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संघ और सरकार

संघ और सरकार

भारत इन दिनों जिस दौर में पहुंच गया है, उसमें एक शब्द बहुत गहरे से प्रचलित हुआ है। अंग्रेजी का यह शब्द है– नैरेटिव। आज के दौर की चाहे सामाजिक स्तर की लड़ाई हो या फिर राजनीतिक, सारी लड़ाइयां नैरेटिव की बुनियाद पर ही लड़ी जा रही हैं। ऐसा सिर्फ राष्ट्रीय या राज्य के स्तर पर ही नहीं हो रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्तर की लड़ाई का सबसे बड़ा आधार और हथियार नैरेटिव ही है। यूं तो आजादी के तत्काल बाद से ही कांग्रेस और वामपंथी धारा की राजनीति के निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहा है। लेकिन इस निशानेबाजी का भी आधार इन दिनों नैरेटिव ही बन गया है। इसका असर है कि कांग्रेस और वामपंिथयों को जब भी संघ पर हमला करना होता है तो नए-नए नैरेटिव का वह सहारा लेते हैं।

इन दिनों संघ को निशाने पर लेने के लिए भारतीय जनता पार्टी को भी उसके विपक्षी दल कुछ ज्यादा ही जरिया बना रहे हैं। अतीत में जब भी भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर सत्ता में आई, विपक्षी पार्टियां विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों को उन्हें नागपुर के इशारे पर चलने वाली सरकार कहने से परहेज नहीं रहा। चूंकि पिछले आठ सालों से भारतीय जनता पार्टी केंद्र की सरकार चला रही है, और चुनाव दर चुनाव जिस तरह वह विजय गाथा लिखती जा रही है, उससे सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस और भाजपा की घोर विरोधी वामपंथी पार्टियां इन दिनों कुछ ज्यादा ही आक्रामक हैं। इस आक्रमण में संघ को भी खूब निशाना बना रही हैं। इससे भी एक नैरेटिव बन रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सिर्फ और सिर्फ संघ ही चला रहा है।

संघ ने कभी स्वीकार नहीं किया कि वह राजनीतिक संगठन है। बेशक वह देश का सबसे बड़ा संगठन है। तमाम मोर्चों पर उसके संगठन काम कर रहे हैं, जिनमें रचनात्मक काम ज्यादा हैं। जैसे वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय, विवेकानंद फाउंडेशन जैसे संगठनों का राजनीति से मुश्किल से कुछ लेना-देना है। वे अपनी तरफ से सामाजिक उत्थान में लगे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को हमेशा सांस्कृतिक संगठन कहता रहा है। लेकिन यह धारणा है कि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ और सिर्फ उसका ही अंग है। जब-जब सवाल उठता है तो संघ का कहना होता है कि भारतीय जनता पार्टी उसका राजनीतिक अंग नहीं है। हां, उसके स्वयंसेवक भाजपा में ज्यादा हैं।

बहरहाल यह भी सच है कि सरकार की कुछ नीतियों पर उसका असर दिखता है। विशेषकर सांस्कृतिक और शैक्षिक मामलों में संघ के विचार भाजपा की सरकारों की नीतियों में झलकते हैं। लेकिन भाजपा सिर्फ और सिर्फ संघ के इशारे पर ही काम करती है, यह नैरेटिव का अर्द्धसत्य है। अतीत में वाजपेयी सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी खुलेआम विरोध जता चुके थे। हाल के दिनों में गरीबी को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने जो बात कही थी, उसे भी सरकार के खिलाफ माना गया। दत्तात्रेय होसबोले ने गरीबों के उत्थान की बात की थी।

