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तुष्टीकरण और इस्लामीकरण के रास्ते में खड़ी संघ की चट्टान

तुष्टीकरण और इस्लामीकरण के रास्ते में खड़ी संघ की चट्टान

जिस आजाद भारत का सपना महात्मा गांधी ने देखा था, वो देश की आजादी के बाद बराबर टूटता चला गया। राष्ट्र निर्माण की धुरी गांव, गरीब, किसान की ओर सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। गांधी का स्वदेशी विचार और अंधाधुंध औद्योगिकीकरण को रोकनें के तिलांजली देकर पश्चिमी तौर-तरीके अपनाते चले गये। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारतीयता की संस्कृति और राष्ट्र रक्षा का दूत बन कर अपना काम करता रहा। यूं तो आजादी के बाद बहुसंख्यकों की अनदेखी कर मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओं के ऊपर प्राथमिकता दी गयी। इसकी एक बानगी तब देखनें को मिली जब मुसलमानों को प्रसन्न करने जम्मू-कश्मीर राज्य में धारा 370 लगाई गयी।

जिसके विरूद्ध उस समय के वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने आवाज भी उठायी थी पर नेहरू राज में उसकी अनदेखी हुयी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उस हर कार्यवाही का विरोध किया जो राष्ट्रहित में नहीं थी या हिन्दुओं के साथ अन्याय करती हो। संघ की राष्ट्रभक्ति के कारण बढ़ते प्रभाव को देख कर, उसे रोकने के लिये समय समय उस पर प्रतिबन्ध लगाये गये जिन्हें अब सामने आने पर हटाया भी गया।

संघ की ओर से हम कोई सफाई या उसकी किसी तरह की वकालत नहीं करेंगे पर एतिहासिक सच लिखना आवश्यक है। इसलिये हम आजादी मिलनें के तुरन्त बाद हिन्दुओं के साथ हुए अन्याय को बताना चाहते हैं। 7 नवम्बर 1947-दीवाली का दिन-हिन्दुओं का त्योहार-स्थान-राजोरी, कश्मीर। उस दिन पाकिस्तानी सेना ने कत्लेआम किया, हिन्दुओं की बहु-बेटियों के साथ अनगिनत रेप किये। कई महिलाओं ने जहर खाकर और कुओं में कूदकर आत्म हत्या की। लगभग तीस हजार हिन्दुओं को मार डाला गया। तब संघ के मुखिया माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने उनकी सहायता का बीड़ा उठाया और हजारों स्वयं सेवक सहायता के लिये पहुंचे। उसमें बहुत से स्वयं सेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

जब पाकिस्तानी कबालियों ने घुसपैठ की और पूरे कश्मीर पर कब्जा करना चाहा और काफी स्थान पर कर भी लिया तब वहां के महाराजा हरीसिंह की भारत से सुलह करवाने का काम संघ के श्री गोलवलकर जी ने किया था वे स्वयं कश्मीर में उन्हें समझाने गये थे। इस तरह कश्मीर के भारत में विलय कराने के लिये गोलवलकर के प्रयास सदा याद किये जायेंगे। उस समय संघ ने 3000 से अधिक राहत शिविर लगाये खुद स्वयं सेवकों ने हवाई अड्डे की मरम्मत की तब जाकर भारतीय सेना पहुंची और पाकिस्तान आर्मी को मार भगाया।

1962 में युद्ध के समय संघ के कार्यकर्ताओं ने सीमा पर रसदपूर्ति का काम किया। यकायक चीन द्वारा देश की सीमाओं पर कब्जा किया गया। भारत युद्ध के लिये तैयार नहीं था ऐसे में संघ के सेवकों ने हर तरह से सीमा पर पहुंचकर सेना की मदद की। इस बहादुरी के काम को देख कर स्वयं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1963 की परेड में स्वयंसेवकों को 26 जनवरी को सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया। मात्र दो तीन दिनों में 3000 से अधिक स्वयं सेवक तैयार हो गये। जिस संस्था के कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय परेड में सम्मान दिया गया हो, उस पर राजनैतिक लाभ उठाने और वोटों के लालच में समय-समय पर उंगली उठायी जाती है। पाकिस्तान में हुये 1965 के युद्ध में भी स्वयं सेवक ने सड़कों से बर्फ हटानें का काम किया और खुलकर रक्तदान किया।

