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मेरा आखिरी दिन कलाम साहब के साथ — सृजन पाल सिंह

मेरा  आखिरी दिन  कलाम साहब  के साथ  — सृजन पाल  सिंह

आठ घंटे हो चुके हैं मुझे कलाम साहब से बात किये हुए। आंखों से नींद गायब है और यादें आंसुओं के रूप में रह-रह कर बाहर आती हैं। 27 जुलाई को हमारा दिन दोपहर 12 बजे शुरू हुआ जब हमने गुवाहाटी के लिए हवाई जहाज पकड़ा। उनकी सीट 1-ए थी और मेरी 1-सी। उन्होंने गहरे रंग का ‘कलाम सूट ‘ पहन रखा था। मैंने उसकी तारीफ करते हुए कहा की बढिय़ा रंग है लेकिन मुझे क्या पता था की वह रंग उनके जीवन का आखिरी रंग होगा। मानसूनी हवाओं में ढाई घंटे का वो सफर। मुझे हवाई झंझावातों से हमेशा से डर लगता रहा है पर कलाम ने इस डर पर काबू पा लिया था। जब भी वो मुझे डरते देखते, झट से खिड़की के पट गिराते हुए कहते ‘लो अब कोई डर नहीं दिखाई दे रहा। ‘

इसके बाद हमें कार से सफर करते हुए ढाई घंटे में भारतीय प्रबंध संस्थान शिलॉन्ग पहुंचना था। इन पांच घंटो के सफर में हमने न सिर्फ बातचीत की बल्कि कई मुद्दों पर बहस भी। इन मुद्दों में तीन मुद्दे खास थे जो मेरी कलाम साहब के साथ गुजारे आखिरी यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण थे। पहला कलाम साहब पंजाब में हुए आतंकी हमलों से काफी परेशान थे। जान-माल के नुक्सान से वो काफी व्यथित थे। चूंकि शिलॉन्ग में लेक्चर का टॉपिक ‘धरती को रहने लायक कैसे बनाया जाये’ था तो उन्होंने पंजाब के हमलों को इससे जोड़ते हुए कहा की ‘ऐसा लगता है की मानव जनित कार्य प्रदुषण की तरह धरती को खत्म करने में सहायक होंगे।’ यह पूछने पर की अगर ऐसी हरकतें होती रहीं तो मानव को धरती से खत्म होने में कितना समय लग जायेगा, इस पर उन्होंने कहा की ‘ज्यादा से ज्यादा 30 साल, और आप लोगों कुछ करना चाहिए इस संबंध में। ये आपका भविष्य है।’

हमारी दूसरी बहस ज्यादा राष्ट्रीय थी। पिछले दो दिनों से संसद के कार्यों में व्यवधान आते देख कलाम काफी परेशान थे। उन्होंने कहा मैंने अपने कार्यकाल में दो अलग-अलग सरकारे देखी हैं और भी सरकारे देखी है, व्यवधान हमेशा रहते ही हंै। यह सही नहीं हैं। मुझे इसके लिए कोई रास्ता सोचना ही होगा ताकि संसद विकास की राजनीति पर ध्यान केंद्रित कर सके। उसके बाद उन्होंने मुझे भारतीय प्रबंध संस्थान के छात्रों के लिए एक सवाल तैयार करने को कहा जो वह अपने लेक्चर के अंत में पूछते। वह चाहते थे की छात्र कुछ नए सुझाव दे जिससे संसद सुचारू रूप से चलाने में मदद मिल सके। फिर उन्होंने खुद से ही सवाल किया कि ‘मैं कैसे उन लोगों से सुझाव मांगू जब की मेरे पास ही इसका कोई हल नहीं है।’ अगले एक घंटे तक हम इसी मुद्दे पर माथापच्ची करते रहे। हम इस मुद्दे को उनकी अगली किताब एडवांटेज इंडिया में शामिल करना चाहते थे।

तीसरी बहस उनकी विनम्रता को दर्शाती है। गुवाहाटी से शिलॉन्ग जाते समय रास्ते में कलाम साहब के काफिले में 6-7 गाडिय़ां थी। कलाम साहब और मेरी गाड़ी के ठीक आगे वाली खुली जिप्सी पर तीन जवान थे। जिप्सी पर दो जवान बैठे हुए थे और उनका तीसरा साथी जवान खड़ा था। कलाम साहब ने मुझसे पूछा कि जवान खड़ा क्यों है, ऐसे तो वह थक जाएगा। यह सजा की तरह है। उसे बैठने के लिए कह दो।’