संघ के बारे में एक धारणा विपक्षी दलों ने यह बनाई है कि वह भाजपा सरकारों के कामकाज में दैनंदिन हस्तक्षेप करता है। संघ की जो कार्यशैली जानते हैं, उन्हें पता है कि संघ की भाषा और शैली आक्रामक नहीं हैं। वह हस्तक्षेप और नियंत्रण की पारंपरिक दबंग शैली से परहेज करता है। भारतीय जनता पार्टी में चूंकि दो तरह के कार्यकर्ता हैं। पहली श्रेणी में वे कार्यकर्ता आते हैं, जो निष्ठावान है और उसके साथ उसकी पारंपरिक छवि – पार्टी विथ डिफरेंस- वाली वैचारिक सोच से जुड़े हैं। वहीं दूसरी तरह ऐसे भी कार्यकर्ता हैं, जो बाकी दलों के कार्यकर्ताओं की तरह किंचित व्यक्तिगत चाहतों के चलते जुड़े हैं। पहली तरह के कार्यकर्ताओं के लिए सिद्धांत कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, जबकि दूसरी श्रेणी के कार्यकर्ताओं के लिए सिद्धांत गौड़ है। चूंकि भाजपा लगातार बड़ी पार्टी बनती जा रही है। समुद्र बनती पार्टी में कार्यकर्ता रूपी तमाम तरह के नदी-नालों का आना स्वाभाविक है। जाहिर है कि ऐसे में वैचारिक द्वंद्व होना ही है। इस द्वंद्व का असर भी कई बार भारतीय जनता पार्टी और संघ के रिश्तों को लेकर सवाल उठाने का मौका देता है। संघ और भाजपा पर नुकीले सवालों की बरछी चलाने वाले संगठनों और राजनीतिक दलों के लिए ऐसे द्वंद्व बढ़िया मौका मुहैया कराते हैं।

आज लोकतंत्र का बोलबाला है। आज किसी न किसी रूप में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का जीवन के तमाम अंगों पर असर है। संघ और भारतीय जनता पार्टी पर ऐसे असर नजर आते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक हिस्सा वैचारिक भिन्नता भी है। यह भिन्नता ही कई बार संघ और भाजपा के रिश्तों की पड़ताल या मीमांसा का जरिया बन जाती है।

नैरेटिव की लड़ाई में मान लिया गया है कि भाजपा सिर्फ और सिर्फ संघ का ही हिस्सा है। किंचित यह सत्य हो सकता है। लेकिन सर्वथा सत्य मानना सही नहीं होगा। लेकिन नैरेटिव का ही असर है कि सरकार के फैसलों पर जब भी सवाल उठाया जाता है, संघ को भी निशाने पर ले लिया जाता है। हालांकि आमतौर पर देखा गया है कि राजनीतिक सवालों पर अक्सर संघ जवाब देने से बचता है। कई बार जवाब देता भी नहीं। वह ऐसे सवालों को अनदेखा करके आगे बढ़ जाता है और अपने रचनात्मक काम में और तल्लीनता से जुड़ जाता है।

हां, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यह स्वीकार करने से कभी परहेज नहीं रहा कि वह भारत के सांस्कृतिक गौरव को स्थापित करने और हिंदुत्व की उदारवादी व्यवस्था के तहत मानव विकास की सोच से प्रभावित है। वह इसी अंदाज में काम भी करता है। संघ के बारे में अवधारणा बना दी गई है कि वह कठोर संगठन है। जबकि 2018 के अपने व्याख्यान में संघ प्रमुख मोहन भागवत स्वीकार कर चुके हैं कि प्रगति के लिए विचारों में लचीलापन से संघ को परहेज नहीं है।

संघ और सरकार के रिश्ते कुछ बिंदुओं पर समान हो सकते हैं तो कई मसलों पर अलग भी हैं। इस संदर्भ में संघ और सरकार के रिश्तों को लेकर जो अर्धसत्य वाला नैरेटिव है, उसकी भी पड़ताल होनी चाहिए। सही और मुकम्मल तस्वीर के लिए ऐसा होना आवश्यक है।

विशेष प्रतिनिधि

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