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पंच-पर्व दीपावली का सांस्कृतिक-आध्यात्मिक माहात्म्य

पंच-पर्व दीपावली का सांस्कृतिक-आध्यात्मिक माहात्म्य

वेदों-पुराणों की सर्जक भारत भूमि सनातन काल से ही पर्व प्रिय रही है। पर्व का आशय पोर अथवा गाँठ से भी होता है। जैसे बांस एवं गन्ने में एक-एक गाँठ पड़ती जाती है एवं उसका क्रमिक विकास होता जाता है, वैसे ही भारतीय पर्व हमें अहर्निश विकसित होते रहने की प्रेरणा से अभिषिक्त करते हैं। हमारी सनातनी  संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों एवं उत्सवों की इतनी प्रचुरता एवं ऐसा सातत्य है  कि कहावत ही प्रचलित है- सात वार और नौ त्यौहार। हमारे पर्व सामाजिक-सांस्कृतिक एकता, सौहार्द, भाईचारा, पारस्परिक प्रेम एवं सहयोग की अनूठी मिशाल हैं। इन त्यौहारों को इस रूप में भी देखा एवं समझा जा सकता है कि हमारे पूर्वजों ने इनके माध्यम से जीवन में उत्साह, उल्लास, उमंग एवं सकारात्मक ऊर्जा का पुनर्संचार करने की अद्भुत व्यवस्था की है। ऐसे ही पञ्च-पर्व विजयादशमी के बाद आते है जिन्हें सामान्यतः दीपों का उत्सव- दीपपर्व यानी दीपावली कहते हैं।

दीपावली का अर्थ है दीपों की श्रृंखला, दीपों की कतार। इसे आनंद एवं उल्लास का पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व कार्तिक अमावस्या की रात्रि में मनाया जाता है, जब रात सबसे अंधेरी होती है। उस अंधकार को दूर करने हेतु इस दिन समूचे घर को दीपक से सजाने की परंपरा है। इस मंगलदायी अवसर पर घरों की सफाई-पुताई करना, नए वस्त्र, आभूषण एवं बर्तन खरीदना, पारंपरिक व्यंजन बनाना, रंगोली बनाना, मिठाईयां बाँटना इत्यादि कार्य उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पादित होते हैं। स्कन्द पुराण, पद्म पुराण तथा भविष्य पुराण में भिन्न-भिन्न मान्यताओं समेत इस त्यौहार का वर्णन मिलता है। एक मान्यता यह है कि इसी दिन महाराज पृथु द्वारा पृथ्वी का दोहन करके दीन-हीन प्रजा को धन-धान्य से संपन्न करने का प्रयत्न हुआ था। दूसरी मान्यता है कि इसी दिन देव-दानवों द्वारा संयुक्त रूप से समुद्र मंथन करने से लक्ष्मी जी का प्राकट्य हुआ था। वहीं भगवान विष्णु के वामनावतार द्वारा राजा बलि का गर्व हरण करके उसके बंदी गृह में पड़ी लक्ष्मी जी के उद्धार की घटना का संबंध भी इस पर्व के साथ जोड़ा जाता है। जैन मतावलंबियों में मान्यता है कि इसी दिन भगवान महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था। वात्स्यायन रचित ‘कामसूत्र’ में इस रात्रि को ‘यक्षरात्रि’ उत्सव के रूप में मनाये जाने का उल्लेख मिलता है। एक अन्य कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध कर के सोलह हजार राजकन्याओं को उसके बंदी गृह से मुक्त कराने की भी है। महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों द्वारा युधिष्ठिर का राजतिलक भी इसी दिन किए जाने का उल्लेख है। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य के विजयोपलक्ष्य में प्रजा ने इसी दिन दीपमाला जलाकर सम्राट विक्रमादित्य का अभिनंदन किया था। इन सभी मतों के संबंध में द्रष्टव्य है कि यह सभी जन-मानस को सुख, उत्साह, उमंग, उल्लास, प्रसन्नता एवं सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाले पुनीत अवसर हैं।

