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संकटपूर्ण वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच पांच ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य

संकटपूर्ण वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच पांच ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य

कोरोना वायरस महामारी के राजनीतिक और आर्थिक दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। कुछ हफ्ते पहले, ब्रिटेन की उन्नत अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति में किए गए एक परिवर्तन ने बॉन्ड और शेयर बाजारों में भारी वैश्विक गिरावट की शुरूआत कर दी थी। देश की नवनियुक्त प्रधानमंत्री ने अपने ‘मिनी बजट’ में बिना यह बताए कि सरकार अपने खर्चे कैसे चलाएगी, टैक्स कटौती का समर्थन किया था। अब, मिनी बजट के विवादास्पद प्रावधानों को वापस ले लिया गया है और उनकी घोषणा करने वाले वित्त मंत्री को हटा दिया गया है।

कई अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि दुनिया ने महामारी का मुकाबला अच्छी तरह किया है। इसके बावजूद, ऐसी कोई भी अर्थव्यवस्था नहीं, चाहे विकसित हो या विकासशील, उस अराजकता से अछूती नहीं है। आप कह सकते हैं कि भारत में उच्च मुद्रास्फीति है, लेकिन अमेरिका जैसे सबसे बड़े देश के साथ ही विकसित देशों में स्थितियां और भी बदतर हैं। यूरोप में लोग ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। किसी के भी पास चाहे अमेरिकी डॉलर हो या यूरो उसकी क्रय शक्ति कमज़ोर पड़ गई है। वहीं, विवेकाधीन खर्च प्रभावित हुआ है, जिससे विश्वव्यापी उद्योग को एक बड़ा झटका लगा है।

इन सब के बीच, क्या भारत की अर्थव्यवस्था के लिए आने वाले वर्षों में पांच ट्रिलियन डॉलर के सपने को साकार करने का कोई अवसर है, विशेष रूप से साल 2025 तक जैसा कि सत्तारूढ़ दल ने कल्पना की थी? इस प्रश्न का उत्तर केवल सांकेतिक हो सकता है और किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए राजनीति, उद्योग और सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य से संबंधित कई पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए। वैश्विक अर्थव्यवस्था पिछले साल तक बहुत अच्छा कर रही थी, लेकिन इस साल घटी चौंकाने वाली घटनाओं ने दिखाया है कि व्यापक आर्थिक संकेतकों को पढ़ना और मध्यम से लंबी अवधि के लिए भविष्यवाणियाँ करना कितना जटिल हो सकता है।

भारत बनाम विश्व – नीतिगत कदम

क्या भारत अभी अच्छा कर रहा है? आईएमएफ (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) के एक शीर्ष अधिकारी की हालिया टिप्पणियों पर गौर करने की जरूरत है। इस बहुपक्षीय संस्था की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा किए गए “संरचनात्मक सुधारों” की प्रशंसा की। लेकिन इन सब पर चर्चा बाद में करेंगे, सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि बाकी दुनिया की तुलना में देश इस समय कहाँ खड़ा है।

इस कैलेंडर वर्ष की पहली तिमाही तक, सभी शीर्ष केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को ‘अस्थायी” करार दे रहे थे। महामारी के मद्देनजर, इन बैंकों ने अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बेरोजगारी और नकारात्मक विकास के गहरे संकट से बचाने के लिए बेंचमार्क ब्याज दरों को लगभग शून्य स्तर पर रखने का विकल्प चुना था। कुछ विकसित देशों ने नागरिकों को इस उम्मीद में कैश ट्रांसफर भी किए कि लॉकडाउन प्रभावित परिवारों को वास्तव में पर्याप्त सहायता की आवश्यकता है। पिछले साल ऐसी कई रिपोर्ट आई कि कनाडा जैसे देशों में लोगों के पास बेहिसाब कैश पड़ा है। नकद सहायता देने और ब्याज दरों को शून्य के करीब रखने का उपाय उल्टा पड़ गया।

स्थिति जल्द ही इतनी खराब हो गई कि इन अर्थव्यवस्थाओं में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ गईं, लेकिन लोगों को इसका एहसास करने में थोड़ा समय लगा क्योंकि उन्होंने पर्याप्त पैसे जमा कर रखे थे। इसके बाद साल 2022 आया, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं की राजकोषीय और मौद्रिक नीति की गलतियों की आलोचना की जा रही है। किराने के सामान से लेकर ईंधन तक, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अधिकांश अन्य देशों में कीमतें कई दशक के उच्च स्तर पर हैं। फेड और अन्य केंद्रीय बैंक जो अब तक सुस्त पड़े थे, अचानक जागे और बेंचमार्क ब्याज दरों को बढ़ा दिया जिससे वैश्विक शेयर बाजार में भारी गिरावट आई है।

