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सरकार के नीति निर्धारण में संघ की वैचारिक छाप

सरकार के नीति निर्धारण में संघ की वैचारिक छाप

देश की मौजूदा राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्वपूर्ण स्थान है। राजनेता अपने-अपने तरीके से संघ को परिभाषित करते हैं लेकिन यह कहा जाए कि संघ की भूमिका कहने को तो राजनीति में सक्रियता नहीं दिखाती। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है आज देखा जाए तो शासन में  महत्वपूर्ण पद बैठे हुए लोग कवि संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। उनके मन में संघ के प्रति निष्ठा और नजदीकी देखी जा सकती है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रचारक रहे हैं इसके अलावा अगर देखा जाए तो मौजूदा स्थिति में  केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह,केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी सहित विभिन्न राज्यों के राज्यपाल और कई राज्यों के मुख्यमंत्री संघ के सक्रिय सदस्य रहे। इससे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुंदर सिंह भंडारी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी अखिल भारतीय स्तर के नेता संघ के कार्यकर्ता  रहे हैं।

वर्तमान राजनीति में सत्ता की कुंजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बताया जाता है। वहीं संघ यह कहकर अपने आपको अलग कर लेता है कि संघ गैर राजनीतिक और सामाजिक संगठन है उसका सीधे तौर पर राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। जबकि वास्तविकता अलग है पर्दे के पीछे से मौजूदा स्थिति में देश जो भी नीति बनाई जा रही है उसमें संघ की भूमिका दिखाई पड़ती है। केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर से धारा 370 का  हटाना और राम मंदिर निर्माण,असम में एनआरसी का मुद्दा और हिंदूवाद जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण निर्णय में संघ के नीति को केंद्र सरकार ने अपनाया है।

संघ पर मौजूदा कांग्रेस के नेता कई प्रकार के आरोप लगाने का काम करते हैं। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सांसद राहुल गांधी तो सीधे तौर पर संघ को संप्रदायिकता फैलाने का सीधा तौर पर आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब यह देखा जाए कि कोई जमाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पहले    प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार बाल गंगाधर तिलक और सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हुए थे। उन्होंने वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के वर्धा के जंगल आंदोलन में सत्याग्रह किया था और वे 9 महीने तक जेल गए थे । इस सच्चाई को बहुत कम लोग जानते हैं।

वर्तमान में कांग्रेस के लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना घोर विरोधी संगठन मानते हैं जबकि  वर्ष 1984 में  संघ ने कांग्रेस का समर्थन किया था। वीर सावरकर को लेकर कांग्रेस में विरोधाभास की स्थिति बनी रहती है और हकीकत को जाने तो तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री वसंत साठे ने सावरकर पर फिल्म का निर्माण कराया था और उनकी याद में स्मारक बनाने के लिए मुंबई में जगह दी गई थी।यह बात भी सही है उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी से संघ पर प्रतिबंध लगाने का विरोध भी किया था और कहा था कि आखिर इस संस्था पर प्रतिबंध क्यों लगाया जा रहा है। लेकिन इंदिरा गांधी ने उनकी नहीं सुनी। अगर पुराना इतिहास देखा जाए तो संघ के प्रति कांग्रेस के नेताओं का रुख अच्छा था और उन्होंने कई बार संघ के कार्यों को लेकर प्रशंसा भी की। 16 दिसंबर 1947 को महात्मा गांधी ने दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में शामिल होकर उन्हें संबोधित भी किया था। गांधी भी संघ के अनुशासन और सामूहिक एकता के मुरीद हुआ करते थे। यह बात भी सही है सरदार वल्लभभाई पटेल अपने गृहमंत्री के कार्यकाल में संघ पर प्रतिबंध भी लगाया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू,  इंदिरा गांधी और नरसिंहाराव ने अपने शासनकाल में भी संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था लेकिन उसे हटाना पड़ा था।

लेकिन सरदार बल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या में संघ की भूमिका से इनकार किया था। वर्ष 1962 भारत-चीन युद्ध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका से प्रभावित होकर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के गणतंत्र दिवस समारोह में संघ के कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय परेड में शामिल करने के लिए आमंत्रित किया था। नेहरू के आमंत्रण पर ही संघ के 3000 स्वयंसेवक गणतंत्र दिवस के समारोह पर आयोजित परेड में शामिल हुए थे। वर्ष 1965 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश के विभिन्न राजनीतिक  और सामाजिक संगठन के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी बुलाया गया था। वर्ष 1977 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सर्वदलीय बैठक में संघ के नेता को भी आमंत्रित किया था। राजीव गांधी भी संघ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

जनता पार्टी  के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जयप्रकाश नारायण भी संघ की ऊर्जा और उनके कार्यकर्ताओं की निष्ठा से प्रभावित थे। संघ के नानाजी देशमुख ने जयप्रकाश नारायण के जीवन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शिवसेना के सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे ने भी संघ की खुले रूप से तारीफ की थी। वर्ष 2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन को भी संघ समर्थन किया था।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी संघ के खिलाफ बोलते रहते हैं। उन्होंने अपने शासनकाल में एक परिपत्र जारी कर सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर इस बात का प्रतिबंध लगा रखा है कि वे संघ की शाखा में शामिल नहीं होंगे। लेकिन इस परिपत्र का प्रदेश में खुला उल्लंघन हो रहा है और कई सरकारी कर्मचारी अधिकारी शाखा में गुपचुप से नियमित रूप से शामिल हो रहे हैं।  कोरोना काल में संघ की विशेष भूमिका देखी गई पीड़ित परिवारों की खुले रूप से मदद की।

अब चाहे कोई भी कुछ भी कहे लेकिन केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर संघ के कार्यकर्ता मौजूद हैं। विभिन्न सरकारी संस्थाओं में भी संघ के पदाधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी हुई है। मंत्रिमंडल के सदस्यों के यहां संघ के कार्यकर्ता महत्वपूर्ण भूमिका में है और आज यह कहा जाए कि संघ की मर्जी के बिना केंद्र सरकार में निर्णय नहीं हो पाते हैं।  भाजपा के संगठन में देश और प्रदेशों के संगठन महामंत्री संघ से ही लिए जाते हैं। संगठन महामंत्री की भूमिका निश्चित तौर पर देश और प्रदेशों  के पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण मानी जाती है वह हर निर्णय में सक्रियता दिखाते हैं।

मौजूदा स्थिति में मोहन भागवत सरकार से दूर रहकर भी सरकार के निर्णय में अपनी नीति को लागू कराने में सक्रिय नजर आते हैं। हाल ही में देश के उपराष्ट्रपति जगदीप  धनकड़ की खोज में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंचालक मोहन भागवत की भी अहम भूमिका मानी जाती है। उपराष्ट्रपति के निर्णय से पहले मोहन भागवत उपराष्ट्रपति  के पैतृक गांव झुंझुनू रहे। इससे पहले बंगाल का राज्यपाल बनाया गया था ।  यह कहा जाता है कि संघ को मालेगांव और अजमेर दरगाह के बम विस्फोट शामिल होने के आरोपों से मुक्ति दिलाने में भी  धनखड़ ने अहम भूमिका निभाई थी।

 

श्याम सुंदर शर्मा

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