यद्यपि उपरोक्त घटनाएँ कहीं न कहीं दीपावली पर्व से जुड़ी अवश्य हैं तथापि आज जनसामान्य में दीपावली संग भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी का संबंध ही गहनता से स्थापित है। सीता हरण के उपरांत भगवान् रामचंद्र लंका पर चढ़ाई करके भीषण युद्ध में रावण का संहार करते हैं। तत्पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की चौदह वर्ष वनवास की अवधि पूर्ण हुई तथा इसी दिन प्रभु श्री राम, सीता मैया एवं अनुज लक्ष्मण सहित अयोध्या वापस आये। इस उपलक्ष्य में अयोध्यावासियों ने अपने सर्वप्रिय एवं धर्मनिष्ठ राजा के आगमन पर अपनी प्रसन्नता प्रकट करने हेतु सम्पूर्ण अयोध्या नगरी को मिट्टी के दीपकों से सजा दिया था। मान्यता है कि तभी से दीपावली का यह उत्सव उसी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जैसे उस रात्रि मनाया गया था। दीपावली के जलते हुए दीपक प्रकाश का प्रतीक हैं। ये नन्हे-नन्हे दीपक अंधकार से लड़ने के मानवोचित प्रयास हैं। ये दीपक जो भी अपावन, कलुषित, तमयुक्त, दुष्ट और अमंगलकारी है, उसे अपनी तीक्ष्ण ज्वालाओं से विनष्ट कर देते हैं। इनकी ज्वालाएं अविनाशी राक्षसों के भी बल वीर्य को नष्ट करने में समर्थ है- यातुधानस्य रक्षसों बल विरूज वीर्यम। ये दीपक प्रतीक हैं उस अग्नि का जिसे वेदों-उपनिषदों में परम पवित्र माना गया है- तमसो मा ज्योतिर्गमय कहकर जिसे तमस को हरने वाला कहा गया है। दीपकों में जलने वाली अग्नि सूर्य, चन्द्र और असंख्य तारों की ही अग्नि है। अमावस्या की गहन अंधेरी रात में जब सूर्य, चंद्रमा, तारे नहीं होते तब यह दीपक ही मनुष्य को संदेश देता है कि अपनी क्षमतानुसार अंधकार का प्रतिकार करना ही हमारा धर्म है, एवं हमें इसका पालन करना ही चाहिए। साथ ही हमें मन के कलुष को मिटाकर उसका काजल बना लेना चाहिए जो हमें सौंदर्य और तृप्ति दे।