दूसरी ओर, भारत ने महामारी के दौरान और उसके बाद भी अपना हौसला बनाए रखा। सरकार ने अचानक और वित्तीय रूप से कोई अविवेकपूर्ण निर्णय नहीं लिया। साथ ही, यह सुनिश्चित किया कि लॉकडाउन प्रभावित देश में गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) के माध्यम से वंचित परिवारों को भोजन मिलता रहे। जल्दबाजी में नकद सहायता योजना की घोषणा करके देश की वित्तीय स्थिति को खराब करने के बजाय, भारत ने एक स्थायी रास्ता चुना। मुद्रास्फीति के दबाव ने देश को परेशान कर रखा है, लेकिन इन्हें यूक्रेन में युद्ध और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी चिंताओं ने बढ़ा रखा है। भारत की खुदरा मुद्रास्फीति वृद्धि का आंतरिक नीतिगत उपायों से कोई लेना-देना नहीं है।

भारत बनाम विश्व – जीडीपी विकास दर

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने बताया है कि वित्त वर्ष 2021-22 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह किसी भी प्रकार से कोई मामूली उपलब्धि नहीं है क्योंकि औद्योगिक उत्पादन, माँग और खपत सभी महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए थे। न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था ने अत्यधिक दृढ़ता का परिचय दिया है, बल्कि इसने वित्त वर्ष 2020-21 में कोविड -19 संकट के चरम पर रहने के बाद उछाल के साथ वापसी की है। आईएमएफ के आँकड़ों के मुताबिक, भारत 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 3.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ ब्रिटेन अब छठे स्थान पर है।

दुनिया के एकदम विपरीत भारत में एक निरंतरता है। आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रही है, जिसमें औद्योगिक गतिविधि बेहद सुस्त है। विकसित देशों का हाल तो और भी बुरा है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में हाल ही में विकास की दर निगेटिव रही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार दो तिमाहियों में संकुचन हुआ है, जिससे तकनीकी मंदी की चर्चा छिड़ गई है। लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इन विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए निकट-से-मध्यम अवधि में किसी भी तरह की वापसी की उम्मीद बहुत कम है। यह एक कारण है कि उस वैश्विक शेयर बाजार ने इस साल गिरावट का रुख दिखाया है जिसमें सबसे प्रमुख एसएंडपी 500 इंडेक्स शामिल है।

भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया से अलग नहीं है और कोई भी वैश्विक मंदी वास्तव में हमारे देश को भी नुकसान पहुँचाती है। भले ही पिछले साल विकास दर जबरदस्त थी, फिर भी कीमतों में उछाल के बने रहने और भारतीय मुद्रा के अमरीकी डॉलर के मुकाबले मूल्य खोने की समस्याएँ हैं। हालाँकि, मुद्रास्फीति को मध्यम अवधि में प्रबंधित किया जा सकता है और अगर देश मजबूत आर्थिक गतिविधि और रोजगार सृजन को बनाए रखने में सक्षम रहा, तो महंगई इतना नहीं सताएगी। विकसित देशों में, एक तरह का नीतिगत पक्षाघात है। वह भी मात्र इसलिए कि केंद्रीय बैंकों के तरकश में ब्याज दरों को बढ़ाने के अलावा कुछ भी नहीं है, जबकि विश्व की अर्थव्यवस्था का मंदी के दौर में प्रवेश करने जा रही है।

पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था

जैसा कि पहले कहा गया है, यह समझने के लिए कि भारत लक्ष्य प्राप्त करने की राह पर है या नहीं, आईएमएफ की रिपोर्ट से ज़्यादा कुछ देखने की आवश्यकता नहीं है। क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा है कि भारत ने अप्रत्याशित रूप से ‘मुश्किल समय के दौरान भी” विस्तार किया है, जिसका श्रेय ‘संरचनात्मक सुधारों” को जाता है। उन्होंने डिजिटलीकरण जैसी पहल की सराहना की है जो भारत के विकास की कहानी को रेखांकित करती है। इसके अलावा, आईएमएफ के एक अन्य पदाधिकारी, पाओलो मौरो ने जोर देकर कहा है कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर ने देश के लिए “लॉजिस्टिक चमत्कार” के रूप में काम किया है। अफसोस की बात है कि वर्तमान सरकार की ओर से व्यापक सुधार का फैसला किए जाने से पहले वास्तविक लाभार्थियों को होने वाले ट्रांसफर में भारी गड़बड़ी हुआ करती थी।

