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PM मोदी के कार्यों पर संघ की वैचारिक छाप : भारत के स्वर्णिम भविष्य की आहट सुन रहा विश्व

PM मोदी के कार्यों पर संघ की वैचारिक छाप : भारत के स्वर्णिम भविष्य की आहट सुन रहा विश्व

साल 2002 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कुरुक्षेत्र में आयोजित प्रतिनिधि सभा ने जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया था। उन दिनों केंद्र में प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी। प्रस्ताव को लेकर कुछ दिन समाचार माध्यमों में चर्चा चली किन्तु शासन के स्तर पर उस प्रस्ताव पर शायद ही कोई ध्यान दिया गया। तब माना यही जा रहा था कि जिस सरकार में स्वयंसेवक शामिल हैं और नेतृत्व कर रहे हैं, संभवतः प्रस्ताव के कुछ बिन्दुओं पर वो सहयोगी दलों को तैयार कर सकें। कहने की आवश्यकता नहीं है कि संविधान के अस्थायी उपबंध अनुच्छेद 370 को हटाने का मुद्दा तो संघ की केंद्रीय मांग में सदैव सर्वोपरि रहता ही आया था। तो जो सवाल 2002 में उठा, उस पर उस समय शासन में शामिल स्वयंसेवक गठबंधन की मजबूरी और बहुमत के अभाव के कारण मन मसोस कर चुप रहे, उसी मुद्दे को 17 साल बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2019 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अमली जामा पहनाया। न केवल अनुच्छेद 370 को इतिहास की धारा में सदा के लिए बहा दिया बल्कि लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देकर उन तमाम विस्थापितों और राज्य के अल्पसंख्यकों को खुशी से भर दिया जो किन्हीं कारण से अपने ही देश में मताधिकार से वंचित होकर संविधान सम्मत मौलिक अधिकारों और अन्य लाभों से वंचित कर दिए गए थे।

मौजूदा समय में आरएसएस और बीजेपी अथवा आरएसएस और सरकार के संबंधों को समझना कुछ कठिन नहीं है।यह सभी राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वैचारिकी के लिहाज से केंद्र की मोदी सरकार और उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन में चल रही अन्य डबल इंजन वाली राज्य सरकारें पूरे रूप में संघ विचार के साथ समन्वित रूप में काम कर रही हैं। जिन जिन प्रमुख मुद्दों को लेकर आजादी के बाद से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लगातार देश में शाखाओं का विस्तार किया, उन मुद्दों पर भौतिक रूप में या तो काम पूरा हो रहा है या फिर आने वाले समय में पूरा हो जाएगा, इसमें किसी को संदेह नहीं है। अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के साथ रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के सवाल को भी भारतीय राजनीति ने असंभव मान लिया था। आतंकवाद के अनेक रूपों की विकरालता देखकर लगता था कि मानो देश की जनता के नसीब में ही मरमरकर जीना लिखा है। लेकिन अब बदले हुए हालात में सभी राहत की सांस ले रहे हैं, इससे कौन इन्कार कर सकता है।

विगत 8 सालों की अक्लांत, अनथक तपस्या और निरंतर देश के भविष्य को गढ़े जाने के प्रत्येक अवसर के प्रति शासन तंत्र की मुस्तैदी स्वयं में संकेत देती है कि भारत अपने बेहतरीन समय की ओर बढ़ चला है। काशी से अयोध्या, केदारनाथ-बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब तक, कुल्लू से करतारपुर कॉरिडोर तक, कश्मीर से केरल और कर्नाटक, तमिलनाडु से असम और मेघालय तक बुनियादी ढांचे के विकास, तीर्थ स्थानों के पुनरोद्धार, महाराज मार्ग के विस्तार, साफ-सफाई और स्वस्थ जीवन के आग्रह को लेकर एक नई लहर उत्पन्न हो चुकी है।

स्पष्ट है कि स्वयंसेवकों ने जो बाहरी और भारत के भौतिक ढांचे में बदलाव के जो सपने देखे वो तो पूरे हो ही चले हैं, अंदुरुनी तौर पर खेती-किसानी, रोजगार, हुनर-कौशल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और शिक्षा, ग्रामीण स्तर पर बुनियादी ढांचे और लघु-कुटीर उद्योगों की बेहतरी और सुन्दर साफ सुथरे शहरों की संकल्पना पर तेजी से मोदी सरकार ने कदम आगे बढ़ाए हैं।