वस्तुतः दीपालवी का उत्सव अपने साथ पञ्च पर्वों की लड़ियाँ लेकर आता है। सही अर्थों में दीपावली पञ्च-पर्वों का पुंज है। दीपावली से दो दिन पूर्व धन-त्रयोदशी आती है। सामान्यतः लोग इसे धन यानी लक्ष्मी से जोड़कर देखते हैं परंतु यह धन शब्द धन्वंतरि देव के लिए है। माना जाता है कि इसी दिन समुद्र-मंथन से आरोग्य देव धन्वंतरि प्रकट हुये थे। इसीलिए इसे धनतेरस का त्यौहार भी कहा जाता है। इस दिन धन्वंतरि महाराज की पूजा-अर्चना करके उनसे आरोग्यता की आकांक्षा की जाती है। यह पर्व धन्वंतरि देव प्रणीत आरोग्यता के सिद्धान्तों को अपने जीवन में साकार कर सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहने का संदेश देता है। धनतेरस के उपरांत ‘नरक चतुर्दशी’ आती है। द्वापरयुग में नरकासुर ने सोलह सहस्त्र कन्याओं को बंदी बना लिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी भार्या सत्यभामा को साथ लेकर नरकासुर का वध करके उन कन्याओं का उद्धार किया था। नरकासुर को वासनाओं का प्रतीक माना जाता है एवं श्रीकृष्ण को उन वासनाओं का शमन करने वाला। इस प्रकार यह उत्सव अत्यधिक वासनाओं के शमन एवं स्त्री के शक्ति स्वरूप को स्मरण करने के रूप में मनाया जाता है। नरक चतुर्दशी के पश्चात दीपोत्सव दीपावली आती है।  दीपावली की रात्रि में देवी लक्ष्मी के साथ गणपति गणेश का पूजन होता है। सनातन धर्म में चार पुरुषार्थों को जीवन का अंग माना गया है। ये हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इस प्रकार अर्थ यानी लक्ष्मी को पुरुषार्थ रूप में स्वीकार किया गया है। किंतु वह अर्थ धर्म आधारित ही हो। अन्यथा मनुष्य के नाश का कारण बन सकता है। इसलिए कहा भी गया है- ‘रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्या:पापीस्ता अनीनशम्’ अर्थात कल्याणकारी लक्ष्मियां हमारे घर में रमण करें। हमारे देश में रमण करें, पापकारी लक्ष्मी हमसे दूर रहे। देवी लक्ष्मी के साथ गणपति की भी पूजा का विधान है। गणपति रिद्धि-सिद्धि और विवेक के स्वामी हैं। उनकी पूजा से इन तीनों की प्राप्ति होती है। इस रात्रि में ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की भी आराधना की जाती है। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि इस रात्रि में अध्ययन करने से देवी सरस्वती अत्यंत प्रसन्न होती हैं और विद्यार्थी को ‘सा विद्या या विमुक्तये’ का वरदान देकर उन पर अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाये रखती हैं। इस प्रकार दीपावली बुद्धि, विवेक, ज्ञान और धन की सिद्धि का पर्व है। दीपावली के पश्चात गोवर्धन पूजा का दिन आता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकॄष्ण ने सात वर्ष की आयु में गोवर्धन पर्वत उठाकर उसके नीचे मथुरा वासियों को शरण देकर घोर वर्षा से उनकी रक्षा की थी एवं देवराज इंद्र का मान-मर्दन किया था। गोवर्धन समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए इस दिन छोटे-छोटे गोवर्धन पर्वत बनाकर हिन्दू धर्मावलंबी उसकी पूजा करते हैं। गोवर्धन पूजा के अगले दिन भाईदूज का त्यौहार आता है। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सद्भाव का प्रतीक है। इस दिन भाई बहन की समृद्धि की कामना करता है और बहन भाई के कल्याण की कामना करती है।

यह पञ्च-पर्व किसी न किसी रूप में समूचे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं। पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में दीपावली का विशेष महत्त्व है। यहाँ दीपक जलाकर दरवाजे खोलकर रखने की परंपरा है, जिससे लक्ष्मी का घर में प्रवेश हो सके। पश्चिम बंगाल, ओडिशा एवं असम  में दीपावली के दिन मध्यरात्रि महाकाली की पूजा-अर्चना की जाती है। बिहार एवं झारखण्ड में पारंपरिक गीत, नृत्य एवं पूजा का प्रचलन है। दीपावली की मध्यरात्रि तंत्र साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। गुजरात में इस दिन रंगोली बनायी जाती है एवं लक्ष्मी के स्वागत हेतु चरणों के निशान बनाए जाते है। यहाँ दीपावली नए वर्ष के रूप में मनाई जाती है, अतएव इस दिन नया उद्योग स्थापित करना, संपत्ति खरीदना, नए कार्यालय एवं दुकान खोलना और विवाह संपन्न कराना आदि शुभ माने जाते हैं। शुद्ध घी से जलते हुए दीपकों की लौ से एकत्रित धुएं से काजल बनाकर मातृशक्ति द्वारा आँखों में लगाने की परंपरा प्रचलित है। महाराष्ट्र में व्यापारिक वर्ग धनतेरस के दिन बही-खातों की पूजा करता है। यहाँ पर नरक चतुर्दशी के दिन उबटन लगाकर सूर्योदय से पूर्व स्नान करके मंदिर जाने की परंपरा है। उत्तर भारत में यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की विजय से जुड़ा हुआ है। दूध में सिक्का डालकर पूजा पश्चात दूध को पूरे घर में छिड़का जाता है एवं पुस्तकों और अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है। दक्षिण भारत में यह पर्व नरक चतुर्दशी एवं दीपावली के दिन ही मनाया जाता है। इस क्षेत्र में दीपावली को ‘थलाई दिवाली’ कहा जाता है। इस दिन नव-विवाहित दंपत्ति लड़की के घर जाकर बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं एवं उन्हें उपहार मिलता है। इस दिन हरिकथा का भी वर्णन होता है। कर्नाटक में नरक चतुर्दशी को कृष्ण चतुर्दशी कहा जाता है। यहाँ ऐसी मान्यता है कि नरकासुर वध के पश्चात भगवान् श्रीकृष्ण शरीर में लगे रक्त के धब्बों को तेल स्नान कर मिटाया था, अतएव लोग इस दिन तेल स्नान  करते हैं। इस दिन राजा बलि से संबंधित कहानियां भी सुनायी जाती हैं। मध्य भारत में दीपावली का पर्व पांच दिनों का होता है। विजयादशमी के बाद से ही दीपावली मनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। घरों की साफ-सफाई, छबाई-पुताई के साथ ही सभी चीजों को व्यवस्थित किया जाता है एवं अनुपयोगी वस्तुओं को कबाड़ियों को बेंच दिया जाता है। रंगोली के साथ-साथ मांडना बनाना अत्यंत  मंगलकारी माना जाता है।