बहुपक्षीय संगठनों और उनके अधिकारियों की ओर से यदि भारत द्वारा हाल ही में किए गए सुधारों को स्वीकार किया जा रहा है तो उसकी एक वजह है। उद्योगों के काम करने की रफ्तार बदल गई है। प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण से अर्थव्यवस्था में दक्षता लाने में मदद ली है। चाहे वह स्वीकृति प्राप्त करने में हो, लाइसेंस प्राप्त करने में, या अनुपालन की रिपोर्ट देने में हो, नौकरशाही जिस प्रकार के अनावश्यक और शोषणकारी प्रभाव दिखाता था, उस पर रोक लगी है। लालफीताशाही एक बड़ी बाधा थी, जिसे अगर दूर नहीं किया गया होता, तो अगले कुछ वर्षों में भी भारत अर्थव्यवस्था के संपूर्ण आकार में ब्रिटेन को पीछे नहीं छोड़ पाता। चीजें अब ठीक हो गई हैं।

सरकार और वित्तीय संस्थानों के पूरे सहयोग से जब तक उद्योग जगत नई-नई चीजों का प्रयोग नहीं करता है, तब तक किसी भी अर्थव्यवस्था का स्थायी रूप से विकास करना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए चीन को लीजिए जो एक स्वच्छ मोबिलिटी पावरहाउस के रूप में विकसित हो सकता है। वैश्विक उद्योग नई आर्थिक गतिविधियों की ओर बढ़ रहा है जिसमें स्वच्छ ऊर्जा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों ने इसे माना है और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) और इनोवेटिव स्टार्टअप्स के लिए आसान और त्वरित फंडिंग जैसी पहल एक बड़े संबल के रूप में काम कर रही हैं।

हम वहाँ पहुँचने वाले हैं

एक खास तारीख का हवाला देना संभव नहीं है जब भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर के आँकड़े को छू लेगा। हम 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गए हैं, और सुधारों और नीतिगत उपायों की चल रही गति निर्विवाद रूप से बताती है कि यह सपना पूरा होने की सीमा के भीतर है। वर्तमान में, कुछ व्यवधान हैं, जिनमें विशेष रूप से वैश्विक आर्थिक मंदी, यूक्रेन और एशिया में भी (ताइवान पर चीन का आक्रामक रुख) भू-राजनीतिक तनाव, और राजनेताओं की ओर से देश में खड़ी की जा रही समस्याएँ शामिल हैं। ऐसे नेता करिश्माई प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सत्तारूढ़ बीजेपी के मुकाबले अपनी पार्टियों में नई जान फूँकना चाहते हैं। इतना कहने के साथ ही, अन्य किसी की भी तुलना में भारत की विकास गाथा की समावेशिता ही सबसे अधिक मायने रखती है। शासन में पारदर्शिता की कमी, व्यापक भ्रष्टाचार, और क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थों का मतलब यही था कि कुछ साल पहले तक सारे फायदे केवल अमीर और प्रभावशाली लोगों को ही मिलते थे। अंधाधुंध विकास के पीछे भागने से नहीं होगा। समावेशी विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। यहाँ तक कि कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति को भी लाभ मिलना चाहिए। आईएमएफ ने शासन में डिजिटलीकरण और पारदर्शिता की सराहना की है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि सत्ताधारी दल ने कई चीजों को ठीक किया है। सरकार स्व-रोजगार ऋण और तेजी से स्वीकृतियों जैसी लक्षित योजनाओं के माध्यम से उद्यमशीलता की भावना की एक नई लहर पैदा करने में जुटी है। इससे कोई भी विकास की नई कहानी का हिस्सा बन सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संकटपूर्ण समय और निरंतर भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति पर तमाम चर्चा के बीच, भारत चुपचाप और मजबूती से पाँच ट्रिलियन डॉलर के सपने के करीब पहुंच रहा है।

 

डॉ सुनील गुप्ता

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