा है, वह सही पटरी पर है।

पांच खरब की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सरकार ने कोशिशें भी बहुत की हैं। उसने बुनियादी सुविधाओं पर 100 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश है। इसके साथ ही कारोबारी सुगमता का माहौल बनाने के लिए ज़िला स्तर तक के प्रयास पर ज़ोर दिया है। इसी तरह विदेशी निवेश की सीमा को आसान बनाने की कोशिशें हुई हैं। इसके साथ ही उसकी शर्तों को सरल भी किया गया है। मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए कच्चे माल पर सीमा शुल्क कम करना और तैयार सामान पर आयात सीमा शुल्क बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। इसके साथ ही नए उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप के लिए केंद्र सरकार सालाना ढाई हजार करोड़ रूपए की एक आरंभिक निधि और 4 साल की अवधि में कुल ढाई हजार करोड़ रुपये की निधि की स्थापना की और स्टार्टअप्स के लिए ऋण उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ते हुए बैंकों और अन्य उधारदाताओं को प्रोत्साहित करने के लिए, राष्ट्रीय क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट कंपनी  के माध्यम से क्रेडिट गारंटी तंत्र भी बनाया। जिसे सिडबी के जरिए शुरूआत में सालाना 500 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया। इसके साथ ही स्टार्टअप में निवेश को बढ़ावा देने के लिए उन्हें कैपिटल गेन में छूट दी जा रही है। इसके साथ ही स्टार्टअप्स के मुनाफे को ना सिर्फ तीन वर्ष की अवधि के लिए कर से मुक्त रखा जा रहा है, बल्कि बाजार मूल्य पर निवेश पर भी टैक्स छूट दी जा रही है। ऐसी योजनाओं का असर भी हुआ है। भारत, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र बन गया है। भारत सरकार के आंकड़े के मुताबिक इन दिनों देश में पचहत्तर हजार से ज्यादा स्टार्टअप हैं। इनमें से 49 प्रतिशत दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों से हैं। इनमें 105 यूनिकॉर्न हैं। जिनमें से 44 वर्ष 2021 में और 19 वर्ष 2022 में स्थापित किये गये है। दिलचस्प है कि आईटी, कृषि, विमानन, शिक्षा , ऊर्जा, स्वास्थ्य और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी स्टार्टअप उभरे हैं।

भारत में नवाचार और नई कार्यसंस्कृति को बढ़ावा मिलने का असर है कि संपेरों के देश के रूप में विख्यात अपना देश अंतरिक्ष तकनीक में दुनिया का अग्रणी देश बनकर उभरा है। दुनिया से हथियार खरीदने वाला देश अब हथियार निर्यात के केंद्र के रूप में भी उभर रहा है। भारत सरकार ने 2027 तक 22 अरब डॉलर के हथियार निर्यात का लक्ष्य रखा है।

जाहिर है कि बदली कार्यसंस्कृति, शासन-प्रशासन में नई तकनीक के इस्तेमाल से भारत लगातार दुनिया में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में कोई कारण नहीं कि मार्च 2025 तक पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना पूरा करके आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में नया कदम ना बढ़ा सके।

उमेश चतुर्वेदी

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