इसी साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कर्णावती की प्रतिनिधि सभा में स्पष्ट किया था कि देश की आर्थिकी में स्थानिक उत्पादों, लघु और कुटीर उदयोंगों, ग्रामीण उद्यमों, कौशल-हुनर आधारित उपक्रमों के बुनियादी आधार को मजबूत किया जाना भारत के सुखद भविष्य के लिए बहुत जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में चीन की सरहद के समीप उत्तराखंड के ग्राम माणा में ग्रामीण महिलाओं, आर्थिक समूहों की विशाल सभा में बार-बार इस बिन्दु को रेखांकित किया और देश का आह्वान भी किया कि वो अपने पर्यटन और तीर्थाटन के समय, खरीदारी के समय लोकल के प्रति वोकल हों। कम से कम अपने खरीदारी बजट का पांच प्रतिशत स्थानिक उत्पादों को खऱीदने पर  खर्च करें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। समाज के किसी भी वर्ग और समूह के प्रति उनके मन में भेदभाव का लेशमात्र स्थान नहीं दिखता है। सरकार की योजनाओं में दिव्यांगों, अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों, वंचितों-शोषितों-पिछड़ों और महिलाओं समेत गरीब तबकों पर विशेष ध्यान दिया है। देश की सामूहिक शक्ति को जगाकर कोरोना आपदा पर जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने काबू पाया, यह तरीका उनके भीतर के स्वयंसेवक और नेतृत्व-कौशल के सदैव जागृत और सतर्क रहने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वैश्विक बाजारीकरण, उदारीकरण और भयानक अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट प्रतिस्पर्धा में मोदी सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के मंत्र को फिर से नई ऊंचाई दी है। देश में स्वदेशी तकनीकी और स्वदेशी उत्पादों को जिस स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है, उसने भारत के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में नई उम्मीद जगा दी है। प्रधानमंत्री दिन रात स्टार्टअप्स, इनोवेशन स्मार्टनेस के साथ युवा शक्ति को जगाने में जुटे हैं। देश की सकारात्मक ऊर्जा को दिन-रात आवाज दे रहे हैं। रेडियो पर प्रसारित मन की बात ने सुसमाचारों, अच्छे प्रयासों के प्रति लोगों में नया नजरिया पैदा किया है। लोग उनकी बात पर भरोसा करते हैं, उनका अनुसरण करते हैं। देशी प्रतिभाओं और देशी भाषाओं के प्रति जो नया उन्मेष भारत में पैदा हुआ है, भारतीय भाषाओं में आधुनिक पढ़ाई को पंख लग रहे हैं तो यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती प्रचारकों, संघ की नित्य प्रार्थना और स्वयंसेवकों की प्रतिज्ञा के अनुरूप ही है जिसमें संपूर्ण देश और संपूर्ण समाज को एक दूसरे से जोड़कर निरंतर सभी की प्रगति के रास्ते खोलना ही वह रास्ता है जिसमें से भारत का सुनहरा भविष्य निखरकर सामने आ सकता है।

जाहिर तौर पर राष्ट्र जीवन के सभी क्षेत्रों में भारत केंद्रित व्यवस्था को आगे रखने की संघ की हर उस नीति को मोदी सरकार ने अंत्योदय के संकल्प के साथ पूरे मन से क्रियान्वित किया है। संघ और सरकार के मध्य समन्वय के काम इसलिए भी बहुत आसान हुआ है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी लंबे समय तक न केवल प्रचारक जीवन जिया है बल्कि संघ के प्रचारक की मूल भावना के अनुसार आज भी वह निरंतर अपने काम में बगैर किसी अवकाश के जुटे रहते हैं। उन्होंने भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की परंपरा को अभी तक के अपने प्रयत्नों से नई ऊंचाई और नए आयाम दिए हैं जिसे संजोकर रखना, जिस पर चलना भविष्य के भारतीय नेतृत्व के लिए उस प्रकाश पुंज सरीखा होगा, जिसका प्रकाश पाने के लिए, जिसकी तरह हो जाने के लिए तन-मन-जीवन मचल उठते हैं।

संघ और सरकार के मध्य ऐसा सुन्दर समन्वय उस भाव के कारण ही संभव हो सका है जिसमें संघ और सरकार नदी के दो किनारों की तरह हैं, जो सदैव होते तो बिल्कुल अलग ही हैं लेकिन एक भावधारा दोनों को जोड़कर सदा साथ रखती है, वह भावधारा इस मातृभूमि और मानवता की सेवाधारा के सिवाय कुछ और नहीं है। जो इसे समझ लेता है, वह भावधारा की लहरों में गाहे-बगाहे उठने वाली हलचलों के पार उस अगाध समरस समन्वय की महिमा को समझ लेता है जो समय समय पर उठने वाली हलचलों को साधकर फिर से आगे बढ़ना जानती हैं।

डॉ. राकेश वनारसी

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