1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लोगों के कश्मीर जाने पर परमिट लगाने और वहां पर भारतीयों को सम्पत्ति खरीदने पर रोक लगाने का विरोध किया। उन्होनें जम्मू-कश्मीर जाने का प्रयास किया तो पहले उन्हें रोका गया। बकौल अटल बिहारी बाजपेयी और अन्य नेता के कहे अनुसार मुखर्जी को जाने तो दिया पर उनके लौट के नहीं आ पाने का षडयंत्र नेहरू सरकार और कश्मीर सरकार ने रचा। संघ से जुड़े मुखर्जी ने भारत में दो संविधान और दो झंडो का भी विरोध किया अंततः गोपनीय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुयी। जिसकी जांच तक से सरकार ने इन्कार किया। इस तरह संघ के उसके नेताओं, कार्यकर्ताओं का राष्ट्र पर बलिदान होने का लम्बा इतिहास है।

दादरा और नगर हवेली, गोवा को विदेशी साम्राज्य से मुक्ति दिलानें के लिये संघ बनाकर लगातार आंदोलन करता रहा। 1954 में दादर हवेली को पुर्तगालियों से खाली करवानें में अहम भूमिका निभायी। स्वयंसेवकों ने गोवा में खुद जाकर पुर्तगाली झंडा उखाड़ फेंके और भारतीय झंडा लहरा दिया इस तरह गोवा में आजादी की नींव डाली।

संघ पर गांधी की हत्या में सम्मिलित होने के संदेह पर प्रतिबन्ध लगाया जो जांच उपरांत असत्य पाया गया तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने स्वयं इस प्रतिबन्ध को हटाया। संघ का पूरा इतिहास राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र के लिये बलिदान देने से भरा हुआ है उसकी बढ़ती लोकप्रियता विरोधियों के लिये बराबर चिंता का विषय रहती है और वे तरह तरह के अनर्गल हथकंडे लगाते रहते हैं।

संघ राजनीति नहीं करता है पर सनातन धर्म की और सनातनियों की रक्षा करना और देश की रक्षा करना उसका मुख्य ध्येय है इसलिये उनको राजनीति पर कड़ी नजर रखना पड़ती है और रखना भी चाहिये। संघ से निकल कर राजनीति में आये लोगों में राष्ट्रप्रेम, स्वदेश की भावना और हिन्दु धर्म के साथ किये जाने वाले अन्याय को रोकना उनका कर्तव्य है। उनकी निष्ठा और कार्य की क्षमता के कारण भाजपा की सरकार को जनता ने केन्द्र में दुबारा चुना। संघ से निकले शीर्षस्थ नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय राजमार्ग परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने जबसे देश की कमान संभाली है तब से संघ के एजेण्डे का एक राष्ट्र, एक झंडा, एक संविधान और हिन्दु आस्थाओं और मंदिरो की रक्षा पर काम हो ही रहा है। साथ में गांधीवाद के रामराज्य स्थापना की ओर कदम बढ़ रहे हैं। गरीबों को अन्न, आवास, शौचालय की सुविधा गांवों का विकास और स्वदेशी वस्तुओं का निर्माण और प्राथमिकता उसका जीता-जागता प्रमाण है। कई बार लोग कयास लगाते हैं कि नितिन गडकरी को भाजपा के केन्द्रीय चुनाव से हटाने के कारण यदि वे भाजपा का साथ छोड़े ंतो विपक्ष उन्हें प्रधानमंत्री बना सकता है। ये भूल जाते हैं कि गडकरी संघ से निकले है और वे इस अनुशासन को कभी नही तोड़ेगें।

इस्लामिक राष्ट्र का सपना देखने वाले और छुट भैया नेता जैसे ओवेशी के भाई की धमकियों के बीच राष्ट्रीय स्वयं संघ अटल चट्टान की तरह खड़ा रहता हैं। तुष्टीकरण की राजनीति कर मुसलमानों के वोट लेने वाली राजनैतिक पार्टियों को जनता ने धूल चटा दी है। मदरसों को मदद और हिन्दु मंदिरों से टैक्स वसूलने वाली सरकारों के तुष्टीकरण की राजनीति फेल हो गयी सच कहें तो कंाग्रेस की तुष्टीकरण राजनीति ने संघ को और अधिक मजबूती दी है। संघ में 1 करोड़ से अधिक स्वयं सेवकों का होना इसका प्रमाण है।

 

 

डाॅ. विजय खैरा

 

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