दीपावली जहाँ सद्भाव और सदविचार का प्रतीक है वहीं इसके साथ कुछ बुराईयां भी जुड़ गई हैं। जैसे इस दिन जुआ खेलने की प्रथा प्रचलित है, क्योंकि माना जाता है कि इस दिन की जीत वर्ष भर फलित होती है। इस अंधविश्वास के कारण आर्थिक नुकसान के साथ ही मनुष्य में बुराई का समावेश भी होता है। साथ ही मद्यपान की कुरीति भी इस दिन के साथ जुड़ गई है। पिछले कुछ वर्षों में दीपावली का संबंध दिखावे के साथ भी जुड़ गया है। विदेशी वस्तुओं से घर को अत्यधिक सजाने, पड़ोसियों के मुकाबले अधिक विदेशी पटाखे फोड़ने एवं भारी छूट के नाम पर अनावश्यक खरीदारी की प्रवृत्ति में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। पटाखों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण एवं कानफोड़ू अशान्ति को हिन्दू धर्म की अस्मिता के नाम पर पोषित किया जा रहा है। हम भूलते जा रहे हैं कि यह सब आसुरी प्रवृत्तियां हैं एवं इनसे मुक्ति पाना ही सही अर्थों में पञ्च पर्व  दीपावली को समझना एवं मनाना है।

ध्यातव्य है कि दीपावली आध्यात्मिक विकास को परिलक्षित करती है। सर्वमान्य है कि प्रत्येक मनुष्य के अंदर अच्छाई और बुराई के मध्य अनवरत द्वंद्व चलता है। अतएव हमें सदैव आंतरिक उदासीनता एवं नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करने हेतु उद्यमरत होना चाहिए। हमारे शास्त्र हमें मन पर विजय प्राप्त करने की सीख देते हैं। आचार्य चाणक्य ने भी सम्राट चंद्रगुप्त को सीख दी थी कि ‘शास्त्रों का सार इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना है’। आदि शंकराचार्य ने ‘मणिरत्नमाला’ में लिखा है: ‘जीतं जगत केन, मनो हि येन’। अर्थात मन को जीतना विश्व को विजित कर लेना है। संपूर्ण महाभारत में वेदव्यास का मंतव्य हैं, ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात जहां धर्म है, वहां विजय है। ‘धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः’ (मनुस्मृति, 8,15) का आशय है, जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसी का नाश कर देता है, एवं जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी भी रक्षा करता है।

निष्कर्षतः दीपावली समूचे भारत में भौगोलिक रूप से आध्यामिकता, सांस्कृतिक परंपराओं एवं रीति-रिवाजों की व्यापक विविधता का अद्भुत उदाहरण है। इन पञ्च पर्वों के  मंगलकारी अवसर पर अनुष्ठानों एवं पवित्र भावना से अर्जित सकारात्मक ऊर्जा का महत्व जनमानस में अंतर्निहित वैश्विकदृष्टि एवं लोकाचार का द्योतक है। अतएव अधर्म पर धर्म की विजय पताका को फलीभूत करने हेतु किए गए सभी सनातनी अलौकिक सद्प्रयासों के प्रति समस्त  मानवता को पूर्ण समर्पण के  भाव से कृतज्ञ एवं संकल्पित होना तर्कयुक्त  एवं न्याय संगत है।

 

 

आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी
कुलपति, पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा

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