कलामजी के कहने पर मैंने रेडियो से जवान को संदेश देने की कोशिश की लेकिन रेडियो काम नहीं कर रहा था। अगले डेढ़ घंटे के सफर में कलामजी ने मुझे दो-तीन बार याद दिलाया कि जवान से बैठने के लिए कहो। इसके बाद डॉक्टर कलाम ने मुझे कहा कि वे जवान से मिलकर शुक्रिया अदा करना चाहते हैं।

आईआईएम शिलॉन्ग पहुंचने के बाद डॉक्टर कलाम ने जवान से हाथ मिलाया और उससे पूछा कि क्या तुम थक गए हो, कुछ खाना चाहोगे? कलाम साहब ने कहा कि मेरे कारण तुम्हें खड़ा रहना पड़ा मैं इसके लिए माफी चाहता हूं। डॉक्टर साहब के यह कहने के बाद युवा जवान आश्चर्य से भर गया। जवान ने कहा कि सर आपके लिए मैं तीन घंटे क्या छह घंटे भी खड़ा रह सकता हूं।

15-08-2015

इसके बाद हम लेक्चर हॉल में पहुंचे। वो लेक्चर के लिए लेट नहीं होना चाहते थे। उनका हमेशा मानना था की छात्रों को कभी इंतजार नहीं कराना चाहिए। मैंने जल्दी से उनकी माइक लगाई, लेक्चर के बारे में बताया और अपने स्थान पर चला गया। जब मंै उनकी माइक लगा रहा था तो उन्होंने मुझसे पूछा ‘फनी लड़के, क्या तुम ठीक हो? उनका फनी लड़का कहना बहुत से संभावनाओं के द्वार खोल देता था। इसका मतलब कुछ भी हो सकता था। हो सकता है कि आपने अपना काम ठीक से न किया हो या फिर ठीक से किया हो। मैंने उनके इस वाक्य को ठीक से समझ लिया था अलबत्ता यह आखिरी बार था।

मैं उनके पीछे बैठा था। उनके दो मिनट के भाषण के बाद मैंने महसूस किया कि उन्होंने कुछ ज्यादा ही लंबा ठहराव ले लिया है। जैसे ही मैंने उनकी तरफ नजर उठाई, तभी वह गिर गए।

हमने उन्हें उठाया। डॉक्टर दौड़ता हुआ आया और हमने वह सब कुछ किया, जो कर सकते थे। मैं उनकी बिल्कुल थोड़ी सी खुली आंखों का वह मंजर नहीं भूल सकता। एक हाथ से मैंने उनका सिर पकड़ा था। उनका हाथ मेरी उंगली पर भिंचा हुआ था। उनके चेहरे पर स्थिरता थी और उनकी उन खामोश आंखों से मानो ज्ञान की आभा बिखर रही थी।

उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनके चेहरे पर दर्द का भी नामो-निशान तक नहीं था। पांच मिनट के अंदर हम नजदीकी अस्पताल में थे। कुछ ही मिनटों में उन्होंने हमें बताया कि मिसाइल मैन ने उड़ान भर ली है, हमेशा के लिए। मैंने आखिरी बार उनके चरण स्पर्श किए। और कहा अलविदा बुजुर्ग दोस्त! महान परामर्शदाता! विचारों में दर्शन करूंगा और अगले जन्म में मुलाकात होगी।

पीछे देखने पर विचारों की एक लम्बी श्रृंखला मन में कौंध सी जाती है। अक्सर वह मुझसे पूछा करते थे ‘तुम अभी जवान हो, तय कर लो तुम किस चीज के लिए याद किया जाना पसंद करोगे?’ मै हर दिन कुछ नया सोचता लेकिन आखिर में मैंने उनसे ही यह सवाल कर दिया। मैंने पूछा ‘पहले आप बताइये की आप किस चीज के लिए याद किया जाना पसंद करेंगे, राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइल मैन, भारत 2020 या टारगेट 3 बिलियन, क्या?’ मैंने सोचा की मैंने उनका काम आसान कर दिया है इतने सारे ऑप्शन दे कर लेकिन उन्होंने फिर मुझे आश्चर्यचकित करते हुए उत्तर दिया ‘शिक्षक’।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो ये पाता हूं की उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा भी शिक्षक के रूप में ही तय की। अपने आखिरी समय तक वह काम करते रहें, लेक्चर देते रहें। वह हमें एक शिक्षक के तौर पर ही छोड़ के चले गए। वह इस दुनिया से चले गए, अपने साथ लोगों का प्यार और शुभ कामनाये लेकर। वह अपने अंत में भी सफल रहें। द मैन इज गॉन, द मिशन लिव्स ऑन। कलाम अमर रहें। आपका आभारी छात्र

      सृजन पाल सिंह

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